खाद्य सुरक्षा के लिए नेशनल टास्क फोर्स बनाने की मांग खारिज, सुप्रीम कोर्ट ने याचिका को बताया ‘मेरिटहीन’

सुप्रीम कोर्ट ने देश भर में खाद्य सुरक्षा नियमों के प्रभावी अनुपालन और निगरानी के लिए एक नेशनल टास्क फोर्स या कमेटी गठित करने की मांग वाली याचिका को गुरुवार को खारिज कर दिया। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने कहा कि याचिका में कोई मेरिट नहीं है और संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत इस पर विचार करने का कोई ठोस आधार नहीं मिला है।

इस मामले में मुख्य कानूनी प्रश्न यह था कि क्या खाद्य सुरक्षा मानकों को लागू करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से एक नई निगरानी संस्था (टास्क फोर्स) बनाना आवश्यक है। याचिकाकर्ता ने कोर्ट से यह निर्देश देने की भी मांग की थी कि देश भर में खाद्य निर्माण इकाइयों, रेस्टोरेंट्स और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों का एक समयबद्ध ऑडिट और निरीक्षण अभियान चलाया जाए। हालांकि, कोर्ट ने इन मांगों को स्वीकार करने से इनकार करते हुए याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया।

यह जनहित याचिका (PIL) एक व्यक्ति द्वारा व्यक्तिगत रूप से दायर की गई थी। याचिका में दूषित और खतरनाक खाद्य पदार्थों को लेकर चिंता जताई गई थी और तर्क दिया गया था कि यह मुद्दा देश के लगभग हर नागरिक के स्वास्थ्य से जुड़ा है।

याचिकाकर्ता ने कई व्यापक निर्देश देने की मांग की थी, जिनमें शामिल थे:

  • सुप्रीम कोर्ट की देखरेख में एक नेशनल टास्क फोर्स का गठन।
  • रेस्टोरेंट्स और फूड प्रोसेसिंग यूनिट्स का देशव्यापी ऑडिट।
  • सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में टेस्टिंग लैब और निरीक्षण ढांचे को मजबूत करना।
  • खाद्य सुरक्षा उल्लंघन के पीड़ितों के लिए देशव्यापी शिकायत निवारण और मुआवजे का तंत्र बनाना।
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इस मामले में केंद्र सरकार, सभी राज्य सरकारों, केंद्र शासित प्रदेशों और भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) को प्रतिवादी बनाया गया था।

सुनवाई के दौरान बेंच ने याचिकाकर्ता की तैयारी और रिसर्च पर सवाल उठाए। 6 अप्रैल को हुई पिछली सुनवाई में कोर्ट ने याचिकाकर्ता से पूछा था कि इस जनहित याचिका को दायर करने से पहले उन्होंने “उपदेशों के अलावा” और क्या रिसर्च की है।

याचिकाकर्ता ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि असुरक्षित भोजन की समस्या को देखते हुए यह याचिका बेहद जरूरी है। हालांकि, बेंच ने इन दलीलों को अपर्याप्त माना और कहा कि इस तरह के नीतिगत और प्रवर्तन मामलों में अनुच्छेद 32 के तहत असाधारण हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।

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अपने अंतिम आदेश में बेंच ने स्पष्ट किया कि याचिका उस मानक को पूरा नहीं करती जिसके आधार पर कोर्ट नीतिगत सुधारों में दखल दे सके।

बेंच ने कहा, “हमें भारत के संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत इस रिट याचिका पर विचार करने का कोई आधार नहीं मिला। तदनुसार, इसे मेरिटहीन मानकर खारिज किया जाता है।”

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