सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि किसी जमीन को स्वीकृत मास्टर प्लान के तहत किसी परियोजना के लिए चिन्हित किया गया है और योजना के लागू होने के समय वह राजस्व रिकॉर्ड में जंगल या ‘डीम्ड फॉरेस्ट’ (Deemed Forest) के रूप में दर्ज नहीं थी, तो बाद में वहां प्राकृतिक रूप से उगे पेड़ों या आक्रामक प्रजातियों (Invasive Species) के आधार पर उसे जंगल घोषित नहीं किया जा सकता।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने ‘नवीन सोलंकी बनाम रेल भूमि विकास प्राधिकरण’ (सिविल अपील संख्या 10656/2024) मामले में यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें दिल्ली के बिजवासन रेलवे स्टेशन के पास रेल भूमि पर विकास कार्य को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया गया था। कोर्ट ने कहा कि मास्टर प्लान की पवित्रता और वैधानिक बाध्यता सर्वोपरि है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद दिल्ली के बिजवासन में स्थित 12.40 हेक्टेयर भूमि (MU4+MU5+MU6) से जुड़ा है। रेल भूमि विकास प्राधिकरण (RLDA) ने दिसंबर 2022 में इस जमीन पर मिश्रित उपयोग (55% आवासीय और 45% वाणिज्यिक) परियोजना के लिए आवेदन मांगे थे।
मूल रूप से एनजीटी (NGT) में श्री आर.एम. आसिफ द्वारा इस परियोजना को चुनौती दी गई थी। उनका तर्क था कि वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 की धारा 2 के तहत यह जमीन ‘डीम्ड फॉरेस्ट’ है क्योंकि यहां लगभग 1,100 पेड़ खड़े हैं। एनजीटी ने 13 फरवरी, 2024 को इस याचिका को खारिज कर दिया था। इसके बाद, नवीन सोलंकी और एक अन्य अधिवक्ता ने ‘लोक-हितैषी व्यक्तियों’ के रूप में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
पक्षों के तर्क
अपीलकर्ताओं का कहना था कि यह भूमि एक सघन वन क्षेत्र है और इसमें पेड़ों की संख्या 100 प्रति एकड़ से अधिक है, जो दिल्ली में ‘डीम्ड फॉरेस्ट’ के लिए निर्धारित मानक है। उन्होंने टी.एन. गोदावर्मन थिरुमुल्कपाद बनाम भारत संघ (1997) मामले का हवाला देते हुए इसे वन संरक्षण अधिनियम के दायरे में लाने की मांग की।
प्रतिवादियों (RLDA और बागमाने डेवलपर्स) ने दलील दी कि 1986 में अधिग्रहण के समय और 2009 में रेलवे को सौंपे जाने के समय यह जमीन बंजर या कृषि योग्य थी। उन्होंने कहा कि बिजवासन रेलवे स्टेशन का पुनर्विकास मास्टर प्लान 2021 का हिस्सा है और यह दिल्ली में भीड़ कम करने के लिए एक आवश्यक सार्वजनिक ढांचागत परियोजना है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि वर्तमान में मौजूद 70% पेड़ ‘विलायती कीकर’ (Prosopis juliflora) जैसी आक्रामक प्रजाति के हैं, जो पर्यावरण के लिए हानिकारक हैं।
कोर्ट का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने मामले के विश्लेषण के लिए दो मुख्य बिंदु तय किए: क्या समय बीतने के साथ मास्टर प्लान की जमीन ‘डीम्ड फॉरेस्ट’ बन सकती है, और इस निर्धारण के लिए ‘कट-ऑफ’ तारीख क्या होनी चाहिए।
1. मास्टर प्लान की प्राथमिकता
पीठ ने कहा कि मास्टर प्लान केवल एक नीतिगत दस्तावेज नहीं है, बल्कि एक वैधानिक दस्तावेज है।
“एक बार जब मास्टर प्लान सक्षम प्राधिकारी द्वारा विधिवत तैयार, अनुमोदित और कानून के अनुसार लागू कर दिया जाता है, तो यह वैधानिक शक्ति प्राप्त कर लेता है और सभी हितधारकों पर बाध्यकारी हो जाता है।”
कोर्ट ने आगे कहा कि यदि मास्टर प्लान बनते समय जमीन वन नहीं थी, तो बाद में वहां वनस्पतियों के उगने से योजना पर प्रभाव नहीं पड़ेगा।
“समय बीतने के साथ वनस्पतियों का उभरना या प्रसार होना, अपने आप में भूमि को डीम्ड फॉरेस्ट के दायरे में नहीं ला सकता, जिससे पहले से स्थापित वैधानिक योजना तंत्र अस्थिर हो जाए।”
2. निर्धारण की प्रासंगिक तिथि
कोर्ट ने नियम प्रतिपादित किया कि जमीन की प्रकृति का आकलन उस तारीख से किया जाना चाहिए जब मास्टर प्लान लागू हुआ था। कोर्ट ने ‘नोएडा पार्क निर्माण (2011)’ मामले का संदर्भ देते हुए कहा कि यह अकल्पनीय है कि हमेशा से कृषि योग्य रही भूमि कुछ ही वर्षों में केवल प्राकृतिक विकास के कारण वन भूमि में बदल जाए।
3. आक्रामक प्रजातियां बनाम वन पारिस्थितिकी तंत्र
फैसले में प्राकृतिक वन और ‘विलायती कीकर’ जैसी प्रजातियों के बीच स्पष्ट अंतर किया गया।
“वनस्पतियों का मात्र प्रसार, विशेष रूप से जहां इसमें ऐतिहासिक मानवीय हस्तक्षेप के माध्यम से लाई गई आक्रामक प्रजातियां शामिल हैं, आवश्यक रूप से एक प्राकृतिक वन पारिस्थितिकी तंत्र की उपस्थिति का संकेत नहीं देता है।”
अंतिम निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने अपील और अवमानना याचिका दोनों को खारिज कर दिया। कोर्ट के मुख्य निष्कर्ष निम्नलिखित हैं:
- मास्टर प्लान के तहत चिन्हित जमीन को बाद में जंगल या ‘डीम्ड फॉरेस्ट’ घोषित नहीं किया जा सकता, यदि योजना लागू होते समय वह वैसी नहीं थी।
- ‘डीम्ड फॉरेस्ट’ की स्थिति तय करने की प्रासंगिक तिथि मास्टर प्लान की अधिसूचना की तिथि होगी।
हालांकि, कोर्ट ने अधिकारियों को निर्देश दिए कि:
- परियोजना क्षेत्र के आसपास मौजूदा स्वदेशी पेड़ों की रक्षा की जाए और अधिकतम वृक्षारोपण सुनिश्चित किया जाए।
- आक्रामक प्रजातियों (जैसे विलायती कीकर) को हटाकर उनके स्थान पर स्थानीय प्रजातियों के पेड़ लगाए जाएं।
- किसी भी निर्माण कार्य से पहले नियमों के अनुसार ‘प्रतिपूरक वनीकरण’ (Compensatory Afforestation) का कार्य कड़ाई से किया जाए।
मामले का विवरण
- केस का नाम: नवीन सोलंकी और अन्य बनाम रेल भूमि विकास प्राधिकरण और अन्य
- केस संख्या: सिविल अपील संख्या 10656/2024
- पीठ: जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह
- दिनांक: 20 मार्च, 2026

