दिल्ली हाईकोर्ट ने किरायेदार के बेटे द्वारा दायर एक ‘रेगुलर फर्स्ट अपील’ (RFA) को खारिज कर दिया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई उत्तराधिकारी अपने मृत किरायेदार पिता पर आर्थिक रूप से निर्भर नहीं था, तो उसे ‘दिल्ली किराया नियंत्रण अधिनियम’ (DRC एक्ट) के तहत केवल एक वर्ष की सीमित अवधि के लिए ही सुरक्षा प्राप्त होती है।
एकल न्यायाधीश पीठ जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने 17 मार्च, 2026 को सुनाए गए अपने फैसले में जिला जज द्वारा पारित कब्जे की डिक्री को बरकरार रखा। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि एक वर्ष की वैधानिक अवधि समाप्त होने के बाद अपीलकर्ता का दर्जा एक “अनधिकृत कब्जाधारी” (unauthorized occupant) का हो गया था।
मामले की पृष्ठभूमि
उत्तरदाता/वादी ज्योति सिक्का नई दिल्ली के ग्रीन पार्क (मेन) स्थित संपत्ति की पूर्ण मालिक हैं, जिसे उन्होंने अप्रैल 2007 में पंजीकृत सेल डीड के माध्यम से खरीदा था। दिवंगत गोपी राम गोयल इस संपत्ति की दूसरी मंजिल पर 450 रुपये प्रति माह के किराये पर पुराने किरायेदार थे।
वादी ने मार्च 2009 में कानूनी नोटिस के जरिए किरायेदारी समाप्त कर दी थी। इसके बावजूद, गोपी राम गोयल 26 जनवरी, 2013 को अपनी मृत्यु तक DRC एक्ट के तहत वैधानिक किरायेदार के रूप में बने रहे। उनकी मृत्यु के बाद, उनके बेटे पवन कुमार गोयल (अपीलकर्ता) सहित परिवार के सदस्य वहीं रहने लगे। वादी का तर्क था कि DRC एक्ट की धारा 2(l) के स्पष्टीकरण II के तहत, उत्तराधिकारी केवल एक वर्ष के लिए सुरक्षा के हकदार थे क्योंकि वे मृतक पर आर्थिक रूप से निर्भर नहीं थे।
पक्षों के तर्क
अपीलकर्ता पवन कुमार गोयल ने अपने लिखित बयान में दावा किया कि वह एक “बेरोजगार बेटा” था और पूरी तरह से अपने पिता पर निर्भर था। उसने यह भी तर्क दिया कि यह मुकदमा ‘लिमिटेशन’ (परिसिमा) और ‘रेस-जूडिकाटा’ (res-judicata) के सिद्धांतों से बाधित है, क्योंकि वादी द्वारा पहले दायर की गई बेदखली याचिकाएं खारिज हो चुकी थीं।
इसके विपरीत, वादी ने 13 नवंबर, 2012 के एक ‘पार्टनरशिप डीड’ का हवाला दिया, जिसे खुद दिवंगत गोपी राम गोयल ने पिछली अदालती कार्यवाही में पेश किया था। इस डीड में अपीलकर्ता को एक पार्टनर के रूप में दिखाया गया था। वादी के अनुसार, इससे यह सिद्ध होता है कि अपीलकर्ता के पास आय का स्वतंत्र स्रोत था और वह अपने पिता पर निर्भर नहीं था।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
हाईकोर्ट ने अपने विश्लेषण को दिल्ली किराया नियंत्रण अधिनियम की धारा 2(l) और विशेष रूप से इसके स्पष्टीकरण II पर केंद्रित किया, जिसमें कहा गया है:
“यदि वह व्यक्ति, जो किरायेदारी की समाप्ति के बाद उत्तराधिकार द्वारा कब्जे में रहने का अधिकार प्राप्त करता है, अपनी मृत्यु की तिथि पर मृतक पर आर्थिक रूप से निर्भर नहीं था, तो ऐसा उत्तराधिकारी केवल एक वर्ष की सीमित अवधि के लिए ऐसा अधिकार प्राप्त करेगा; और उस अवधि की समाप्ति पर… किरायेदारी जारी रखने का उसका अधिकार समाप्त हो जाएगा।”
अदालत ने पाया कि अपीलकर्ता ने 2012 की डीड के अनुसार पार्टनरशिप फर्म में पार्टनर होने की बात से इनकार नहीं किया था। जस्टिस कृष्णा ने कहा:
“साझेदारी में भागीदार (Partner) होना स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि उसके पास आय का अपना स्वतंत्र स्रोत था और वह पिता पर निर्भर नहीं था; इसलिए, प्रतिवादी दिल्ली किराया नियंत्रण अधिनियम के तहत सुरक्षा की मांग नहीं कर सकता।”
DRC एक्ट के तहत पिछली याचिकाओं के खारिज होने पर हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि उन कार्यवाहियों का वर्तमान मुकदमे पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। अदालत ने कहा:
“दिल्ली किराया नियंत्रण अधिनियम के तहत याचिकाएं भले ही खारिज हो गई हों, लेकिन यह एक स्वतंत्र अधिकार है जो ‘संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम’ (Transfer of Property Act) के तहत उत्पन्न होता है और पिछली मुकदमेबाजी से प्रभावित नहीं होता है।”
समय-सीमा (limitation) के मुद्दे पर, हाईकोर्ट ने माना कि चूंकि अपीलकर्ता 2014 में वैधानिक अवधि समाप्त होने के बाद भी परिसर में बना रहा, इसलिए यह “निरंतर कार्रवाई का कारण” (continuous cause of action) बनाता है।
अदालत का फैसला
हाईकोर्ट को अपील में कोई दम नजर नहीं आया और उसने 14 जुलाई, 2025 के जिला जज के आदेश को सही ठहराया। जिला जज ने ‘ऑर्डर XII रूल 6 CPC’ के तहत दाखिल आवेदन को स्वीकार करते हुए कब्जे की डिक्री पारित की थी।
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला:
“अपीलकर्ता वैधानिक अवधि की समाप्ति के बाद एक अनधिकृत कब्जाधारी बन गया था, इसलिए 450 रुपये के किराये का जमा होना या उसे स्वीकार किया जाना कोई मायने नहीं रखता, न ही यह वादी के अधिकार को रोकता है।”
इसी के साथ हाईकोर्ट ने अपील और सभी लंबित आवेदनों को खारिज कर दिया।
मामले का विवरण:
- केस टाइटल: पवन कुमार गोयल बनाम ज्योति सिक्का
- केस नंबर: RFA 1161/2025 एवं CM APPL. 80654/2025, 80656/2025
- पीठ: जस्टिस नीना बंसल कृष्णा
- फैसले की तिथि: 17 मार्च, 2026

