दिल्ली हाईकोर्ट ने पिछले सप्ताह कुछ कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिए जाने के मामले में दिल्ली पुलिस से विस्तृत जवाब मांगा है। अदालत ने पुलिस को एक सप्ताह के भीतर हलफनामा दाखिल कर यह स्पष्ट करने को कहा कि किन परिस्थितियों में और किस कानूनी अधिकार के तहत इन लोगों को हिरासत में लिया गया था।
रविवार को हुई विशेष सुनवाई में न्यायमूर्ति नवीन चावला और न्यायमूर्ति रविंदर दूडे़जा की खंडपीठ ने यह निर्देश दिया। अदालत के समक्ष दायर हैबियस कॉर्पस याचिकाओं में आरोप लगाया गया था कि कुछ छात्र और सामाजिक कार्यकर्ताओं को अवैध तरीके से उठा लिया गया था।
सुनवाई के दौरान दिल्ली पुलिस की ओर से पेश वकील ने अदालत को बताया कि जिन लोगों को हिरासत में लिया गया था, उन्हें अब रिहा कर दिया गया है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि मामला “इतना सरल नहीं है” और संबंधित एफआईआर गोपनीय प्रकृति की है।
अदालत ने कहा कि पुलिस को यह स्पष्ट करना होगा कि लोगों को किस कानूनी प्रावधान के तहत और किन परिस्थितियों में हिरासत में लिया गया था।
पीठ ने यह भी निर्देश दिया कि उन स्थानों के सीसीटीवी फुटेज सुरक्षित रखे जाएं जहां से कार्यकर्ताओं को पुलिस द्वारा ले जाया गया था। हालांकि स्पेशल सेल कार्यालय के सीसीटीवी फुटेज सुरक्षित रखने के मुद्दे पर अदालत ने फिलहाल निर्णय टालते हुए कहा कि इस पर बाद में विचार किया जाएगा। मामले की अगली सुनवाई 27 मार्च को तय की गई है।
इसी दौरान अदालत ने एक अन्य याचिका पर सोमवार को सुनवाई तय की, जिसमें एक कार्यकर्ता के वकील ने दावा किया कि उसे अभी तक रिहा नहीं किया गया है। इस पर अदालत ने पुलिस से कहा, “आपको उसे तलाशना होगा,” जबकि पुलिस का कहना था कि सभी व्यक्तियों को छोड़ दिया गया है।
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकीलों ने अदालत में आरोप लगाया कि कार्यकर्ताओं को कानून की प्रक्रिया का पालन किए बिना हिरासत में लिया गया, उन्हें मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश नहीं किया गया और उनके साथ दुर्व्यवहार तथा यातना की गई।
वकीलों के अनुसार करीब दस कार्यकर्ताओं और छात्रों को दयाल सिंह कॉलेज के बाहर और विजय नगर इलाके से हिरासत में लिया गया था।
अधिवक्ता शाहरुख आलम ने अदालत को बताया कि याचिकाकर्ता सागरिका राजोरा की बहन लक्षिता राजोरा को पुलिसकर्मियों ने सादे कपड़ों में उठाया था।
वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंसाल्वेस, जो याचिकाकर्ता एहसानुल हक की ओर से पेश हुए, ने स्थिति को “चिंताजनक” बताते हुए अदालत से पुलिस को एफआईआर की प्रति उपलब्ध कराने का निर्देश देने की मांग की। इस पर पुलिस ने कहा कि एफआईआर गोपनीय है।
याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने यह भी आरोप लगाया कि कार्यकर्ताओं को तभी रिहा किया गया जब यह खबर सामने आई कि हाईकोर्ट ने इस मामले में हैबियस कॉर्पस याचिकाओं की सुनवाई के लिए विशेष पीठ गठित की है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि फिलहाल याचिका बंद नहीं की जा रही है। पीठ ने कहा कि वह यह जानना चाहती है कि वास्तव में क्या हुआ।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से कार्यकर्ताओं और छात्रों को सुरक्षा प्रदान करने का अनुरोध भी किया गया। इस पर अदालत ने कहा कि इस समय वह ऐसा कोई निर्देश नहीं दे सकती क्योंकि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि पुलिस को उनसे किस कारण से पूछताछ करनी है।
सागरिका राजोरा ने अपनी याचिका में अपनी 22 वर्षीय बहन लक्षिता राजोरा को अदालत के समक्ष पेश करने की मांग की है। याचिका में कहा गया है कि लक्षिता 13 मार्च की शाम से लापता हैं और उन्हें अवैध रूप से हिरासत में रखा गया है।
याचिका के अनुसार लक्षिता राजोरा को आखिरी बार दिल्ली विश्वविद्यालय के नॉर्थ कैंपस के पास विजय नगर स्थित छात्र संगठन ‘भगत सिंह छात्र एकता मंच (BSCEM)’ के कार्यालय में देखा गया था।
याचिका में यह भी दावा किया गया है कि लगभग आठ महीने पहले भी लक्षिता और उनके साथियों को दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल के अधिकारियों ने बिना किसी आधिकारिक रिकॉर्ड के हिरासत में रखा था और एक सप्ताह से अधिक समय तक गंभीर यातना दी गई थी।

