केवल डायरेक्टर होने या बोर्ड रेजोल्यूशन पर हस्ताक्षर करने से NI एक्ट की धारा 141 के तहत आपराधिक जिम्मेदारी नहीं बनती: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने ‘प्रोजटेक इंजीनियरिंग प्राइवेट लिमिटेड’ की डायरेक्टर सरोज पांडे के खिलाफ चेक बाउंस मामले में चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी कंपनी का केवल डायरेक्टर होना या बोर्ड रेजोल्यूशन (Board Resolutions) पर हस्ताक्षर करना इस बात का सबूत नहीं है कि वह व्यक्ति कंपनी के रोजमर्रा के कामकाज में शामिल है, जो कि नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट, 1881 (NI एक्ट) के तहत सजा के लिए एक अनिवार्य शर्त है।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने दिल्ली हाईकोर्ट और एडिशनल सेशंस जज, द्वारका कोर्ट के उन आदेशों को खारिज कर दिया, जिन्होंने पांडे के खिलाफ जारी समन को रद्द करने से इनकार कर दिया था।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला NI एक्ट की धारा 138 और 142 के तहत दर्ज एक शिकायत से जुड़ा है। अभियुक्त कंपनी, ‘प्रोजटेक इंजीनियरिंग प्राइवेट लिमिटेड’ ने लोहे और स्टील की आपूर्ति के भुगतान के रूप में 20 अप्रैल 2021 को कुल ₹50 लाख के तीन चेक जारी किए थे।

चेक बैंक में जमा करने पर “ड्रॉअर के हस्ताक्षर अलग होने और तारीख के अलावा अन्य सुधार/बदलाव” (Drawers Signatures Differs and Alternations/Corrections on Instruments other than date) होने के कारण वापस आ गए। कानूनी नोटिस के बाद, 25 जून 2021 को कार्यवाही शुरू हुई। मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट, द्वारका कोर्ट ने 23 सितंबर 2021 को अभियुक्तों के खिलाफ समन जारी किया।

सरोज पांडे ने इसे चुनौती दी, लेकिन सेशंस कोर्ट और दिल्ली हाईकोर्ट ने उनकी अर्जी खारिज कर दी। अदालतों का तर्क था कि चूंकि वह डायरेक्टर हैं और उन्होंने एक बोर्ड रेजोल्यूशन पर हस्ताक्षर किए थे, इसलिए यह माना जाना चाहिए कि वह कंपनी के प्रबंधन में सक्रिय रूप से शामिल थीं।

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NI एक्ट की धारा 141 का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने कंपनी द्वारा किए गए अपराधों से संबंधित धारा 141 के दायरे की जांच की। पीठ ने कहा कि किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने के लिए यह साबित होना चाहिए कि अपराध के समय वह व्यक्ति कंपनी के कामकाज के संचालन का “प्रभारी और जिम्मेदार” (In charge of, and responsible to) था।

पीठ ने तीन जजों की बेंच के ऐतिहासिक फैसले S.M.S. Pharmaceuticals Ltd. v. Neeta Bhalla (2005) का हवाला देते हुए कहा:

“धारा 141 के तहत शिकायत में यह विशेष रूप से बताना आवश्यक है कि अपराध के समय आरोपी व्यक्ति कंपनी के व्यवसाय के संचालन का प्रभारी और जिम्मेदार था। यह धारा 141 की एक अनिवार्य आवश्यकता है… किसी कंपनी का केवल डायरेक्टर होना ही उस व्यक्ति को धारा 141 के तहत उत्तरदायी बनाने के लिए पर्याप्त नहीं है।”

अदालत ने Gunmala Sales (P) Ltd. v. Anu Mehta (2015) मामले का भी जिक्र किया, जिसमें कहा गया था कि यदि किसी डायरेक्टर की भूमिका के बारे में स्पष्ट जानकारी का अभाव हो या कोई ऐसा पुख्ता सबूत हो जो यह दिखाए कि डायरेक्टर का चेक जारी करने से कोई लेना-देना नहीं था, तो हाईकोर्ट शिकायत को रद्द कर सकता है।

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बोर्ड रेजोल्यूशन पर कोर्ट की टिप्पणी

निचली अदालतों द्वारा बोर्ड रेजोल्यूशन पर हस्ताक्षर को आधार बनाने पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि बोर्ड रेजोल्यूशन नीतिगत निर्णयों के लिए होते हैं और इनका मतलब यह नहीं है कि हर डायरेक्टर रोजमर्रा के लेन-देन से वाकिफ है।

कोर्ट ने कहा:

“इसका किसी भी तरह से यह अर्थ नहीं है कि बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स का प्रत्येक सदस्य उन सभी निर्णयों से अवगत है जो एक व्यावसायिक संस्थान को चलाने में शामिल रोजमर्रा के लेन-देन में लिए जाते हैं। इसके अलावा, शिकायत में वर्तमान अपीलकर्ता के खिलाफ प्रत्यक्ष आरोप का एक अंश भी नहीं है…”

हाईकोर्ट की शक्तियों पर स्पष्टीकरण (धारा 482 और 397 CrPC)

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस दृष्टिकोण को भी गलत बताया जिसमें कहा गया था कि यदि धारा 397 के तहत एक रिवीजन याचिका पहले ही सुनी जा चुकी है, तो धारा 482 के तहत हाईकोर्ट का अधिकार क्षेत्र सीमित हो जाता है।

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Krishnan & Anr. v. Krishnaveni & Anr (1997) का उल्लेख करते हुए बेंच ने कहा:

“हाईकोर्ट की अंतर्निहित शक्ति (Inherent Power) कानून द्वारा प्रदान नहीं की गई है, बल्कि इसके तहत केवल सुरक्षित रखी गई है। इस प्रकार, यह सोचना कठिन है कि हाईकोर्ट के अधिकार क्षेत्र को केवल इसलिए बाधित माना जाएगा क्योंकि पुनरीक्षण अधिकार क्षेत्र (Revisional Jurisdiction) का भी लाभ उठाया जा सकता था।”

अंतिम निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि हाईकोर्ट ने डायरेक्टर की जिम्मेदारी और धारा 482 की स्वीकार्यता, दोनों ही कानूनी पहलुओं पर गलती की है।

अदालत ने आदेश दिया:

“अपीलकर्ता सरोज पांडे के खिलाफ कार्यवाही रद्द की जाती है। यह स्पष्ट किया जाता है कि यहां की गई कोई भी टिप्पणी केवल उनके मामले के विचार के लिए है और इसका सह-अभियुक्तों के ट्रायल पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।”

अदालत ने अपील स्वीकार करते हुए सभी लंबित आवेदनों को निस्तारित कर दिया।

मामले का विवरण:

  • केस टाइटल: सरोज पांडे बनाम जी.एन.सी.टी.डी. और अन्य (Saroj Pandey v. Govt. of NCT of Delhi and Ors.)
  • केस नंबर: क्रिमिनल अपील 2026 (@ SLP (Crl.) No. 21322 of 2025)
  • पीठ: जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह
  • दिनांक: 7 अप्रैल, 2026

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