बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद पीठ ने वर्ष 2004 के मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण (MACT) के एक फैसले को संशोधित करते हुए मृतक के परिजनों को मिलने वाले मुआवजे में महत्वपूर्ण वृद्धि की है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि “उचित मुआवजा” प्रदान करना न्यायालय का कानूनी दायित्व है और दावेदारों द्वारा अलग से कोई अपील या क्रॉस-ऑब्जेक्शन दायर न किए जाने की स्थिति में भी कोर्ट मुआवजे की राशि बढ़ा सकता है।
न्यायमूर्ति अभय एस. वाघवासे द्वारा 24 मार्च 2026 को सुनाए गए इस फैसले में नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड की उस अपील को खारिज कर दिया गया, जिसमें कंपनी ने मुआवजे की मात्रा और उत्तरदायित्व (liability) को चुनौती देते हुए ‘कंट्रीब्यूटरी नेग्लिजेंस’ (साझा लापरवाही) का तर्क दिया था।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 14 दिसंबर 1998 को हुई एक भीषण सड़क दुर्घटना से संबंधित है। मृतक बेबीबाई एक एम्बेसडर कार (MP-09-HB-2533) में यात्रा कर रही थीं, तभी मालासवाड़ा शिवार के पास विपरीत दिशा से आ रहे एक ट्रक (NL-5-A-7051) ने कार को टक्कर मार दी। टक्कर इतनी जोरदार थी कि ट्रक पलट गया और सीधे कार के ऊपर गिर गया, जिससे बेबीबाई की मौके पर ही मौत हो गई।
मृतका के पति और दो बच्चों ने शाहदा स्थित MACT में दावा याचिका (नंबर 112/2001) दायर की थी। 27 अप्रैल 2004 को न्यायाधिकरण ने ₹3,09,500 का मुआवजा 9% ब्याज के साथ मंजूर किया और ट्रक मालिक व बीमा कंपनी को संयुक्त रूप से भुगतान का आदेश दिया। बीमा कंपनी ने इस आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की, वहीं सुनवाई के दौरान दावेदारों ने बिना औपचारिक क्रॉस-अपील के मुआवजे को बढ़ाने की मांग की।
पक्षों के तर्क
बीमा कंपनी (अपीलकर्ता) का पक्ष: इंश्योरेंस कंपनी ने तर्क दिया कि चूंकि दुर्घटना सड़क के बीचों-बीच दो वाहनों की आमने-सामने की टक्कर (Head-on collision) थी, इसलिए कार चालक की भी 50% लापरवाही मानी जानी चाहिए थी। कंपनी ने यह भी दावा किया कि न्यायाधिकरण द्वारा निर्धारित मुआवजा अत्यधिक था और इसमें गलत मल्टीप्लायर का उपयोग किया गया था।
दावेदारों (प्रतिवादी) का पक्ष: दावेदारों ने दलील दी कि न्यायाधिकरण द्वारा दिया गया मुआवजा बेहद कम था। उन्होंने बताया कि मृतक सिलाई और कपड़े का व्यवसाय करती थीं और उनकी आय को कोर्ट ने काफी कम आंका है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
कंट्रीब्यूटरी नेग्लिजेंस के मुद्दे पर हाईकोर्ट ने घटनास्थल के पंचनामा (Exh.7/2P) का बारीकी से निरीक्षण किया। कोर्ट ने कहा:
“दुर्घटना स्थल की परिस्थितियों और ट्रक के पलटने के बाद सीधे कार पर गिरने की स्थिति एक विशेष निष्कर्ष निकालने के लिए पर्याप्त संकेत है। ऐसी स्थिति में, जब तक ट्रक की गति अत्यधिक या बहुत तेज नहीं रही होगी, तब तक ट्रक टक्कर के बाद ऐसी स्थिति में नहीं पहुंच सकता था।”
हाईकोर्ट ने यह भी गौर किया कि ट्रक चालक ने गवाही देने के लिए कोर्ट का रुख नहीं किया, जिसके आधार पर कोर्ट ने ट्रक चालक के खिलाफ प्रतिकूल निष्कर्ष निकाला। कोर्ट ने माना कि भारी वाहन होने के नाते ट्रक चालक ने नियंत्रण खो दिया था।
बिना क्रॉस-अपील के मुआवजा बढ़ाने के अधिकार पर न्यायमूर्ति वाघवासे ने यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम कुंती बिनोद पांडे (2020) और नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम वैशाली एच. देवरे (2013) जैसे फैसलों का हवाला दिया। कोर्ट ने उल्लेख किया:
“यह पूरी तरह से स्थापित है कि ट्रिब्यूनल/कोर्ट ‘उचित मुआवजा’ देने के लिए बाध्य है और अपील या क्रॉस-ऑब्जेक्शन की अनुपस्थिति में भी मुआवजा बढ़ाने पर कोई कानूनी रोक नहीं है।”
कोर्ट का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट के सरला वर्मा (2009) और प्रणय सेठी (2017) के सिद्धांतों को लागू करते हुए, हाईकोर्ट ने भविष्य की संभावनाओं (Future Prospects – 25%) और अन्य मदों को जोड़कर नए सिरे से गणना की। कोर्ट ने मृतका की मासिक आय को ₹2,500 से बढ़ाकर ₹3,000 माना।
हाईकोर्ट ने कुल “उचित मुआवजा” ₹5,70,000 निर्धारित किया। चूंकि न्यायाधिकरण ने केवल ₹3,09,500 का आदेश दिया था, इसलिए हाईकोर्ट ने बीमा कंपनी को ₹2,60,500 का अतिरिक्त मुआवजा 12 सप्ताह के भीतर 9% ब्याज के साथ जमा करने का निर्देश दिया।
केस विवरण
केस का नाम: नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम कैलाशचंद पिता माणकचंद भारतीय व अन्य
केस नंबर: फर्स्ट अपील नंबर 195/2011
पीठ: न्यायमूर्ति अभय एस. वाघवासे
फैसले की तारीख: 24 मार्च 2026

