सुप्रीम कोर्ट ने अदालती कार्यवाही और मामलों को सूचीबद्ध (listing) करने की प्रक्रिया में एक बड़ा बदलाव किया है। कोर्ट ने एक नए प्रक्रियात्मक निर्देश में स्पष्ट किया है कि “अत्यधिक जरूरी मामले” (exceptionally urgent matters), जिन्हें लिस्टिंग प्रक्रिया तक टाला नहीं जा सकता, उनका उल्लेख अब केवल भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के समक्ष ही किया जाएगा। यह नियम तब भी लागू रहेगा जब CJI किसी संविधान पीठ की अध्यक्षता कर रहे हों।
6 अप्रैल को जारी इस सर्कुलर ने उस पुरानी व्यवस्था को बदल दिया है, जिसमें CJI की अनुपलब्धता या संविधान पीठ में व्यस्तता के दौरान वरिष्ठतम जज के सामने मामलों का उल्लेख करने की अनुमति होती थी।
केवल ‘कोर्ट नंबर 1’ के पास होगा अधिकार
नए नियमों के अनुसार, अब वकीलों या याचिकाकर्ताओं के पास संविधान पीठ की सुनवाई के दौरान दूसरे वरिष्ठ जजों के पास जाने का विकल्प नहीं होगा। यह केंद्रीकृत व्यवस्था केवल उन मामलों के लिए है जिनमें तत्काल सुनवाई की आवश्यकता होती है।
सर्कुलर में कहा गया है: “ऐसे अत्यधिक जरूरी मामले, जिन्हें 29 नवंबर, 2025 के सर्कुलर के अनुसार लिस्टिंग के लिए इंतजार नहीं कराया जा सकता, उन्हें ‘कोर्ट नंबर 1’ में मेंशन करने की अनुमति है, भले ही माननीय मुख्य न्यायाधीश संविधान पीठ की अध्यक्षता कर रहे हों।”
सुप्रीम कोर्ट ने जोर देकर कहा है कि ऐसे हाई-प्रोयोरिटी मामलों का उल्लेख अब “किसी भी अन्य बेंच के समक्ष करने की अनुमति नहीं है।”
प्रोटोकॉल में बड़ा बदलाव
इस अधिसूचना से पहले, स्थापित प्रक्रिया यह थी कि यदि CJI किसी विशेष पीठ या संविधान पीठ में व्यस्त होते थे, तो पदानुक्रम में दूसरे नंबर के वरिष्ठतम जज इन जरूरी उल्लेखों को सुनते थे। यह व्यवस्था इसलिए थी ताकि समय के प्रति संवेदनशील कानूनी राहत या स्टे (stay) जैसे मामलों में संविधान पीठ की लंबी सुनवाई के कारण देरी न हो।
अब सभी ‘मेंशनिंग’ को ‘कोर्ट नंबर 1’ तक सीमित कर, प्रशासन ने ‘मास्टर ऑफ द रोस्टर’ के रूप में CJI की भूमिका को और मजबूत किया है। इससे यह सुनिश्चित होगा कि सबसे महत्वपूर्ण न्यायिक हस्तक्षेपों के लिए संपर्क का केवल एक ही बिंदु हो।
यह नया अपडेट 29 नवंबर, 2025 के उस पिछले सर्कुलर के बाद आया है, जिसमें सामान्य लिस्टिंग प्रक्रियाओं को निर्धारित किया गया था। 6 अप्रैल का यह निर्देश विशेष रूप से उन असाधारण परिस्थितियों के लिए है जहाँ मामला डिजिटल या फिजिकल लिस्टिंग की कतार में नहीं लग सकता।
सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री ने फिलहाल यह स्पष्ट नहीं किया है कि किन मामलों को “अत्यधिक जरूरी” की श्रेणी में रखा जाएगा। यह निर्णय पूरी तरह से CJI के विवेक पर छोड़ दिया गया है।

