सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक याचिकाकर्ता के आचरण पर कड़ी आपत्ति जताई, जिसके पिता ने कथित तौर पर भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत के भाई को फोन करके कोर्ट द्वारा पारित एक आदेश पर सवाल उठाया था। अदालत ने इस मामले में आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने की चेतावनी दी है।
CJI सूर्य कांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की पीठ के समक्ष सुनवाई के दौरान स्वयं मुख्य न्यायाधीश ने इस घटना का खुलासा किया। उन्होंने बताया कि याचिकाकर्ता के पिता ने उनके परिवार के सदस्य से संपर्क कर अदालती आदेश की समीक्षा करने की कोशिश की।
CJI कांत ने खुली अदालत में कहा, “उसने मेरे भाई को फोन किया और उससे पूछा कि भारत के मुख्य न्यायाधीश ने यह आदेश कैसे पारित किया। क्या वह हमें डिक्टेट करेगा? यह उसका आचरण है।” उन्होंने इसे “घोर दुराचार” (sheer misconduct) करार दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला निखिल कुमार पुनिया नामक व्यक्ति द्वारा दायर एक याचिका से जुड़ा है। पुनिया, जो जाट पुनिया समुदाय (उच्च जाति हिंदू पृष्ठभूमि) से ताल्लुक रखते हैं, ने बौद्ध धर्म अपनाने के बाद अल्पसंख्यक आरक्षण का लाभ लेने के लिए अदालत का रुख किया था।
28 जनवरी को हुई शुरुआती सुनवाई में पीठ ने इस याचिका पर गंभीर आपत्ति जताई थी। कोर्ट ने इसे “एक नए प्रकार की धोखाधड़ी” बताते हुए सवाल किया था कि सामान्य श्रेणी का कोई उम्मीदवार केवल आरक्षण के उद्देश्य से धर्मांतरण करके अल्पसंख्यक प्रमाण पत्र कैसे प्राप्त कर सकता है। इसके बाद, कोर्ट ने हरियाणा सरकार को निर्देश दिया था कि वह अल्पसंख्यक प्रमाण पत्र जारी करने के दिशा-निर्देशों के बारे में जानकारी दे।
खुली अदालत में तीखी बहस
बुधवार को जब मामले की दोबारा सुनवाई शुरू हुई, तो CJI कांत ने याचिकाकर्ता के वकील को इस अनुचित हस्तक्षेप के बारे में बताया।
CJI ने वकील से पूछा, “अब आप हमें बताएं कि हम आपके मुवक्किल के पिता के खिलाफ आपराधिक अवमानना क्यों न शुरू करें। आप इस मामले में गंभीर नहीं हैं। क्या आपको पता है कि उसने क्या किया है? क्या मुझे इसका खुलासा खुली अदालत में करना चाहिए?”
याचिकाकर्ता के वकील ने इस घटना से अनभिज्ञता जताते हुए कहा, “मुझे इस बारे में जानकारी नहीं है, माई लॉर्ड। हमें कोई रिपोर्ट नहीं मिली है।”
CJI कांत ने सख्त लहजे में कहा कि वकील को ऐसे मुवक्किल का केस छोड़ने पर विचार करना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया, “कोई ऐसा करने की हिम्मत नहीं करता। और आपको लगता है कि मैं इस वजह से मामले को ट्रांसफर कर दूंगा? मैंने पिछले 23 वर्षों से ऐसे तत्वों से निपटा है।” उन्होंने यह भी कहा कि अगर वह व्यक्ति भारत से बाहर भी है, तो भी कोर्ट को पता है कि उनसे कैसे निपटना है।
राज्य सरकार को कड़ी चेतावनी
याचिकाकर्ता के आचरण के अलावा, कोर्ट ने इस बात पर भी गौर किया कि हरियाणा सरकार ने अल्पसंख्यक प्रमाण पत्र के संबंध में अभी तक अपनी रिपोर्ट दाखिल नहीं की है।
पीठ ने हरियाणा के अतिरिक्त महाधिवक्ता को निर्देश दिया कि वे जल्द से जल्द रिपोर्ट सौंपें। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, “यदि अगली तारीख तक रिपोर्ट दाखिल नहीं की गई, तो हरियाणा के मुख्य सचिव को व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होना होगा।”
इस मामले की अगली सुनवाई अगले सप्ताह होगी।

