दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला: एक्सपोर्ट इंस्पेक्शन काउंसिल के कर्मचारी बिना स्पष्ट विकल्प दिए भी पेंशन योजना के हकदार

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक्सपोर्ट इंस्पेक्शन काउंसिल (EIC) द्वारा दायर तीन अपीलों को खारिज करते हुए यह स्पष्ट किया है कि जिन कर्मचारियों ने निर्धारित समय सीमा तक ‘कंट्रीब्यूटरी प्रोविडेंट फंड’ (CPF) में बने रहने का स्पष्ट विकल्प नहीं चुना था, उन्हें स्वतः ही पेंशन और ‘जनरल प्रोविडेंट फंड’ (GPF) योजना के दायरे में माना जाएगा।

मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की खंडपीठ ने 2021 के सिंगल जज के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि 1987 के सर्कुलर के तहत पेंशन योजना का लाभ मिलना ‘स्वचालित’ (automatic) था।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद 2 जुलाई 1987 को एक्सपोर्ट इंस्पेक्शन काउंसिल द्वारा जारी एक सर्कुलर से शुरू हुआ था। यह काउंसिल ‘एक्सपोर्ट (क्वालिटी कंट्रोल एंड इंस्पेक्शन) एक्ट, 1963’ के तहत स्थापित है। इस सर्कुलर के जरिए चौथे केंद्रीय वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू किया गया था, जिसमें CPF योजना वाले कर्मचारियों को यह विकल्प दिया गया था कि वे या तो पुरानी योजना में बने रहें या 1981 के पेंशन और GPF नियमों को अपना लें।

सर्कुलर में शर्त थी कि जो कर्मचारी 1 जनवरी 1986 को सेवा में थे और सर्कुलर जारी होने की तिथि तक कार्यरत थे, उन्हें पेंशन योजना में शामिल माना जाएगा, बशर्ते उन्होंने 31 अक्टूबर 1987 तक CPF में बने रहने का लिखित विकल्प न दिया हो। प्रतिवादी दीपक शेखर, राजीव रायज़ादा और आनंद किशोर को काउंसिल ने पेंशन देने से इनकार कर दिया था।

पक्षों की दलीलें

एक्सपोर्ट इंस्पेक्शन काउंसिल (अपीलकर्ता) ने तर्क दिया कि:

  • कुछ कर्मचारियों ने 1983 और 1986 में पहले ही CPF का विकल्प चुना था, जिसे अंतिम माना जाना चाहिए।
  • 8 फरवरी 1989 को जारी एक अन्य सर्कुलर के अनुसार कर्मचारियों को 31 मार्च 1989 तक पेंशन योजना चुनने की आवश्यकता थी, जो इन कर्मचारियों ने नहीं किया।
  • काउंसिल ने सुप्रीम कोर्ट के KVS बनाम जसपाल कौर (2007) मामले का हवाला देते हुए कहा कि कर्मचारियों के आचरण से स्पष्ट था कि वे CPF में रहना चाहते थे।
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कर्मचारियों (प्रतिवादी) की ओर से दलील दी गई कि:

  • 1987 के सर्कुलर की शर्तों के अनुसार, पेंशन योजना में शामिल होने के लिए किसी सकारात्मक कार्रवाई की आवश्यकता नहीं थी; केवल CPF में बने रहने वालों को ही फॉर्म भरना था।
  • चूंकि उन्होंने 31 अक्टूबर 1987 तक CPF का विकल्प नहीं चुना था, इसलिए ‘डीमिंग क्लॉज’ (deeming clause) के तहत वे स्वतः पेंशन के पात्र हो गए।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियाँ

हाईकोर्ट ने 1987 के सर्कुलर की धाराओं 2(a) और 2(b) का सूक्ष्म अवलोकन किया और पाया कि इसकी भाषा “पूरी तरह स्पष्ट” थी।

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बेंच ने टिप्पणी की:

“स्पष्ट और विशिष्ट प्रावधानों को देखते हुए… पेंशन और GPF योजना का कवरेज स्वचालित था, जो केवल इस बात पर निर्भर था कि कर्मचारी CPF योजना में बने रहने का विकल्प देता है या नहीं।”

काउंसिल द्वारा 1987 से पहले दिए गए विकल्पों के तर्क को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा:

“02.07.1987 के सर्कुलर से पहले दिया गया कोई भी विकल्प अपना महत्व खो देता है क्योंकि यह सर्कुलर उन सभी कर्मचारियों को कवर करता है जो 01.01.1986 को सेवा में थे… यह सर्कुलर उन कर्मचारियों के बीच कोई भेदभाव नहीं करता जिन्होंने पहले CPF चुना था और जिन्होंने नहीं चुना था।”

अदालत ने यह भी माना कि 1989 का सर्कुलर 1987 के सर्कुलर को खत्म नहीं करता, बल्कि यह उन लोगों के लिए था जिन्होंने 1987 में CPF चुना था और बाद में मन बदलना चाहते थे। कोर्ट ने जसपाल कौर मामले को वर्तमान तथ्यों से अलग बताया और डॉ. आर.एन. विरमानी बनाम दिल्ली विश्वविद्यालय (2014) के फैसले पर भरोसा जताया।

अदालत का निर्णय

खंडपीठ ने काउंसिल की अपीलों को खारिज कर दिया और सिंगल जज के निर्देशों की पुष्टि की:

  1. कर्मचारियों को उनकी सेवानिवृत्ति की तिथि से पेंशन योजना में शामिल माना जाएगा।
  2. कर्मचारियों को नियोक्ता (Employer) द्वारा दिया गया CPF योगदान 8% वार्षिक ब्याज के साथ वापस करना होगा।
  3. काउंसिल इस समायोजन के बाद पेंशन और बकाया राशि की गणना करेगी और कर्मचारियों को इसका भुगतान करेगी।
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मामले में लागत (costs) के संबंध में कोई आदेश नहीं दिया गया।

केस विवरण:

  • केस शीर्षक: एक्सपोर्ट इंस्पेक्शन काउंसिल बनाम दीपक शेखर और अन्य (LPA 391/2021 एवं संबंधित मामले)
  • बेंच: मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया
  • फैसले की तिथि: 07 अप्रैल, 2026

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