BNSS की धारा 130 के तहत आदेश जारी करना अनिवार्य; बॉम्बे हाईकोर्ट ने रद्द किए ‘मैकेनिकल’ और ‘साइकलोस्टाइल’ नोटिस

बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा पीठ ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 126 के तहत कार्यकारी मजिस्ट्रेटों द्वारा जारी किए गए कई कारण बताओ नोटिसों को रद्द कर दिया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 126 के तहत कार्यवाही शुरू करने के लिए धारा 130 के अंतर्गत लिखित आदेश पारित करना एक अनिवार्य कानूनी पूर्व शर्त (sine qua non) है। जस्टिस अमित एस. जमसांडेकर ने अपने फैसले में कहा कि “साइकलोस्टाइल” या यांत्रिक तरीके से जारी नोटिस, जिनमें प्राप्त जानकारी का विवरण नहीं होता, नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन करते हैं।

मामले की पृष्ठभूमि

अदालत छह आपराधिक रिट याचिकाओं (संख्या 50, 51, 52, 53, 54 और 56 वर्ष 2026) पर सुनवाई कर रही थी। ये याचिकाएं पेरनेम, मापुसा और पणजी सहित विभिन्न न्यायालय क्षेत्रों के डिप्टी कलेक्टर और सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट (SDM) द्वारा जारी नोटिसों के खिलाफ दायर की गई थीं। इन नोटिसों में याचिकाकर्ताओं से पूछा गया था कि शांति बनाए रखने के लिए उन्हें बॉन्ड निष्पादित करने का आदेश क्यों न दिया जाए।

याचिकाकर्ताओं ने इन नोटिसों को इस आधार पर चुनौती दी थी कि मजिस्ट्रेटों ने कारण बताओ नोटिस जारी करने से पहले BNSS की धारा 130 के तहत अलग से कोई तर्कसंगत आदेश पारित नहीं किया था, जो कि कानूनन आवश्यक है।

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ताओं के वकील ने तर्क दिया कि मजिस्ट्रेटों के पास अधिकार क्षेत्र की कमी थी क्योंकि उन्होंने कार्यवाही शुरू करने के लिए “पर्याप्त आधार” होने का कोई आधिकारिक ओपिनियन रिकॉर्ड नहीं किया था। दलील दी गई कि धारा 130 के तहत, मजिस्ट्रेट के लिए यह अनिवार्य है कि वह “प्राप्त जानकारी के सार” को लिखित रूप में दर्ज करे। केवल संतुष्टि व्यक्त कर देना पर्याप्त नहीं है; मजिस्ट्रेट के विवेक का उपयोग आदेश में स्पष्ट रूप से झलकना चाहिए।

याचिकाकर्ताओं ने निम्नलिखित पिछले मामलों का हवाला दिया:

  1. जितेंद्र आर. देशप्रभु और अन्य बनाम कार्यकारी मजिस्ट्रेट और अन्य (1992)
  2. राजेश बनाम महाराष्ट्र राज्य और अन्य (2006)
  3. तुकाराम भरत परब और अन्य बनाम राज्य और अन्य (2021)
READ ALSO  Person Questioning Testator's Title Is a ‘Stranger’ to Probate; Revocation Application Not Maintainable: Bombay High Court

लोक अभियोजक श्री भोबे ने स्वीकार किया कि यह मुद्दा पिछले फैसलों से कवर होता है, लेकिन तर्क दिया कि कभी-कभी परिस्थितियों में “तत्काल कार्रवाई” की आवश्यकता होती है, इसलिए धारा 126 के तहत जारी नोटिसों को ही धारा 130 के आदेश के रूप में माना जाना चाहिए।

हाईकोर्ट का विश्लेषण

हाईकोर्ट ने राज्य की इस दलील को खारिज कर दिया कि नोटिस को ही आदेश माना जा सकता है। जस्टिस जमसांडेकर ने पाया कि विवादित नोटिस “व्यावहारिक रूप से साइकलोस्टाइल आदेश” थे, जहां केवल नाम और हस्ताक्षर बदले गए थे, जबकि सामग्री पूरी तरह समान थी।

READ ALSO  दिल्ली हाईकोर्ट   ने स्पाइसजेट को इंजन लौटाने के लिए अंतिम समय सीमा तय की, अवमानना ​​कार्रवाई की चेतावनी दी

प्रक्रियात्मक अनुपालन की अनिवार्यता कोर्ट ने BNSS के अध्याय IX की योजना का विश्लेषण करते हुए कहा:

  • धारा 126: मजिस्ट्रेट को शांति भंग की संभावना होने पर बॉन्ड के लिए कारण बताओ नोटिस जारी करने की शक्ति देती है।
  • धारा 130: यह स्पष्ट करती है कि मजिस्ट्रेट “लिखित रूप में एक आदेश देगा, जिसमें प्राप्त जानकारी का सार, बॉन्ड की राशि, अवधि और ज़मानतदारों की संख्या” निर्धारित की जाएगी।

कोर्ट ने ज़ोर देते हुए कहा:

“BNSS की धारा 126 के तहत प्रदत्त शक्तियों के साथ आगे बढ़ने के लिए धारा 130 के तहत आदेश पारित करना अधिकार क्षेत्र ग्रहण करने के लिए एक अनिवार्य शर्त (sine qua non) है।”

स्वतंत्रता का संरक्षण हाईकोर्ट ने रेखांकित किया कि ये कार्यवाहियां नागरिक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़ी हैं, इसलिए वैधानिक प्रावधानों का कड़ाई से पालन होना चाहिए। जस्टिस जमसांडेकर ने कहा:

“यह कानून का एक स्थापित सिद्धांत है कि यदि कानून किसी कार्य को विशेष तरीके से करने की आवश्यकता बताता है, तो वह कार्य उसी तरीके से किया जाना चाहिए, किसी अन्य तरीके से नहीं।”

अदालत ने आगे स्पष्ट किया कि धारा 131 के तहत, धारा 130 के आदेश को संबंधित व्यक्ति को पढ़कर सुनाना या समझाना आवश्यक है। बिना लिखित आदेश के धारा 131 और धारा 133 की शर्तों को पूरा करना असंभव है।

READ ALSO  व्यभिचार के आधार पर तलाक लेने के लिए बच्चे को हथियार के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता: राजस्थान हाईकोर्ट

कोर्ट का निर्णय

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि कार्यकारी मजिस्ट्रेट ऐसी किसी प्रक्रिया को नहीं अपना सकते जिसे BNSS द्वारा मान्यता नहीं दी गई है। यह पाते हुए कि नोटिस धारा 126 और 130 के अनुरूप नहीं थे, कोर्ट ने सभी छह रिट याचिकाओं को स्वीकार कर लिया।

हाईकोर्ट ने विवादित नोटिसों और मजिस्ट्रेटों द्वारा शुरू की गई संबंधित कार्यवाहियों को रद्द कर दिया। इस मामले में लागत (costs) के संबंध में कोई आदेश नहीं दिया गया।

केस विवरण ब्लॉक:

  • केस शीर्षक: चंदन पाटेकर और अन्य बनाम गोवा राज्य और अन्य (और संबंधित मामले)
  • केस संख्या: WPCR संख्या 50, 51, 52, 53, 54, 56 वर्ष 2026
  • बेंच: जस्टिस अमित एस. जमसांडेकर
  • दिनांक: 7 अप्रैल, 2026

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles