इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में एकल न्यायाधीश के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें नाबालिग बच्चे की कस्टडी से जुड़ी हेबियस कॉर्पस याचिका को इस आधार पर खारिज कर दिया गया था कि पक्षकारों के पास ‘गार्जियन एंड वार्ड्स एक्ट’ के तहत वैकल्पिक उपचार मौजूद है। मुख्य न्यायमूर्ति अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि जब अत्यंत कम उम्र के बच्चे का सर्वोत्तम हित शामिल हो, तब हाईकोर्ट अपने असाधारण अधिकार क्षेत्र का उपयोग कर सकता है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला (स्पेशल अपील संख्या 1205/2025) मां (अपीलार्थी संख्या 1) और उसके पति (प्रतिवादी संख्या 6) के बीच वैवाहिक विवाद से जुड़ा है। अपीलार्थी का आरोप था कि उसके 15 महीने के बेटे को प्रतिवादी द्वारा जबरन ले जाया गया है। बाल कल्याण समिति (C.W.C.) ने 10 सितंबर 2025 को आदेश जारी कर पिता को निर्देश दिया था कि वह बच्चे की कस्टडी मां को सौंप दे, लेकिन इस आदेश का पालन नहीं किया गया।
इसके बाद मां ने हेबियस कॉर्पस याचिका (संख्या 931/2025) दाखिल की, जिसे एकल न्यायाधीश ने 6 नवंबर 2025 को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि पिता के पास बच्चे की कस्टडी को “अवैध या अनुचित” नहीं माना जा सकता और पक्षकारों को उचित फोरम (गार्जियन एंड वार्ड्स एक्ट) में जाना चाहिए।
पक्षकारों के तर्क
अपीलार्थी के वकील ने तर्क दिया कि प्रतिवादी पुलिस सेवा में होने के कारण C.W.C. के आदेश की अवहेलना कर रहा है और उसके प्रभाव के चलते कोई कार्रवाई नहीं की जा रही है। यह भी कहा गया कि 15 महीने के बच्चे का कल्याण स्वाभाविक रूप से उसकी मां के पास ही है।
वहीं, पिता (प्रतिवादी) की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ने दलील दी कि C.W.C. का आदेश एकपक्षीय था और उसके खिलाफ अपील लंबित है। उन्होंने तर्क दिया कि प्राकृतिक अभिभावक होने के नाते पिता के पास बच्चे की कस्टडी अवैध नहीं है। प्रतिवादी ने यह भी दावा किया कि मां के पास बच्चे के पालन-पोषण के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं हैं।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
खंडपीठ ने पाया कि एकल न्यायाधीश ने कस्टडी के दावे पर गुण-दोष के आधार पर विचार नहीं किया। हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के यशिता साहू बनाम राजस्थान राज्य (2020) मामले का संदर्भ देते हुए कहा:
“यह तर्क देना अब बहुत देर हो चुकी है कि यदि बच्चा दूसरे माता-पिता की कस्टडी में है तो हेबियस कॉर्पस याचिका विचारणीय नहीं है। अदालत बच्चे के सर्वोत्तम हित के लिए अपने असाधारण रिट अधिकार क्षेत्र का उपयोग कर सकती है।”
अदालत ने गोहर बेगम बनाम सुग्गी (1960) मामले का भी उल्लेख किया और जोर दिया कि कस्टडी के मामलों में केवल “बच्चे का कल्याण ही सर्वोपरि विचार” होता है। हाईकोर्ट ने इस बात पर भी चिंता व्यक्त की कि अदालती निर्देशों के बावजूद पुलिस अधिकारी केवल एक-दूसरे को पत्र लिखने में व्यस्त रहे और बच्चा C.W.C. के आदेशों के उल्लंघन में पुलिस लाइन्स, जौनपुर में ही रहा।
निर्णय
स्पेशल अपील स्वीकार करते हुए खंडपीठ ने एकल न्यायाधीश के 6 नवंबर 2025 के आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने हेबियस कॉर्पस रिट याचिका संख्या 931/2025 को उसके मूल नंबर पर बहाल करने का आदेश दिया।
अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि “इस मामले पर रिट कोर्ट द्वारा गुण-दोष के आधार पर विचार किया जाना चाहिए जहां पक्षकारों को अपनी पूरी बात रखने का अवसर मिले।” याचिका को 16 अप्रैल 2026 को उचित पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया है।
केस विवरण (Case Details Block)
- केस टाइटल: श्रीमती रिंकू राम @ रिंकू देवी एवं अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं 7 अन्य
- केस नंबर: स्पेशल अपील संख्या 1205 ऑफ 2025
- पीठ: मुख्य न्यायमूर्ति अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र
- दिनांक: 03 अप्रैल, 2026

