इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मंसूर अंसारी की संपत्ति की कुर्की रद्द की, कहा- अपराध और संपत्ति के बीच संबंध साबित करना जरूरी

उत्तर प्रदेश गिरोहबंद और समाज विरोधी क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम, 1986 (गैंगस्टर एक्ट) के तहत संपत्ति जब्त करने की राज्य सरकार की शक्तियों पर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मंसूर अंसारी की अचल संपत्ति को कुर्क करने के आदेश को रद्द कर दिया है। मंसूर अंसारी, दिवंगत गैंगस्टर-राजनेता मुख्तार अंसारी के चचेरे भाई हैं।

आपराधिक अपील पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति राजबीर सिंह ने कहा कि राज्य केवल “निराधार आरोपों” या पारिवारिक संबंधों के आधार पर संपत्ति जब्त नहीं कर सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब तक संपत्ति और किसी विशेष अपराध के बीच सीधा संबंध (Nexus) स्थापित नहीं होता, तब तक ऐसी कार्रवाई अवैध है। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को गाजीपुर स्थित दुकानों और भवन (जिसकी कीमत लगभग ₹26.18 लाख है) को तत्काल मुक्त करने का निर्देश दिया है।

यह मामला गाजीपुर जिला मजिस्ट्रेट (DM) द्वारा पारित एक कुर्की आदेश से जुड़ा है। पुलिस रिपोर्ट में आरोप लगाया गया था कि मंसूर अंसारी की संपत्तियां वास्तव में मुख्तार अंसारी की ‘बेनामी’ संपत्तियां थीं, जिन्हें अपराध की कमाई से बनाया गया था। गाजीपुर के विशेष न्यायाधीश ने डीएम के इस निर्णय को बरकरार रखा था, जिसके खिलाफ मंसूर अंसारी ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

अपीलकर्ता मंसूर अंसारी की दलील थी कि गैंगस्टर एक्ट के तहत उनका कोई आपराधिक इतिहास नहीं है और यह संपत्ति अवैध साधनों से अर्जित नहीं की गई है। हालांकि 2007 में मुख्तार अंसारी के खिलाफ मामला दर्ज किया गया था, लेकिन मंसूर उस मामले में आरोपी नहीं थे।

READ ALSO  सरकारी वकीलों के ठीक से काम ना करने पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जताई नाराजगी - कहा उचित कार्रवाई के लिए आदेश को यूपी के कानून मंत्री के संज्ञान में लाया जाये

हाईकोर्ट ने गैंगस्टर एक्ट की धारा 14 के तहत जिला मजिस्ट्रेट की शक्तियों के प्रयोग का सूक्ष्म परीक्षण किया। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि संपत्ति कुर्क करने का डीएम का अधिकार पूर्ण (Absolute) नहीं है और यह “वस्तुनिष्ठ निर्धारण” (Objective Determination) पर आधारित होना चाहिए।

अपने 12 मार्च के फैसले में कोर्ट ने कहा, “उसके आपराधिक कृत्य और अर्जित संपत्ति के बीच एक संबंध होना चाहिए। किसी भी अपराध में मात्र संलिप्तता संपत्ति कुर्क करने के लिए पर्याप्त नहीं है, क्योंकि यह पता लगाना आवश्यक है कि क्या संपत्ति का अर्जन गैंगस्टर के रूप में अधिनियम में सूचीबद्ध किसी अपराध के परिणामस्वरूप हुआ था।”

READ ALSO  नवाजुद्दीन सिद्दीकी के भाई मुजफ्फरनगर में धोखाधड़ी के आरोप में गिरफ्तार

न्यायमूर्ति सिंह ने जब्ती के कानूनी मानक को और स्पष्ट करते हुए कहा कि अधिनियम में प्रयुक्त “विश्वास करने का कारण” (Reason to Believe) शब्द का अर्थ मानसिक स्थिति का एक उच्च स्तर है। कोर्ट ने कहा कि इसे केवल संदेह या शंका के बराबर नहीं माना जा सकता, बल्कि इसके लिए “बौद्धिक सावधानी और विचार-विमर्श” की आवश्यकता होती है।

इस मामले में एक महत्वपूर्ण बिंदु अपीलकर्ता का किसी भी गिरोह की गतिविधि से संबंध न होना था। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह साबित करने की प्राथमिक जिम्मेदारी राज्य की है कि कुर्क की जाने वाली संपत्ति किसी अपराध के जरिए हासिल की गई थी।

READ ALSO  वकील की हत्या के आरोपी को बेल देने के ख़िलाफ़ SLP में सुप्रीम कोर्ट ने जारी किया नोटिस- जानिए विस्तार से

अदालत ने इस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया कि किसी ज्ञात अपराधी से पारिवारिक संबंध होना राज्य की कार्रवाई के लिए पर्याप्त आधार है। कोर्ट ने स्पष्ट टिप्पणी की, “केवल इसलिए कि अपीलकर्ता उक्त मुख्तार अंसारी का चचेरा भाई है, यह उसकी संपत्ति को कुर्क करने का आधार नहीं हो सकता।”

कोर्ट ने पाया कि मंसूर अंसारी के किसी गिरोह से जुड़े होने या संपत्ति और अपराध के बीच किसी भी “संबंध” को दिखाने के लिए रिकॉर्ड पर कोई ठोस सामग्री मौजूद नहीं थी। फलस्वरूप, निचली अदालत के आदेश को तथ्यों और कानून के विपरीत पाया गया।

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles