दिल्ली हाईकोर्ट ने निर्णय दिया है कि यदि याचिकाकर्ता किसी वसीयत के अस्तित्व को स्वीकार करता है, भले ही उसकी वैधता विवादित हो, तो निर्वसीयत (intestacy) के आधार पर ‘लेटर्स ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन’ मांगने वाली याचिका पोषणीय (maintainable) नहीं है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी भी वसीयत संबंधी दस्तावेज की प्रामाणिकता और वैधता पर विशेष रूप से केवल उन्हीं कार्यवाहियों में विचार किया जाना चाहिए जहां उस वसीयत को प्रस्तुत किया गया हो।
मामले की पृष्ठभूमि
यह कानूनी विवाद दिवंगत अरविंद सिंह मेवाड़ की संपत्ति से जुड़ा है, जिनका 16 मार्च, 2025 को उदयपुर में निधन हो गया था। उनके चार श्रेणी-I (Class-I) कानूनी उत्तराधिकारी हैं: उनकी पत्नी विजयराज कुमारी मेवाड़; उनके पुत्र लक्ष्यराज सिंह मेवाड़; और दो बेटियां, भार्गवी कुमारी मेवाड़ और पद्मजा कुमारी परमार।
पद्मजा कुमारी परमार ने शुरुआत में बॉम्बे हाईकोर्ट में एक याचिका दायर कर यह दावा करते हुए ‘लेटर्स ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन’ की मांग की कि उनके पिता की मृत्यु बिना किसी वसीयत के (intestate) हुई है। हालांकि, उन्होंने 7 फरवरी, 2025 की एक कथित वसीयत के अस्तित्व को स्वीकार किया, लेकिन आरोप लगाया कि यह अनुचित प्रभाव (undue influence) डालकर बनवाई गई थी, क्योंकि उस समय उनके पिता मानसिक रूप से अस्वस्थ (non compos mentis), दृष्टिहीन और गंभीर शारीरिक व मानसिक बीमारियों से पीड़ित थे।
इसके विपरीत, उनके भाई लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ ने जोधपुर स्थित राजस्थान हाईकोर्ट में भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 की धारा 276 के तहत वसीयत संलग्न करते हुए ‘लेटर्स ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन’ के लिए याचिका दायर की। उन्होंने पंजीकृत वसीयत के तहत खुद को एकमात्र वसीयतदार (universal legatee) होने का दावा किया और कहा कि वसीयतकर्ता की मानसिक स्थिति ठीक थी और उन्होंने पहले ही उनके पक्ष में एक ‘जनरल पावर ऑफ अटॉर्नी’ निष्पादित की थी।
सुप्रीम कोर्ट ने मुकदमों की बहुलता और परस्पर विरोधी निष्कर्षों से बचने के लिए दोनों याचिकाओं को एक साथ सुनने के लिए दिल्ली हाईकोर्ट स्थानांतरित कर दिया।
पक्षों की दलीलें
पद्मजा कुमारी परमार की ओर से पेश वरिष्ठ वकील ने तर्क दिया कि धारा 278 के तहत निर्वसीयतता पर आधारित याचिका पोषणीय है क्योंकि कथित वसीयत कानूनी रूप से अमान्य है और प्रभावी नहीं हो सकती। हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 3(g) पर भरोसा करते हुए यह तर्क दिया गया कि वसीयतकर्ता को निर्वसीयत (intestate) मरा हुआ माना जाना चाहिए। याचिकाकर्ता ने आगे कहा कि उन्हें वसीयत को अमान्य घोषित करने के लिए किसी विशिष्ट दीवानी मुकदमे की आवश्यकता नहीं है और वसीयत को साबित करने का पूरा भार उसे प्रस्तुत करने वाले (propounder) पर है। इसके समर्थन में ललितकुमार बनाम सुनीता, संभाजी विष्णु खरात बनाम सर्जेराव खरात, और वेनिगल्ला कोटेश्वरम्मा बनाम मलम पाटी सूर्याम्बा के पूर्व निर्णयों का हवाला दिया गया।
दूसरी ओर, लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ के वरिष्ठ वकील ने निर्वसीयत याचिका की पोषणीयता पर प्रारंभिक आपत्ति जताई। यह तर्क दिया गया कि भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम (धारा 218, 232, 276, और 278) की योजना के तहत, एक बार जब कोई वसीयत सामने आ जाती है, तो संपत्ति को निर्वसीयत नहीं माना जा सकता। प्रतिवादी ने तर्क दिया कि निर्वसीयतता के आधार पर दिया गया कोई भी ‘लेटर्स ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन’ अधिनियम की धारा 263 के तहत रद्द होने योग्य होगा, और इसलिए, वसीयत की वैधता से संबंधित प्रश्नों की जांच विशेष रूप से उसी वसीयती अदालत द्वारा की जानी चाहिए जहां वसीयत प्रस्तुत की गई है।
