इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नेशनल रूरल हेल्थ मिशन (NRHM) घोटाले से जुड़े तीन अलग-अलग मामलों में पूर्व मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) डॉ. अनिल कुमार शुक्ला को बड़ी राहत दी है। हाईकोर्ट ने उनके खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही पर अंतरिम रोक लगाते हुए सुनवाई में हुई लगभग दो दशक की देरी पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
जस्टिस राजीव सिंह की पीठ ने यह आदेश डॉ. शुक्ला द्वारा भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 528 के तहत दायर तीन याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए दिया। यह मामले फिलहाल गाजियाबाद स्थित सीबीआई (CBI) की विशेष अदालत (भ्रष्टाचार निवारण) में लंबित हैं, जिनमें 2007 से 2009 के बीच दवाओं और उपकरणों की खरीद में अनियमितता के आरोप लगाए गए हैं।
सीबीआई ने नई दिल्ली में ये मामले दर्ज किए थे, जिसमें आरोप था कि डॉ. शुक्ला के कार्यकाल के दौरान हुई खरीद में धांधली से सरकारी खजाने को भारी नुकसान हुआ। जांच एजेंसी इन तीनों मामलों में पहले ही चार्जशीट दाखिल कर चुकी है। 73 वर्षीय डॉ. शुक्ला ने हाईकोर्ट का दरवाजा तब खटखटाया जब निचली अदालत में उनकी डिस्चार्ज अर्जी लंबित रहने के बावजूद कार्यवाही जारी रही।
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता नंदित श्रीवास्तव ने दलील दी कि डॉ. शुक्ला के खिलाफ कोई ठोस सबूत मौजूद नहीं है। उन्होंने कहा कि उम्र के इस पड़ाव पर उन्हें अनावश्यक रूप से परेशान किया जा रहा है। अधिवक्ता ने विशेष रूप से उल्लेख किया कि एक मामले में डॉ. शुक्ला केवल डेढ़ दिन के लिए ही CMO के पद पर तैनात थे, ऐसे में इतने कम समय में बड़े स्तर पर अनियमितता करने का आरोप निराधार प्रतीत होता है।
वहीं, सीबीआई के विशेष वकील अनुराग कुमार सिंह ने याचिकाओं की पोषणीयता (maintainability) पर आपत्ति जताई। उन्होंने तर्क दिया कि चूंकि डिस्चार्ज अर्जी अभी गाजियाबाद की ट्रायल कोर्ट में लंबित है, इसलिए हाईकोर्ट को इस स्तर पर हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
हाईकोर्ट ने सीबीआई की प्रारंभिक आपत्ति को खारिज करते हुए मुकदमे की लंबी अवधि पर ध्यान केंद्रित किया। कोर्ट ने नोट किया कि कथित घटनाएं 17 से 19 साल पुरानी हैं।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने सीबीआई की जांच और प्रक्रिया में कई खामियां पाईं:
- कार्यकाल की विसंगति: एक मामले में याचिकाकर्ता महज 1.5 दिन के लिए CMO पद पर था।
- प्रक्रियात्मक चूक: कोर्ट ने चार्जशीट और संज्ञान आदेशों (cognisance orders) के बीच विसंगतियां पाईं।
- अभियोजन मंजूरी का अभाव: एक मामले में बिना आवश्यक ‘प्रॉसिक्यूशन सेंक्शन’ (अभियोजन मंजूरी) के ही सप्लीमेंट्री चार्जशीट दाखिल कर दी गई थी, जो लोक सेवकों के खिलाफ कार्यवाही के लिए अनिवार्य है।
पीठ ने टिप्पणी की, “मुकदमे में इतना लंबा विलंब आरोपी के बचाव को प्रभावित कर सकता है।” कोर्ट ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता की 73 वर्ष की आयु को देखते हुए दशकों पुराने मामले को खींचना न्यायसंगत नहीं है।
हाईकोर्ट ने गाजियाबाद की विशेष सीबीआई अदालत में लंबित तीनों मामलों की कार्यवाही पर रोक लगा दी है। इसके साथ ही, कोर्ट ने सीबीआई को निर्देश दिया है कि वह मई के पहले सप्ताह तक इन याचिकाओं पर अपना विस्तृत जवाब दाखिल करे।

