जहाँ कानून राज्यपाल को विवेकाधिकार देता है, वहाँ अदालतें असाधारण पेंशन मंजूर नहीं कर सकतीं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि संबंधित सेवा नियमों के तहत असाधारण पेंशन (extraordinary pension) देने की शक्ति राज्यपाल के पास निहित एक प्रशासनिक विवेकाधिकार है और अदालतें वैधानिक प्राधिकरण के निर्णय के स्थान पर अपना निर्णय नहीं थोप सकतीं। न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति अतुल एस. चांदुरकर की पीठ ने उत्तराखंड हाईकोर्ट के उस फैसले में संशोधन किया है, जिसमें ड्यूटी के दौरान मारे गए एक डॉक्टर की विधवा को सीधे असाधारण पेंशन भुगतान करने का निर्देश दिया गया था।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला डॉ. सुनील कुमार सिंह से जुड़ा है, जो एक बाल रोग विशेषज्ञ (Pediatrician) थे। 20 अप्रैल 2016 को सीएचसी जसपुर में अपनी ड्यूटी निभाने के दौरान उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। उनकी पत्नी सरिता सिंह (प्रथम प्रतिवादी) ने उत्तर प्रदेश सिविल सेवा (असाधारण पेंशन) नियमावली, 1981 (उत्तराखंड द्वारा अपनाई गई) के तहत असाधारण पेंशन की मांग की थी।

यद्यपि राज्य सरकार ने परिवार को ₹1,00,000 की अनुग्रह राशि, वेतन बकाया और पुत्र को अनुकंपा नियुक्ति प्रदान की थी, लेकिन विधवा ने अधिक मुआवजे और असाधारण पेंशन के लिए हाईकोर्ट का रुख किया। 12 सितंबर 2018 को हाईकोर्ट ने राज्य को ₹1,99,09,000 मुआवजे के रूप में भुगतान करने का निर्देश दिया और बकाया पर 8.5% ब्याज के साथ असाधारण पेंशन मंजूर की। उत्तराखंड राज्य ने हाईकोर्ट के इस निर्देश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।

पक्षों की दलीलें

उत्तराखंड राज्य की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता श्री गौरव भाटिया ने तर्क दिया कि हाईकोर्ट ने 1981 के नियमों की प्रक्रियात्मक और मूल आवश्यकताओं की अनदेखी की है। उन्होंने जोर दिया कि नियम 4 के तहत राज्यपाल की मंजूरी अनिवार्य है। उन्होंने आगे कहा कि हाईकोर्ट यह स्पष्ट करने में विफल रहा कि डॉक्टर की मृत्यु नियमों द्वारा परिभाषित “जोखिम वाले पद” (post of risk) के अंतर्गत कैसे आती है।

प्रतिवादी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्री विजय हंसरिया ने हाईकोर्ट के निष्कर्षों का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि मृत्यु आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान हुई थी, जो नियम 3 के तहत “विशेष जोखिम” या “हिंसा” की श्रेणी में आती है। उन्होंने तर्क दिया कि केवल आवेदन के प्रारूप जैसी तकनीकी कमियों के कारण परिवार को पेंशन से वंचित नहीं किया जाना चाहिए।

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अदालत का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि 1981 के नियम असाधारण पेंशन को नियंत्रित करने वाला एक संपूर्ण कोड हैं। अदालत ने नियम 4 की ओर ध्यान आकर्षित किया, जिसमें कहा गया है: “इन नियमों के तहत राज्यपाल की मंजूरी के बिना कोई भी अवॉर्ड नहीं दिया जाएगा।”

पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि जहाँ कोई कानून किसी प्राधिकरण को विवेकाधीन शक्ति प्रदान करता है, वहाँ अदालत को न्यायिक संयम बरतना चाहिए। अदालत ने कहा:

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“यह एक अलग मामला होता यदि संबंधित प्राधिकरण ने उचित अवधि के भीतर कोई निर्णय लेने से इनकार कर दिया होता या लिया गया निर्णय पूरी तरह से मनमाना या विवेकहीन पाया जाता… सामान्यतः, अदालत संबंधित प्राधिकरण द्वारा अपने विवेकाधिकार के प्रयोग में लिए जाने वाले निर्णय के स्थान पर अपना निर्णय प्रतिस्थापित नहीं करेगी।”

‘स्टेट ऑफ वेस्ट बंगाल बनाम नूरुद्दीन मलिक’ और ‘यूनियन ऑफ इंडिया बनाम एस.बी. वोहरा’ के फैसलों का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया:

“यह स्पष्ट है कि सामान्यतः अदालत वैधानिक अधिकारियों की शक्ति का प्रयोग नहीं करेगी। वह प्रथम दृष्टया वैधानिक अधिकारियों को अपने कार्यों को करने की अनुमति देगी और स्वयं उस अधिकार क्षेत्र को नहीं हड़पेगी।”

अदालत ने पाया कि चूंकि राज्यपाल को अभी तक विधवा के अनुरोध की जांच करने या प्रशासनिक विवेकाधिकार का प्रयोग करने का अवसर नहीं मिला था, इसलिए हाईकोर्ट द्वारा परमादेश (mandamus) जारी करना “अनुचित” था।

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने अपीलों को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए निम्नलिखित निर्देश जारी किए:

  1. पेंशन का आदेश रद्द: हाईकोर्ट द्वारा असाधारण पेंशन देने के निर्देश को रद्द कर दिया गया क्योंकि इसमें राज्यपाल की मंजूरी नहीं ली गई थी।
  2. नया आवेदन: प्रतिवादी को चार सप्ताह के भीतर 1981 के नियमों के तहत असाधारण पेंशन के लिए आवेदन करने की अनुमति दी गई है। सक्षम प्राधिकारी को बारह सप्ताह के भीतर गुण-दोष के आधार पर इस आवेदन पर निर्णय लेना होगा।
  3. मुआवजा बरकरार: अदालत ने नोट किया कि मामले के लंबित रहने के दौरान प्रतिवादी को अंतरिम आदेशों के माध्यम से ₹1,00,00,000 का मुआवजा प्राप्त हुआ है। पीठ ने निर्देश दिया कि यह राशि अंतिम है और “उससे वसूल नहीं की जाएगी।”
  4. स्वतंत्र समीक्षा: अदालत ने स्पष्ट किया कि राज्यपाल को पिछले फैसलों में की गई किसी भी टिप्पणी से प्रभावित हुए बिना “अपने गुण-दोष के आधार पर” दावे का निर्णय करना चाहिए।
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केस विवरण:

  • केस शीर्षक: उत्तराखंड राज्य बनाम सरिता सिंह और अन्य
  • केस संख्या: सिविल अपील (SLP (C) सं. 19840-19841/2021 से उत्पन्न)
  • पीठ: न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति अतुल एस. चांदुरकर
  • तारीख: 9 अप्रैल, 2026

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