बैंक-बिल्डर ‘गठजोड़’ मामले में CBI पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, कहा—जांच में देरी से फ्लैट खरीदारों की पीड़ा बढ़ेगी

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को दिल्ली-एनसीआर और देश के अन्य हिस्सों में सबवेंशन स्कीम के जरिए फ्लैट खरीदारों को ठगने के कथित बैंक-बिल्डर गठजोड़ की जांच को लेकर केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) की कार्यप्रणाली पर कड़ी नाराजगी जताई। अदालत ने कहा कि जांच को लंबा खींचने से पहले से परेशान घर खरीदारों की मुश्किलें और बढ़ेंगी।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने CBI के उस सुझाव को स्वीकार करने से इनकार कर दिया जिसमें कुछ मामलों को राज्य एजेंसियों को सौंपने की बात कही गई थी। अदालत ने निर्देश दिया कि CBI सभी मामलों की जांच स्वयं करे और प्रारंभिक जांच (Preliminary Enquiry) को नियमित आपराधिक मामलों में बदले।

पीठ ने कहा कि अदालत अनिश्चितकाल तक जांच के पूरा होने का इंतजार नहीं कर सकती। अदालत के अनुसार, जांच में देरी से उन घर खरीदारों की पीड़ा और बढ़ेगी जिन्हें पहले ही बिल्डरों और डेवलपर्स द्वारा, कथित तौर पर वित्तीय संस्थानों और बैंकों की मिलीभगत से, परेशान किया गया है।

1,200 से अधिक फ्लैट खरीदारों की याचिकाओं पर सुनवाई

यह मामला 1,200 से अधिक घर खरीदारों की याचिकाओं से जुड़ा है। प्रमुख याचिका हिमांशु सिंह ने अधिवक्ता अक्षय श्रीवास्तव के माध्यम से दायर की थी।

इन याचिकाकर्ताओं ने नोएडा, ग्रेटर नोएडा और गुरुग्राम समेत एनसीआर के विभिन्न प्रोजेक्ट्स में सबवेंशन स्कीम के तहत फ्लैट बुक किए थे। उनका आरोप है कि फ्लैट का कब्जा न मिलने के बावजूद बैंक उनसे ऋण की किश्तें वसूल रहे हैं।

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सबवेंशन स्कीम के तहत बैंक स्वीकृत ऋण राशि सीधे बिल्डरों को जारी करते हैं। समझौते के अनुसार, जब तक फ्लैट का कब्जा खरीदार को नहीं मिलता, तब तक ऋण की ईएमआई बिल्डर को चुकानी होती है। लेकिन जब बिल्डरों ने भुगतान करना बंद किया तो बैंकों ने त्रिपक्षीय समझौते के आधार पर ईएमआई का भुगतान घर खरीदारों से मांगना शुरू कर दिया।

जांच की रफ्तार पर अदालत की चिंता

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने CBI की जांच की गति पर असंतोष व्यक्त किया और कहा कि यदि एजेंसी इसी तरह आगे बढ़ती रही तो अदालत जांच की निगरानी के लिए एक समिति गठित करने पर विचार कर सकती है

अदालत ने CBI को निर्देश दिया कि वह अगली सुनवाई से पहले एक जिम्मेदार अधिकारी के माध्यम से हलफनामा दाखिल कर सभी मामलों में जांच की प्रगति की जानकारी दे। साथ ही एजेंसी से कहा गया कि वह अमाइकस क्यूरी राजीव जैन द्वारा 29 अप्रैल को दाखिल रिपोर्ट का भी अध्ययन करे और जांच पूरी करने की संभावित समयसीमा बताए।

पीठ ने यह भी कहा कि यदि CBI को कर्मचारियों की कमी का सामना करना पड़ रहा है तो वह राज्यों के पुलिस महानिदेशकों (DGP) से संपर्क कर उनके इकोनॉमिक ऑफेंस विंग की सहायता ले सकती है।

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बैंक अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल

अदालत ने इस बात पर भी नाराजगी जताई कि कथित रूप से शामिल बैंक अधिकारियों की भूमिका की पर्याप्त जांच नहीं की जा रही है

एक अन्य याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता प्रणव सचदेवा ने दलील दी कि चूंकि यह जांच अदालत की निगरानी में हो रही है, इसलिए सार्वजनिक सेवकों के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत अभियोजन की पूर्व अनुमति की शर्त को हटाया जाना चाहिए।

CBI की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने अदालत को भरोसा दिलाया कि एजेंसी ऐसे किसी भी कानूनी अवरोध का समाधान करेगी।

दावों और सुझावों के लिए प्रक्रिया तय

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस मामले से जुड़े घर खरीदार, बैंक और बिल्डर अपने दावे, सुझाव और सिफारिशें सीधे अदालत में दाखिल नहीं करेंगे। सभी पक्ष अपनी सामग्री पहले अमाइकस क्यूरी राजीव जैन को देंगे, जो उसे जांचकर अदालत के समक्ष प्रस्तुत करेंगे।

पहले भी दिए गए हैं कई महत्वपूर्ण निर्देश

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट पहले भी कई अहम आदेश दे चुका है।

  • 20 जनवरी को अदालत ने दिल्ली की एक विशेष CBI अदालत को निर्देश दिया था कि वह बैंक-बिल्डर गठजोड़ से जुड़े मामलों में दाखिल तीन आरोपपत्रों पर दो सप्ताह के भीतर संज्ञान ले।
  • 23 सितंबर पिछले वर्ष अदालत ने CBI को मुंबई, बेंगलुरु, कोलकाता, मोहाली और प्रयागराज से जुड़े मामलों में छह और नियमित केस दर्ज करने की अनुमति दी थी।
  • इससे दो महीने पहले अदालत ने एनसीआर में सबवेंशन स्कीम से जुड़े 22 मामलों में केस दर्ज करने की मंजूरी दी थी।
  • 29 अप्रैल 2025 को अदालत ने NCR में सुपरटेक लिमिटेड सहित कई बिल्डरों के खिलाफ सात प्रारंभिक जांच दर्ज करने का आदेश दिया था।
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अमाइकस रिपोर्ट में सामने आए बड़े खुलासे

अमाइकस क्यूरी राजीव जैन की रिपोर्ट में सुपरटेक लिमिटेड को घर खरीदारों को ठगने का मुख्य जिम्मेदार बताया गया है।

रिपोर्ट के अनुसार, कॉरपोरेशन बैंक ने सबवेंशन स्कीम के जरिए बिल्डरों को 2,700 करोड़ रुपये से अधिक का ऋण दिया, जबकि सुपरटेक को 1998 से अब तक कुल 5,157.86 करोड़ रुपये का कर्ज मिला

सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी कहा था कि प्रारंभिक तौर पर नोएडा, गुरुग्राम, यमुना एक्सप्रेसवे, ग्रेटर नोएडा, मोहाली, मुंबई, कोलकाता और इलाहाबाद सहित कई शहरों में बैंकों, बिल्डरों और विकास प्राधिकरणों के कुछ अधिकारियों के बीच मिलीभगत के संकेत मिले हैं, जिसके कारण बड़ी संख्या में घर खरीदारों को गंभीर आर्थिक और मानसिक परेशानी झेलनी पड़ी।

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