त्रिपुरा हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को अंतरराष्ट्रीय सीमा के पार से होने वाली अवैध घुसपैठ को रोकने के लिए उठाए गए कदमों पर अगले 90 दिनों के भीतर एक विस्तृत रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया है। यह निर्देश राज्य की आंतरिक सुरक्षा और केंद्र सरकार के दिशा-निर्देशों के प्रभावी कार्यान्वयन को लेकर जताई गई चिंताओं के बीच आया है।
मुख्य न्यायाधीश एम.एस. रामचंद्र राव की अध्यक्षता वाली एक खंडपीठ ने गुरुवार को तीन व्यक्तियों द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश जारी किया। याचिकाकर्ताओं में टिपरा मोथा पार्टी के विधायक रंजीत देबबर्मा भी शामिल हैं।
अदालत में दायर याचिका में आरोप लगाया गया है कि केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) द्वारा घुसपैठ रोकने के लिए स्पष्ट गाइडलाइन्स जारी किए जाने के बावजूद, राज्य सरकार इस समस्या से निपटने के लिए प्रभावी कदम उठाने में विफल रही है।
याचिकाकर्ताओं का प्रतिनिधित्व कर रहे अधिवक्ता एंथनी देबबर्मा ने शुक्रवार को जानकारी देते हुए बताया, “खंडपीठ ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह अगले तीन महीनों के भीतर गृह मंत्रालय के दिशा-निर्देशों के अनुसार घुसपैठियों की पहचान करने, उन्हें हिरासत में लेने और वापस भेजने (डिपॉर्ट करने) के लिए की गई कार्रवाई पर एक विस्तृत रिपोर्ट सौंपे।”
त्रिपुरा बांग्लादेश के साथ 856 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा साझा करता है। हालांकि इस सीमा का लगभग 85 प्रतिशत हिस्सा पहले ही फेंसिंग (बाड़) से ढका जा चुका है, लेकिन याचिकाकर्ताओं का दावा है कि निगरानी और प्रवर्तन में खामियां अभी भी राज्य की सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बनी हुई हैं।
विधायक रंजीत देबबर्मा ने कोर्ट के आदेश के बाद कहा कि घुसपैठ को तुरंत रोका जाना चाहिए ताकि राज्य की आंतरिक सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि अन्य राज्य गृह मंत्रालय के प्रोटोकॉल के तहत अवैध प्रवासियों की पहचान और निर्वासन के लिए सक्रिय अभियान चला रहे हैं, लेकिन त्रिपुरा सरकार इस दिशा में पर्याप्त काम नहीं कर रही है।
देबबर्मा ने कहा, “मैंने कई मंचों पर यह मुद्दा उठाया था, लेकिन मुझे उचित प्रतिक्रिया नहीं मिली, जिसके कारण मुझे अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा। अब इस मामले पर अंतिम फैसला अदालत ही करेगी।”
हाईकोर्ट द्वारा दी गई तीन महीने की समय सीमा ने अब राज्य सरकार पर सुरक्षा अभियानों का पारदर्शी डेटा प्रदान करने की जिम्मेदारी डाल दी है। उम्मीद है कि आगामी रिपोर्ट में राज्य पुलिस और केंद्रीय एजेंसियों के बीच समन्वय, मौजूदा डिटेंशन सेंटरों की स्थिति और लंबित निर्वासन की समयसीमा का विस्तृत विवरण होगा।
अदालत इस साल के अंत में राज्य की रिपोर्ट की समीक्षा करेगी, जिसके बाद यह तय होगा कि सीमा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए किसी और न्यायिक हस्तक्षेप या संरचनात्मक बदलाव की आवश्यकता है या नहीं।

