दिल्ली हाईकोर्ट ने अरविंद केजरीवाल और अन्य को दिया समय; ईडी की याचिका पर 2 अप्रैल तक मांगा जवाब

दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार को पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया और 21 अन्य आरोपियों को प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की उस याचिका पर जवाब दाखिल करने के लिए 2 अप्रैल तक का समय दिया है, जिसमें निचली अदालत की ‘अनुचित’ टिप्पणियों को हटाने की मांग की गई है। ईडी का तर्क है कि निचली अदालत ने उन्हें डिस्चार्ज करते समय एजेंसी के खिलाफ जो टिप्पणियां कीं, वे उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर थीं।

जांच एजेंसी ने ट्रायल कोर्ट की इन टिप्पणियों को “अकारण” और “न्यायिक अतिरेक” (judicial overreach) का मामला बताया है। ईडी का कहना है कि अगर इन टिप्पणियों को हटाया नहीं गया, तो इससे धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के तहत चल रही उनकी स्वतंत्र जांच पर “गंभीर और अपूरणीय प्रतिकूल प्रभाव” पड़ सकता है।

सुनवाई के दौरान जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने आरोपियों के वकीलों द्वारा बार-बार समय मांगे जाने पर कड़ी नाराजगी व्यक्त की।

जस्टिस शर्मा ने टिप्पणी करते हुए कहा, “मुझे समझ नहीं आ रहा कि आप जवाब क्यों नहीं दाखिल कर रहे हैं। अगर आपको लगता है कि जवाब देना जरूरी है, तो आपको अब तक जवाब दे देना चाहिए था।” अदालत ने सख्त लहजे में कहा, “2 अप्रैल तक अपना जवाब दाखिल करें। उसके बाद हम अंतिम सुनवाई की तारीख तय करेंगे।”

ईडी की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) एस.वी. राजू ने दलील दी कि आरोपियों को जवाब दाखिल करने की कोई वास्तविक आवश्यकता नहीं है क्योंकि एजेंसी केवल जज की टिप्पणियों को चुनौती दे रही है, न कि डिस्चार्ज के फैसले को। उन्होंने आरोप लगाया कि यह मामला लटकाने की कोशिश है और कोर्ट से आग्रह किया कि यह सुनिश्चित किया जाए कि आरोपी अन्य संबंधित कार्यवाहियों में इन टिप्पणियों का लाभ न उठा सकें।

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वहीं, बचाव पक्ष के वकील ने तर्क दिया कि ट्रायल कोर्ट का डिस्चार्ज ऑर्डर 600 पन्नों का है, इसलिए जवाब तैयार करने के लिए समय चाहिए। हालांकि, जस्टिस शर्मा ने इसे खारिज करते हुए कहा कि ईडी की याचिका का उन सभी 600 पन्नों से कोई लेना-देना नहीं है।

यह पूरा विवाद 27 फरवरी के उस आदेश से शुरू हुआ जिसमें निचली अदालत ने सीबीआई मामले में केजरीवाल, सिसोदिया और अन्य को आरोपमुक्त (डिस्चार्ज) कर दिया था। उस समय ट्रायल जज ने अभियोजन पक्ष के मामले की कड़ी आलोचना की थी और इसे “अटकलों और अनुमानों पर आधारित” बताया था।

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निचली अदालत ने अपने आदेश में पीएमएलए के उपयोग पर कई संवैधानिक सवाल उठाए थे:

  • अदालत ने कहा था कि “अपुष्ट और बिना जांचे गए आरोपों के आधार पर लंबे समय तक या अनिश्चित काल के लिए जेल में रखना” एक “दंडात्मक प्रक्रिया” में बदलने का जोखिम रखता है।
  • कानूनी रूप से स्वीकार्य सामग्री के अभाव में पीएमएलए का उपयोग व्यक्तिगत स्वतंत्रता को खतरे में डालता है।
  • मनी लॉन्ड्रिंग की जांच में एक “परेशान करने वाला विरोधाभास” देखा जा रहा है, जहां आधारभूत अपराध (predicate offence) के बिना ही कार्यवाही चल रही है।
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ईडी की याचिका में तर्क दिया गया है कि ये व्यापक टिप्पणियां सीबीआई मामले की सुनवाई के लिए पूरी तरह से अप्रासंगिक थीं। एजेंसी ने इस बात पर जोर दिया कि वह उस कार्यवाही में पक्षकार नहीं थी और टिप्पणियां दर्ज करने से पहले उसे अपनी बात रखने का अवसर नहीं दिया गया।

हाईकोर्ट ने अब जवाब दाखिल करने के लिए 2 अप्रैल की समय सीमा तय की है, जिसके बाद मामले की अंतिम सुनवाई की जाएगी।

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