देरी माफ करना “उदारता का कार्य” नहीं हो सकता: 31 साल की भारी देरी के बाद रिमांड आदेश को सुप्रीम कोर्ट ने किया रद्द

सुप्रीम कोर्ट ने 1975 के एक राजस्व मामले में रिमांड के फैसले को पलट दिया है। अदालत ने 31 साल की लंबी देरी के बाद डिक्री को चुनौती देने को “अत्यधिक देरी” करार दिया। जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने 1975 के उस आदेश को बहाल कर दिया, जिसमें राजस्थान में 158.3 बीघा जमीन पर अपीलकर्ता के ‘खातेदारी’ अधिकारों को मान्यता दी गई थी। पीठ ने स्पष्ट किया कि देरी की माफी न्याय के उद्देश्य को विफल करने वाली नहीं होनी चाहिए।

कानूनी मुद्दा

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष मुख्य कानूनी सवाल यह था कि क्या “धोखाधड़ी” या “नोटिस की कमी” के बहाने ट्रायल कोर्ट की डिक्री के खिलाफ 31 साल की देरी को माफ किया जा सकता है, खासकर तब जब न्यायिक रिकॉर्ड से पता चले कि प्रतिवादी ने मूल मुकदमे के दौरान सक्रिय रूप से भाग लिया था। इसके अलावा, अदालत ने हिंदू अल्पसंख्यक और संरक्षकता अधिनियम, 1956 के तहत आवश्यक अदालती अनुमति के बिना नाबालिग की संपत्ति के हस्तांतरण की वैधता पर भी विचार किया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद राजस्थान में 158.3 बीघा भूमि से संबंधित है। अपीलकर्ता हरि राम ने 1965 में (तब वह नाबालिग थे) अपनी मां के माध्यम से राजस्थान किरायेदारी अधिनियम, 1955 की धारा 88 के तहत मुकदमा दायर किया था। उन्होंने अपने दिवंगत पिता से उत्तराधिकार के आधार पर ‘खातेदारी’ अधिकारों की घोषणा की मांग की थी।

अपीलकर्ता का आरोप था कि प्रतिवादियों—केशी, भूरा राम और भिया राम—ने एक फर्जी सेल डीड के आधार पर जमीन के आधे हिस्से पर अवैध कब्जा कर लिया था। ट्रायल कोर्ट ने 16 अगस्त, 1975 को अपीलकर्ता के पक्ष में फैसला सुनाया। प्रतिवादी (केशी) शुरुआत में पेश हुई और जवाब भी दाखिल किया, लेकिन बाद में पेश न होने पर उन्हें ‘एकतरफा’ (ex-parte) घोषित कर दिया गया। डिक्री के 31 साल बाद, 2006 में केशी द्वारा अपील दायर की गई, जिसे पहले देरी के आधार पर खारिज कर दिया गया था, लेकिन बाद में राजस्व बोर्ड ने मामले को वापस भेज (रिमांड) दिया। इस रिमांड आदेश को हाईकोर्ट ने भी बरकरार रखा था।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता श्री वैभव गग्गर ने तर्क दिया कि प्रतिवादी एक वकील के माध्यम से पेश हुई थीं और कई मौकों पर व्यक्तिगत रूप से भी उपस्थित थीं। उन्होंने बताया कि बचाव पक्ष की ओर से दो गवाहों के बयान दर्ज किए गए थे और 31 साल की देरी का कोई “संतोषजनक कारण” नहीं दिया गया।

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प्रतिवादियों की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता श्री सदन फरासत ने तर्क दिया कि सेल डीड अपीलकर्ता की मां द्वारा निष्पादित की गई थी और उन्हें इसकी जानकारी थी। उन्होंने दलील दी कि जनरल रूल्स (सिविल) 1986 के नियम 143 के तहत कार्यवाही पत्र पर पार्टियों के हस्ताक्षर होने चाहिए थे, जो नहीं किए गए। उन्होंने धोखाधड़ी का आरोप लगाते हुए रिमांड आदेश को एक अनपढ़ विधवा के हितों की रक्षा के लिए आवश्यक बताया।

कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के रिकॉर्ड की जांच की और पाया कि प्रतिवादी वास्तव में वकील के माध्यम से पेश हुई थीं और उन्होंने सेल डीड पेश करने के लिए आवेदन भी दिया था। हालांकि, वह डीड अदालत में पेश करने में विफल रहीं।

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देरी की माफी पर: कोर्ट ने कहा कि 1975 की डिक्री को रद्द करने के आधार मुकदमे की कार्यवाही के विपरीत थे। देरी पर पीठ ने कहा:

“जैसा कि जहांगीर बायरामजी जीजीभॉय और अन्य फैसलों में पाया गया है, देरी को माफ करना उदारता का कार्य नहीं हो सकता जो वास्तविक न्याय के उद्देश्य को पराजित करे और दूसरे पक्ष को नुकसान पहुँचाए।”

प्रतिकूल निष्कर्ष (Adverse Inference) पर: अजय कुमार डी. अमीन बनाम एयर फ्रांस और गुरनाम सिंह बनाम सुरजीत सिंह का हवाला देते हुए पीठ ने कहा कि प्रतिवादी ने सेल डीड जैसे “सर्वोत्तम साक्ष्य” को छिपाया। कोर्ट के अनुसार:

“…जब किसी पक्ष के पास सर्वोत्तम साक्ष्य उपलब्ध हो जो विवाद पर प्रकाश डाल सकता है, और वह उसे रोकता है, तो अदालत प्रतिकूल निष्कर्ष निकालने की हकदार है…”

सेल डीड की वैधता पर: अदालत ने गौर किया कि कथित सेल डीड में अपीलकर्ता केवल 12 वर्ष का नाबालिग था। हिंदू अल्पसंख्यक और संरक्षकता अधिनियम, 1956 की धारा 8(2) के तहत ऐसे हस्तांतरण के लिए अदालत की अनुमति अनिवार्य है, जो नहीं ली गई थी। के.एस. शिवप्पा बनाम के. नीलम्मा का हवाला देते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी शून्यकरणीय (voidable) लेनदेन को उसके आचरण के माध्यम से भी नकारा जा सकता है।

अंतिम निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने रिमांड के हाईकोर्ट के आदेश को “अवैध” पाया। पीठ ने कहा कि 31 साल बाद मामले को रिमांड करने का कोई औचित्य नहीं था, खासकर तब जब प्रतिवादी ने दस साल (1965-1975) तक मुकदमा लड़ा था और गवाह भी पेश किए थे, लेकिन खुद गवाही देने और डीड पेश करने से इनकार कर दिया था।

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सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट और राजस्व बोर्ड के आदेशों को रद्द कर दिया और 16 अगस्त, 1975 के राजस्व न्यायालय के मूल आदेश को बहाल कर दिया।

केस विवरण:

केस शीर्षक: हरि राम बनाम राजस्थान राज्य एवं अन्य

केस संख्या: सिविल अपील संख्या … 2026 (@SLP(C) संख्या 4664 / 2025)

पीठ: जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन

दिनांक: 10 अप्रैल, 2026

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