पिता के स्टांप शुल्क बकाया के लिए बेटे केवल विरासत में मिली संपत्ति की सीमा तक ही उत्तरदायी: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंडियन स्टांप एक्ट, 1899 के तहत एक मृतक डिफॉल्टर के कानूनी प्रतिनिधियों के खिलाफ वसूली कार्यवाही के संबंध में महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति स्पष्ट की है। जस्टिस क्षितिज शैलेंद्र ने कहा कि यद्यपि कानूनी वारिसों के खिलाफ वसूली कार्यवाही जारी रह सकती है, लेकिन उनका दायित्व कड़ाई से मृतक की उस संपत्ति की सीमा तक ही सीमित है जो उनके हाथ में आई है।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता राज कुमार वर्मा और दीपक सोनी, दिवंगत राकेश कुमार वर्मा के पुत्र हैं। उनके पिता ने वर्ष 2020 में पंजीकृत बैनामों के माध्यम से कृषि भूखंड खरीदे थे। इसके बाद, उनके खिलाफ स्टांप एक्ट की धारा 47-ए के तहत कार्यवाही शुरू की गई, जिसके परिणामस्वरूप 12 मई, 2022 को अपर जिला मजिस्ट्रेट (वित्त एवं राजस्व), आगरा ने ₹16,55,150/- की कमी और जुर्माना आरोपित किया।

वर्ष 2022 में ही वसूली प्रमाणपत्र (रिकवरी सर्टिफिकेट) जारी कर दिया गया था। जब कमिश्नर के समक्ष इस आदेश के विरुद्ध निगरानी (रिवीजन) लंबित थी, तब राकेश कुमार वर्मा का निधन हो गया। याचिकाकर्ताओं ने कानूनी प्रतिनिधियों के रूप में खुद को प्रतिस्थापित किया; हालांकि, 29 अगस्त, 2025 को रिवीजन खारिज हो गया, जिससे वसूली कार्यवाही फिर से शुरू हो गई। इसके बाद याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट का रुख करते हुए दंडात्मक कार्रवाई और अपनी व्यक्तिगत संपत्तियों की कुर्की पर रोक लगाने की मांग की।

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ताओं की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता श्री अनुपम कुलश्रेष्ठ ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ताओं को दंडात्मक कार्रवाई का पात्र नहीं बनाया जा सकता क्योंकि उन्हें अपने पिता से कोई चल या अचल संपत्ति, नकदी या गहने प्राप्त नहीं हुए हैं। उन्होंने इस संबंध में हलफनामे भी दाखिल किए। यह भी तर्क दिया गया कि संबंधित बैनामों को 28 अक्टूबर, 2024 को सिविल कोर्ट द्वारा शून्य घोषित कर दिया गया था, जिसका अर्थ है कि उनके पिता को कोई संपत्ति वास्तव में हस्तांतरित ही नहीं हुई थी।

READ ALSO  धारा 138 NI एक्ट | चेक जारी होने के 10 साल बाद दिया गया मुआवजा अत्यधिक नहीं: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने दोषसिद्धि बरकरार रखी

राज्य-प्रतिवादियों की ओर से: स्थायी अधिवक्ता ने तर्क दिया कि याचिका विचारणीय नहीं है क्योंकि कमी और जुर्माना लगाने वाले मूल आदेशों को चुनौती नहीं दी गई है। उन्होंने कहा कि पिता की मृत्यु वारिसों को उत्तरदायित्व से मुक्त नहीं करती है और राज्य कानून के तहत निर्धारित वसूली के किसी भी तरीके को अपनाने के लिए सक्षम है।

हाईकोर्ट का विश्लेषण

हाईकोर्ट ने स्टांप एक्ट की धारा 48 और उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 (U.P. Revenue Code, 2006) के बीच संबंधों की जांच की।

