एकमात्र विश्वसनीय चश्मदीद की गवाही दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त, भले ही अन्य गवाह मुकर जाएं या जांच में खामियां हों: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने सिर काटकर की गई एक नृशंस हत्या के मामले में 1986 में सुनाई गई उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा है। जस्टिस रजनीश कुमार और जस्टिस जफीर अहमद की खंडपीठ ने जीवित बचे अभियुक्तों की अपील को खारिज करते हुए कहा कि यदि एकमात्र चश्मदीद गवाह पूरी तरह विश्वसनीय है, तो उसकी गवाही के आधार पर सजा सुनाई जा सकती है, भले ही स्वतंत्र गवाहों ने समर्थन न किया हो या हत्या में इस्तेमाल हथियार बरामद न हुआ हो।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला 15 जुलाई 1984 का है, जो उन्नाव जिले के गांव मंजूर में घटित हुआ था। अभियोजन पक्ष के अनुसार, मृतक सूरज दीन अपने बेटे बृज किशोर (PW-1) के साथ खेत में काम कर रहे थे। सुबह करीब 11:30 बजे चार आरोपी—सुरेश, अवधेश, राकेश और संतोष—वहां पहुंचे।

आरोप है कि सुरेश ने सूरज दीन के पैर पकड़े, जबकि राकेश और संतोष ने गड़ासे से उनका सिर धड़ से अलग कर दिया। चौथा आरोपी अवधेश हाथ में देसी तमंचा लेकर वहां खड़ा रहा। हत्या के बाद अवधेश ने कटे हुए सिर को पॉलिथीन में लपेटकर एक बैग में रखा और फरार हो गया। हत्या का कारण 25 साल पुरानी रंजिश बताई गई, जो संतोष के पिता सज्जन तिवारी की हत्या से जुड़ी थी। उस पुरानी हत्या के मामले में सूरज दीन आरोपी थे, लेकिन कोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया था। अपील के लंबित रहने के दौरान आरोपी सुरेश और अवधेश की मृत्यु हो गई, जिसके बाद उनके खिलाफ कार्यवाही समाप्त कर दी गई।

पक्षकारों की दलीलें

अपीलकर्ताओं के वकील ने तर्क दिया कि निचली अदालत ने केवल बृज किशोर (PW-1) के बयान पर भरोसा करके गलती की है, क्योंकि अन्य गवाह (PW-3 और PW-4) या तो मुकर गए या उनकी गवाही विश्वसनीय नहीं पाई गई। उन्होंने बृज किशोर को ‘इच्छुक गवाह’ (interested witness) बताया क्योंकि वह मृतक का बेटा था। साथ ही यह भी कहा गया कि वह कानपुर में नौकरी करता था, इसलिए घटना के समय उसकी मौजूदगी संदिग्ध है। बचाव पक्ष ने गड़ासे की बरामदगी न होने और हत्या के किसी तात्कालिक कारण की कमी पर भी जोर दिया।

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वहीं, राज्य के एजीए और शिकायतकर्ता के वकील ने कहा कि बृज किशोर का बयान स्वाभाविक और भरोसेमंद है। उन्होंने तर्क दिया कि छोटी-मोटी विसंगतियों से आपराधिक मामला खत्म नहीं होता और जब सीधा चश्मदीद मौजूद हो, तो हत्या का मकसद (motive) गौण हो जाता है।

हाईकोर्ट का विश्लेषण

हाईकोर्ट ने साक्ष्य और जांच से जुड़े महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांतों को स्पष्ट किया:

1. एकमात्र गवाह की विश्वसनीयता भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 134 का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि कानून साक्ष्य की गुणवत्ता पर जोर देता है, न कि गवाहों की संख्या पर। अनिल फुकन बनाम असम राज्य (1993) का उल्लेख करते हुए बेंच ने कहा:

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“निश्चित रूप से, दोषसिद्धि केवल एक चश्मदीद गवाह की गवाही पर आधारित हो सकती है और कानून या साक्ष्य का ऐसा कोई नियम नहीं है जो इसके विपरीत कहता हो, बशर्ते वह गवाह विश्वसनीयता की कसौटी पर खरा उतरता हो।”

2. रिश्तेदार बनाम इच्छुक गवाह अदालत ने इस तर्क को खारिज कर दिया कि बृज किशोर की गवाही केवल इसलिए अमान्य है क्योंकि वह मृतक का बेटा है। मोहम्मद रोजाली अली बनाम असम राज्य (2019) का जिक्र करते हुए कोर्ट ने कहा कि एक करीबी रिश्तेदार अक्सर असली अपराधी को बचाने के लिए किसी बेगुनाह को नहीं फंसाएगा। कोर्ट ने टिप्पणी की:

“किसी गवाह के साक्ष्य को केवल इसलिए नजरअंदाज या खारिज नहीं किया जा सकता क्योंकि वह पीड़ित का करीबी रिश्तेदार है।”

3. जांच में खामियां और हथियार की बरामदगी हाईकोर्ट ने माना कि यदि चश्मदीद का बयान विश्वसनीय है, तो हत्या में प्रयुक्त हथियार की बरामदगी न होना मामले के लिए घातक नहीं है। ब्रह्म स्वरूप बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2011) का हवाला देते हुए बेंच ने कहा कि जांच में कमियां दोषमुक्ति का आधार तब तक नहीं बन सकतीं जब तक कि रिकॉर्ड पर मौजूद अन्य साक्ष्य ठोस हों।

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4. सीधे साक्ष्य में मकसद की भूमिका खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि हालांकि परिस्थितिजन्य साक्ष्यों (circumstantial evidence) वाले मामलों में हत्या का मकसद महत्वपूर्ण होता है, लेकिन जहां विश्वसनीय चश्मदीद गवाह मौजूद हों, वहां इसकी अहमियत कम हो जाती है।

निर्णय

बृज किशोर को एक “स्वाभाविक और विश्वसनीय गवाह” मानते हुए हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले में कोई कानूनी खामी नहीं पाई। कोर्ट ने राकेश और संतोष की आईपीसी की धारा 302/34 और 201/34 के तहत दोषसिद्धि की पुष्टि की।

हाईकोर्ट ने जमानत पर बाहर चल रहे अभियुक्तों को 15 दिनों के भीतर सरेंडर करने का आदेश दिया है ताकि वे अपनी सजा पूरी कर सकें।

केस विवरण:

  • केस का नाम: सुरेश एवं 3 अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य
  • केस संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 737 ऑफ 1986
  • पीठ: जस्टिस रजनीश कुमार और जस्टिस जफीर अहमद
  • दिनांक: 18 मार्च, 2026

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