इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश राज्य द्वारा दायर भूमि अधिग्रहण की एक अपील को खारिज कर दिया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि मृत व्यक्ति के विरुद्ध दायर की गई अपील कानून की दृष्टि में ‘शून्य’ (nullity) और ‘अस्तित्वहीन’ (non-est) होती है। जस्टिस संदीप जैन ने अपने फैसले में कहा कि सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश XXII नियम 4 के प्रावधान, जो कानूनी वारिसों के प्रतिस्थापन (substitution) से संबंधित हैं, उन मामलों में लागू नहीं किए जा सकते जहाँ अपील दायर करते समय प्रतिवादी पहले ही मर चुका हो।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला भूमि अधिग्रहण संदर्भ (L.A.R. संख्या 46/1991) से जुड़ा है, जिसमें एडिशनल डिस्ट्रिक्ट जज/भूमि अधिग्रहण जज, मऊ ने 31 मार्च 2018 को भूमि स्वामियों को 2,00,000 रुपये प्रति एकड़ की दर से मुआवजा देने का आदेश दिया था।
जब राज्य सरकार ने मुआवजे का भुगतान नहीं किया, तो भूमि स्वामियों ने निष्पादन (execution) कार्यवाही शुरू की। इस दौरान एक डिक्री-धारक कैलाश सिंह का 27 जून 2021 को निधन हो गया। उनके कानूनी वारिस कुंवर प्रकाश सिंह को 27 अगस्त 2021 को निष्पादन मामले में रिकॉर्ड पर लाया गया। इन तथ्यों की जानकारी होने के बावजूद, राज्य सरकार ने 9 सितंबर 2022 को मृत कैलाश सिंह को प्रतिवादी बनाते हुए वर्तमान अपील दायर की।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता (उत्तर प्रदेश राज्य): राज्य की ओर से अपील दाखिल करने में हुए 1516 दिनों के विलंब को माफ करने की प्रार्थना की गई। सरकार का तर्क था कि उच्च अधिकारियों से अनुमति मिलने में समय लगा। प्रतिवादी की मृत्यु के संबंध में राज्य ने दावा किया कि उन्हें इसकी जानकारी सितंबर 2025 में तब हुई जब वारिसों ने ‘एबेटमेंट’ (abatement) आवेदन दिया।
प्रतिवादी (भूमि स्वामी): भूमि स्वामियों के वकील ने दलील दी कि राज्य सरकार निष्पादन कार्यवाही के माध्यम से मृत्यु के तथ्य से पूरी तरह अवगत थी। यह कहा गया कि राज्य अपनी कानूनी प्रक्रिया में “घोर लापरवाह” रहा है और मृत व्यक्ति के खिलाफ की गई अपील कानूनन सुनवाई योग्य नहीं है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
हाईकोर्ट ने पाया कि राज्य सरकार अपनी कानूनी रेमेडी का पालन करने में लापरवाह रही है। कोर्ट ने गौर किया कि निष्पादन अदालत ने मुआवजे के भुगतान के लिए 2021 में ही राज्य के खजाने (treasury) को अटैच करने का आदेश दिया था, जिससे स्पष्ट है कि राज्य को मृत्यु की जानकारी पहले से थी।
जस्टिस संदीप जैन ने मृत व्यक्ति के खिलाफ अपील की स्थिति पर जोर देते हुए कहा:
“यह स्पष्ट है कि मृत प्रतिवादी के खिलाफ राज्य की अपील शून्य और अस्तित्वहीन है। राज्य का आचरण उसे इस न्यायालय से कोई राहत पाने से रोकता है।”
कोर्ट ने कलकत्ता हाईकोर्ट के स्टेट ऑफ वेस्ट बंगाल बनाम मनीषा मैती (1963) मामले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि यदि अपील एक मृत व्यक्ति के खिलाफ की गई है, तो वह ‘स्टिल बोर्न’ (मृत पैदा हुई) है और कानून की नजर में कोई अपील नहीं है।
दिल्ली हाईकोर्ट के रविंदर डबास बनाम दिल्ली सरकार (2023) मामले का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने कहा:
“मृत व्यक्ति के खिलाफ दायर अपील स्पष्ट रूप से विचारणीय नहीं है और यह शून्य है… CPC के आदेश XXII नियम 4 के प्रावधान केवल तभी लागू होते हैं जब कार्यवाही लंबित रहने के दौरान किसी पक्ष की मृत्यु होती है।”
न्यायालय का निर्णय
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार द्वारा दायर विलंब माफी और प्रतिस्थापन के आवेदनों को कानूनन पोषणीय न मानते हुए खारिज कर दिया। इसके परिणामस्वरूप, मृत व्यक्ति के खिलाफ दायर अपील को भी ‘शून्य’ घोषित करते हुए खारिज कर दिया गया। न्यायालय ने रेफरेंस कोर्ट के 31 मार्च 2018 के मुआवजे के फैसले की पुष्टि की।
मामले का विवरण:
- केस टाइटल: उत्तर प्रदेश राज्य बनाम उदय भान (मृत) एवं अन्य
- केस संख्या: फर्स्ट अपील डिफेक्टिव संख्या 221/2022
- पीठ: जस्टिस संदीप जैन
- दिनांक: 1 अप्रैल, 2026