कोर्ट का विश्लेषण
जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद ने भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम के वैधानिक ढांचे का मूल्यांकन किया और निर्वसीयत उत्तराधिकार (धारा 278) तथा वसीयती उत्तराधिकार (धारा 276) के बीच अंतर स्पष्ट किया।
हाईकोर्ट ने कहा कि यद्यपि प्रोबेट या ‘लेटर्स ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन’ देने की कार्यवाही इन रेम (in rem) होती है, लेकिन निर्वसीयतता पर आधारित समानांतर कार्यवाहियों में किसी वसीयत को साबित या खारिज नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा:
“केवल यह दावा कि वसीयती दस्तावेज अमान्य है, संपत्ति को निर्वसीयत नहीं बनाता, क्योंकि निर्वसीयतता तभी उत्पन्न होती है जब एक वैध वसीयती व्यवस्था स्थापित करने में विफलता हो।”
“एक बार जब वसीयत संलग्न करते हुए लेटर्स ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन की मांग करने वाली याचिका दायर कर दी गई है, तो वसीयत के उचित निष्पादन, प्रामाणिकता और वैधता के प्रश्न पर उन्हीं कार्यवाहियों के भीतर विचार किया जाना चाहिए, जिनमें वसीयती दस्तावेज प्रस्तुत किया गया है।”
याचिकाकर्ता के इस तर्क पर कि वसीयत शून्य है और संदिग्ध परिस्थितियों से दूषित है, कोर्ट ने अधिकार क्षेत्र की सीमाएं स्पष्ट करते हुए कहा:
“वसीयत को अमान्य, शून्य या संदिग्ध परिस्थितियों से दूषित घोषित करने वाला डिक्री (decree) केवल सक्षम दीवानी अदालत द्वारा उस उद्देश्य के लिए स्थापित उचित कार्यवाहियों में ही प्रदान किया जा सकता है।”
हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता द्वारा उद्धृत मामलों को यह कहते हुए अलग रखा कि वे भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम के तहत वसीयती कार्यवाहियों के बजाय दीवानी विभाजन मुकदमों के संदर्भ में थे। इसके बजाय, कोर्ट ने चिरंजीलाल श्रीलाल गोयनका बनाम जसजीत सिंह, प्रशासक जनरल बनाम राज्य, बिंदिया कृपलानी बनाम नरेश नत्थूलाल पाल, पीटर जॉन डिसूजा बनाम आर्मस्ट्रांग जोसेफ डिसूजा, और एम.ए.आई. कोवूर बनाम थॉमस आईपीई कोवूर (जूनियर) जैसे स्थापित पूर्व निर्णयों पर भरोसा किया। कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि जब वसीयत की वैधता पहले से ही समकालीन वसीयती कार्यवाही का विषय है, तो निर्वसीयत याचिका को समानांतर रूप से जारी रखना कानूनी रूप से अस्थिर है। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि धारा 295 के तहत, एक बार विवादित होने पर वसीयत प्रस्तुत करने की कार्यवाही एक नियमित दीवानी मुकदमे का रूप ले लेती है।
फैसला
हाईकोर्ट ने पद्मजा कुमारी परमार द्वारा दायर याचिका (TEST.CAS. 2/2026) को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि वसीयत संलग्न करते हुए ‘लेटर्स ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन’ (TEST.CAS. 4/2026) की याचिका दायर होने के बाद निर्वसीयत याचिका में कार्रवाई का कोई आधार नहीं बचता है।
कोर्ट ने पद्मजा कुमारी परमार को TEST.CAS. 4/2026 में एक उचित जवाब (Reply) दाखिल करके वसीयत से जुड़ी संदिग्ध परिस्थितियों के संबंध में अपने सभी आधार और तर्क उठाने की छूट प्रदान की, जहां कथित वसीयत की वैधता और साक्ष्य पर निर्णय लिया जाना है।
केस का विवरण:
- केस का नाम: पद्मजा कुमारी परमार बनाम लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ और अन्य तथा लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ बनाम राजस्थान राज्य और अन्य
- केस नंबर: TEST.CAS. 2/2026 एवं TEST.CAS. 4/2026
- बेंच: जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद
- निर्णय की तिथि: 17 मार्च, 2026

