30 दिनों के भीतर निर्णय न देने पर नियुक्ति को माना जाएगा ‘डीम्ड अप्रूवल’; इलाहाबाद हाईकोर्ट ने क्लर्क की नियुक्ति रद्द करने वाला BSA का आदेश पलटा

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गोरखपुर के जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी (BSA) द्वारा एक सहायता प्राप्त अल्पसंख्यक संस्थान में क्लर्क की नियुक्ति को अस्वीकार करने वाले आदेश को रद्द कर दिया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि चूंकि BSA निर्धारित 30 दिनों की वैधानिक अवधि के भीतर अपना निर्णय सूचित करने में विफल रहे, इसलिए ‘डीम्ड अप्रूवल’ (माना गया अनुमोदन) के सिद्धांत के तहत नियुक्ति को अंतिम माना जाएगा।

यह निर्णय जस्टिस मंजू रानी चौहान ने सेंट जॉन्स गर्ल्स जूनियर हाई स्कूल की प्रबंध समिति द्वारा दायर एक रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए सुनाया।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता, सेंट जॉन्स गर्ल्स जूनियर हाई स्कूल, एक मान्यता प्राप्त और सहायता प्राप्त अल्पसंख्यक संस्थान है। साल 2016 में BSA से अनुमति मिलने के बाद, संस्थान ने दो समाचार पत्रों में क्लर्क के पद के लिए विज्ञापन जारी किया। 25 मई, 2017 को चयन समिति ने विकास अलेक्जेंडर को क्लर्क के पद के लिए सर्वसम्मति से चुन लिया। इस समिति में BSA के नामित प्रतिनिधि के रूप में राजकीय हाई स्कूल के प्रधानाचार्य श्री जितेंद्र कुमार पांडेय भी शामिल थे।

संस्थान ने 4 सितंबर, 2017 को चयन से संबंधित दस्तावेज BSA कार्यालय में जमा किए और देरी के कारण के रूप में गोरखपुर में आई बाढ़ का हवाला दिया। हालांकि, 7 अक्टूबर, 2017 को संस्थान को BSA का 28 सितंबर, 2017 का एक आदेश प्राप्त हुआ, जिसमें इस नियुक्ति को अस्वीकार कर दिया गया था। याचिकाकर्ता ने इस आदेश को इस आधार पर चुनौती दी कि यह 30 दिनों की वैधानिक समय सीमा के बाद सूचित किया गया था, जो 1984 के नियमों के नियम 15(5)(iii) के तहत ‘डीम्ड अप्रूवल’ को प्रभावी बनाता है।

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता की ओर से: काउंसिल ए.डी. सॉन्डर्स ने तर्क दिया कि उत्तर प्रदेश मान्यता प्राप्त बेसिक स्कूल (Recruitment and Conditions of Service of Ministerial Staff and Group D Employees) नियमावली, 1984 के नियम 15(5)(iii) के तहत, BSA को एक महीने के भीतर निर्णय देना अनिवार्य है। चूंकि दस्तावेज 4 सितंबर को जमा किए गए थे और अस्वीकृति की सूचना 7 अक्टूबर को मिली, इसलिए 4 अक्टूबर को ही ‘डीम्ड अप्रूवल’ प्रभावी हो गया था। याचिकाकर्ता ने संत राम बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और संजय कुमार सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के मामलों का हवाला देते हुए कहा कि सूचना 30 दिनों के भीतर ही मिलनी चाहिए।

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उत्तरदाताओं की ओर से: राज्य सरकार ने याचिका की विचारणीयता पर सवाल उठाते हुए तर्क दिया कि प्रबंध समिति के पास ‘लोकस स्टैंडी’ (वाद का अधिकार) नहीं है क्योंकि चयनित उम्मीदवार सह-याचिकाकर्ता नहीं था। इसके अलावा, उन्होंने तर्क दिया कि चयन समिति का गठन गलत था क्योंकि BSA ने श्री जितेंद्र कुमार पांडेय को “आधिकारिक” रूप से नामित नहीं किया था। उन्होंने दस्तावेजों को भेजने में हुई तीन महीने से अधिक की देरी और विज्ञापन के प्रसार पर भी आपत्ति जताई।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

हाईकोर्ट ने कई महत्वपूर्ण कानूनी बिंदुओं पर विचार किया:

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1. डीम्ड अप्रूवल पर: हाईकोर्ट ने पाया कि दस्तावेज 4 सितंबर, 2017 को प्राप्त हुए थे। यदि फाइल पर की गई आंतरिक मार्किंग (6 सितंबर) को भी आधार माना जाए, तो 30 दिन की अवधि 5 अक्टूबर को समाप्त हो गई थी। जबकि आदेश की सूचना 7 अक्टूबर को दी गई।

“1984 के नियमों के नियम 15(5) में निहित प्रावधानों को देखते हुए… निर्धारित अवधि की समाप्ति पर संबंधित चयन को स्वतः ही अनुमोदित (deemed to have been approved) माना जाएगा।”

2. BSA के नामित प्रतिनिधि पर: हाईकोर्ट ने BSA के इस दावे को खारिज कर दिया कि प्रतिनिधि अनाधिकृत था। हाईकोर्ट ने गौर किया कि श्री जितेंद्र कुमार पांडेय ने बिना किसी आपत्ति के कार्यवाही में भाग लिया और हस्ताक्षर किए।

“एक बार जब BSA कार्यालय का प्रतिनिधित्व करने वाले प्रतिनिधि ने वास्तव में बिना किसी विरोध के चयन प्रक्रिया में भाग लिया है, तो यह कहना कि उसका नाम विशेष रूप से सूचित नहीं किया गया था, एक तकनीकी आधार है जिसे वैध चयन को रद्द करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।”

हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश राज्य बनाम गुंजन सिंह और BSA अंबेडकर नगर बनाम चंद्रप्रकाश त्रिपाठी के मामलों का हवाला देते हुए कहा कि किसी चयन प्रक्रिया को केवल इस आधार पर विफल नहीं किया जा सकता कि प्राधिकारी ने औपचारिक रूप से प्रतिनिधि का नाम नहीं भेजा था, जबकि प्रतिनिधि ने वास्तव में भाग लिया था।

3. दस्तावेज जमा करने में देरी पर: हाईकोर्ट ने बाढ़ के कारण हुई देरी को “उचित और पर्याप्त कारण” माना। हाईकोर्ट ने कहा कि नियम 15(3) और (4) निर्देशिका (directory) प्रकृति के हैं, अनिवार्य (mandatory) नहीं।

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4. लोकस स्टैंडी पर: हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के अधिकार पर उठाई गई प्रारंभिक आपत्ति को खारिज कर दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि यह याचिका 2018 से लंबित है और इस स्तर पर ऐसी आपत्ति उठाना केवल मामले को लटकाने जैसा है।

निर्णय

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि BSA का आदेश “मनमाना” था और इसमें “विवेक का इस्तेमाल नहीं” किया गया था। परिणामस्वरूप, हाईकोर्ट ने:

  • 28 सितंबर, 2017 के BSA के आदेश को रद्द कर दिया।
  • रिट याचिका को स्वीकार कर लिया।
  • निर्देश दिया कि चयनित उम्मीदवार को वेतन भुगतान सहित सभी परिणामी लाभ प्रदान किए जाएं।

केस विवरण:

  • केस शीर्षक: सी/एम सेंट जॉन्स गर्ल्स जूनियर हाई स्कूल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य
  • केस संख्या: रिट – ए संख्या 10958/2018
  • बेंच: जस्टिस मंजू रानी चौहान
  • तारीख: 3 अप्रैल, 2026

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