बैनामों के शून्य होने पर: हाईकोर्ट ने पाया कि स्टांप एक्ट की धारा 2(14) के तहत, “इंस्ट्रूमेंट” में वे दस्तावेज शामिल हैं जिनसे कोई अधिकार या दायित्व “सृजित होना प्रतीत होता है” (purports to be created)। कुंवरपाल शर्मा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2003) का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि सिविल कोर्ट द्वारा बाद में की गई शून्यता की घोषणा “स्टांप एक्ट के तहत कार्यवाही में दायित्व निर्धारित करने के उद्देश्य से पूरी तरह से अप्रासंगिक है।”

READ ALSO  दिल्ली दंगे 2020: देवांगना कलिता ने सीएए विरोधी प्रदर्शनों के वीडियो की मांग करते हुए हाई कोर्ट का रुख किया

कानूनी प्रतिनिधियों की स्थिति पर: हाईकोर्ट ने नोट किया कि याचिकाकर्ताओं ने रिवीजन में खुद को प्रतिस्थापित करके अपनी स्थिति “कानूनी प्रतिनिधि” के रूप में स्वीकार की थी। जस्टिस शैलेंद्र ने राजस्व संहिता की धारा 181 पर जोर दिया, जो कानूनी प्रतिनिधियों के खिलाफ कार्यवाही जारी रखने की अनुमति देती है मानो वे स्वयं डिफॉल्टर हों।

हालांकि, हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण सीमा रेखा रेखांकित की:

“धारा 181 के उप-धारा (1) का प्रावधान स्पष्ट रूप से यह कहता है कि कानूनी प्रतिनिधि केवल मृतक की उस संपत्ति की सीमा तक ही उत्तरदायी होंगे जो उनके हाथों में आई है।”

अदालत का फैसला

हाईकोर्ट ने निम्नलिखित निर्देशों के साथ याचिका का निस्तारण किया:

  1. आपत्ति दर्ज करने की स्वतंत्रता: याचिकाकर्ता एक महीने के भीतर कलेक्टर, आगरा के समक्ष अपनी आपत्तियां दर्ज कर सकते हैं, जिसमें उन्हें अपने पिता के मृत्यु से 3 वर्ष पहले के आयकर रिटर्न (ITR) और अपने स्वयं के वर्तमान ITR संलग्न करने होंगे।
  2. कलेक्टर द्वारा जांच: कलेक्टर विरासत में मिली संपत्ति की सीमा को सत्यापित करने के लिए जांच करेंगे और चार महीने के भीतर एक सकारण आदेश के माध्यम से आपत्तियों का निर्णय करेंगे।
  3. सीमित दायित्व: यदि उत्तरदायित्व पाया जाता है, तो कलेक्टर राजस्व संहिता की धारा 170(1) के तहत वसूली करेंगे, लेकिन केवल वारिसों के पास मौजूद मृतक की संपत्ति की सीमा तक ही।
  4. अंतरिम सुरक्षा: आपत्तियों पर निर्णय होने तक या चार महीने की अवधि तक, याचिकाकर्ताओं के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई (गिरफ्तारी या हिरासत) नहीं की जाएगी।
  5. संपत्ति पर निषेधाज्ञा: सार्वजनिक धन की सुरक्षा के लिए, याचिकाकर्ताओं को उनकी चल और अचल संपत्तियों पर तीसरे पक्ष का अधिकार सृजित करने से रोक दिया गया है और उन्हें अपने खातों में बकाया राशि के बराबर बैलेंस बनाए रखने का निर्देश दिया गया है।
READ ALSO  दिल्ली  ने एमसीडी को आशा किरण में कैदियों के पुनर्वास के लिए भवन समाज कल्याण विभाग को हस्तांतरित करने का आदेश दिया

मामले का विवरण:

  • केस शीर्षक: राज कुमार वर्मा और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और 4 अन्य
  • केस संख्या: WRIT-C No. 10589 of 2026
  • बेंच: जस्टिस क्षितिज शैलेंद्र
  • फैसले की तिथि: 25 मार्च, 2026

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles