छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 35 लाख रुपये के चेक अनादरण (Dishonour) से जुड़े मामले में आरोपी को बरी किए जाने के खिलाफ दायर दो अपीलों को खारिज कर दिया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि शिकायतकर्ता किसी भी कानूनी देनदारी या कर्ज के अस्तित्व को साबित करने में विफल रहा। अदालत ने कथित नकद लेनदेन के संबंध में दस्तावेजी साक्ष्यों की कमी और शिकायतकर्ता की वित्तीय क्षमता पर गंभीर सवाल उठाए।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला महेंद्र सिंह ठाकुर (प्रतिवादी) और अनूप गिडवानी (अपीलकर्ता) के बीच भूमि सौदे से जुड़े विवाद से संबंधित है। अपीलकर्ता का आरोप था कि उसने जमीन खरीदने के लिए प्रतिवादी को 35 लाख रुपये नकद अग्रिम (Advance) दिए थे। आरोप के अनुसार, जब प्रतिवादी जमीन की रजिस्ट्री करने या रकम वापस करने में विफल रहा, तो उसने पंजाब नेशनल बैंक, रायपुर के दो चेक (नंबर 968460 और 968461) जारी किए।
बैंक में प्रस्तुत करने पर ये चेक “अपर्याप्त राशि” के कारण अनादरित हो गए। कानूनी नोटिस के बावजूद भुगतान न होने पर, परक्राम्य लिखत अधिनियम (Negotiable Instruments Act), 1881 की धारा 138 के तहत शिकायत दर्ज की गई थी। न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी, रायपुर ने 2016 में प्रतिवादी को दोषी ठहराते हुए छह महीने के कारावास और 35 लाख रुपये मुआवजे की सजा सुनाई थी। हालांकि, अगस्त 2017 में अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, रायपुर ने इस सजा को रद्द कर दिया था, जिसके बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा।
पक्षों के तर्क
अपीलकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि चूंकि चेक जारी करने और उस पर हस्ताक्षर की बात स्वीकार की गई है, इसलिए एनआई एक्ट की धारा 118 और 139 के तहत वैधानिक धारणाएं शिकायतकर्ता के पक्ष में होनी चाहिए। उन्होंने तर्क दिया कि अब सबूत का बोझ प्रतिवादी पर था कि वह इन धारणाओं का खंडन करे।
इसके विपरीत, प्रतिवादी के वकील ने दलील दी कि शिकायतकर्ता किसी कानूनी देनदारी को साबित नहीं कर सका। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि 35 लाख रुपये के नकद भुगतान का कोई दस्तावेजी सबूत नहीं है और न ही अपीलकर्ता इतनी बड़ी राशि के स्रोत (Source) को साबित कर पाया। प्रतिवादी ने यह भी तर्क दिया कि उसने चेक बैंक में पेश होने से पहले ही 29 अगस्त 2012 को “स्टॉप पेमेंट” का निर्देश जारी कर दिया था, जो इस बात को बल देता है कि चेक किसी कानूनी कर्ज के लिए जारी नहीं किए गए थे।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
जस्टिस राधाकृष्ण अग्रवाल ने मामले की सुनवाई करते हुए बरी किए जाने के खिलाफ अपील में हस्तक्षेप की सीमाओं को स्पष्ट किया। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के जाफरुद्दीन और अन्य बनाम केरल राज्य (2022) मामले का हवाला देते हुए कहा कि अपीलीय अदालत को बरी करने के आदेश को उलटने में सावधानी बरतनी चाहिए जब तक कि उसमें कोई स्पष्ट अवैधता न हो।
हाईकोर्ट ने शिकायतकर्ता (PW-1) की गवाही में कई विसंगतियां पाईं:
- वित्तीय क्षमता: शिकायतकर्ता ने स्वीकार किया कि उसकी वार्षिक आय केवल 3.5 लाख रुपये थी, फिर भी उसने 35 लाख रुपये नकद भुगतान करने का दावा किया।
- दस्तावेजों का अभाव: इतनी बड़ी राशि की उपलब्धता या भुगतान साबित करने के लिए कोई आयकर रिटर्न या बैंक स्टेटमेंट पेश नहीं किया गया।
- लेनदेन की अनिश्चितता: शिकायतकर्ता यह बताने में असमर्थ रहा कि कौन सी जमीन बेची जानी थी, उसकी दर क्या थी, भुगतान किस स्थान पर हुआ या इस लेनदेन का गवाह कौन था।
अदालत ने टिप्पणी की:
“शिकायतकर्ता/अपीलकर्ता के साक्ष्य विश्वास पैदा नहीं करते हैं और किसी भी कानूनी देनदारी के अस्तित्व को स्थापित करने में विफल रहते हैं।”
अदालत ने प्रतिवादी के बचाव को संभावित माना। प्रतिवादी ने ‘स्टॉप पेमेंट’ से जुड़े दस्तावेजों (Ex.D-1 से Ex.D-3) के माध्यम से यह साबित किया कि उसने विवाद अदालत पहुंचने से पहले ही बैंक को निर्देश दे दिए थे। कमला एस. बनाम विद्याधरन एम.जे. (2007) का संदर्भ देते हुए हाईकोर्ट ने दोहराया कि धारा 139 के तहत अनुमान खंडन योग्य है।
अदालत ने आगे कहा:
“यह उल्लेखनीय है कि इतनी बड़ी राशि से जुड़े लेनदेन के लिए सामान्यतः दस्तावेजी साक्ष्य की अपेक्षा की जाती है; हालांकि, वर्तमान मामले में ऐसा कोई सबूत पेश नहीं किया गया है। यह 35 लाख रुपये के कथित नकद अग्रिम भुगतान के बारे में गंभीर संदेह पैदा करता है।”
फैसला
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि प्रतिवादी वैधानिक धारणाओं का खंडन करने के लिए एक संभावित बचाव पेश करने में सफल रहा है। हाईकोर्ट ने माना कि निचली अदालत का फैसला कानूनी रूप से उचित था और उसमें कोई त्रुटि नहीं थी। परिणामतः, अपीलकर्ता की दोनों अपीलों को खारिज कर दिया गया।
मामले का विवरण:
- केस का शीर्षक: अनूप गिडवानी बनाम महेंद्र सिंह ठाकुर
- केस संख्या: ACQA संख्या 15 ऑफ 2018 और ACQA संख्या 16 ऑफ 2018
- पीठ: जस्टिस राधाकृष्ण अग्रवाल
- दिनांक: 10/04/2026

