लंबे समय से चल रहे रिश्तों के टूटने को ‘बलात्कार’ नहीं कहा जा सकता: दिल्ली हाईकोर्ट ने शादी के झूठे वादे के मामले में अग्रिम जमानत दी

दिल्ली हाईकोर्ट ने शादी के झूठे वादे के बहाने बलात्कार के आरोपी एक व्यक्ति को अग्रिम जमानत देते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि लंबे समय तक चले आपसी सहमति के रिश्ते के दौरान बनी शारीरिक अंतरंगता को केवल इसलिए ‘बलात्कार’ की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता क्योंकि वह रिश्ता शादी तक नहीं पहुंच पाया। न्यायमूर्ति प्रतीक जालान ने आवेदन पर सुनवाई करते हुए इस बात पर गौर किया कि पीड़िता ने पहले पुलिस को दी गई शिकायत में केवल शादी से इनकार और दहेज की मांग का जिक्र किया था, जबकि यौन शोषण का कोई आरोप नहीं लगाया था।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता, विनीत सोरोत ने खजूरी खास थाने में दर्ज FIR संख्या 401/2025 के संबंध में अग्रिम जमानत की मांग की थी। यह FIR भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376(2)(n) (बलात्कार) और 506 (आपराधिक धमकी) के तहत दर्ज की गई थी।

अभियोजन पक्ष के अनुसार, याचिकाकर्ता और पीड़िता की मुलाकात 2021 में इंस्टाग्राम के जरिए हुई थी। पीड़िता का आरोप था कि जून 2021 में याचिकाकर्ता ने उसके परिवार से मिलकर शादी की इच्छा जताई। उसने दावा किया कि 21 मई, 2023 को याचिकाकर्ता ने शादी का झांसा देकर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए। आरोपों में यह भी कहा गया कि याचिकाकर्ता उसे होटलों में ले जाता था और उसकी जानकारी के बिना आपत्तिजनक वीडियो बनाता था।

दोनों के बीच 1 मई, 2024 को सगाई (रोका) की रस्म भी हुई थी और शादी 18 नवंबर, 2025 के लिए तय की गई थी। हालांकि, पीड़िता ने आरोप लगाया कि मार्च 2025 के बाद याचिकाकर्ता ने बात करना बंद कर दिया, 10 लाख रुपये दहेज की मांग की और दूसरी जगह सगाई कर ली। पीड़िता ने यह भी आरोप लगाया कि विरोध करने पर याचिकाकर्ता ने उसके वीडियो वायरल करने की धमकी दी।

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता के वकील श्री अभय कुमार ने दलील दी कि दोनों पक्ष पांच साल से सहमतिपूर्ण रिश्ते में थे। उन्होंने जोर देकर कहा कि सगाई की रस्म का होना इस बात का सबूत है कि शुरुआत में शादी का कोई ‘झूठा वादा’ नहीं किया गया था। उन्होंने विशेष रूप से 22 जुलाई, 2025 को पीड़िता द्वारा SHO को लिखे गए पत्र का हवाला दिया, जिसमें उसने केवल दहेज की मांग और शादी से इनकार की शिकायत की थी, लेकिन बलात्कार का कोई जिक्र नहीं था।

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दूसरी ओर, अभियोजन पक्ष और पीड़िता के वकील ने तर्क दिया कि शारीरिक संबंध केवल शादी के वादे के आधार पर बनाए गए थे। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता ने होटलों में फर्जी पहचान पत्रों का इस्तेमाल किया और BNSS की धारा 183 (पूर्व में 164 CrPC) के तहत दर्ज पीड़िता का बयान बलात्कार के आरोपों की पुष्टि करता है।

कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

कोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के ‘समाधान बनाम महाराष्ट्र राज्य (2025)’ और ‘महेश दामू खरे बनाम महाराष्ट्र राज्य (2024)’ के फैसलों का हवाला दिया।

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समाधान मामले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी को उद्धृत करते हुए न्यायमूर्ति जालान ने कहा:

“ऐसे मामलों में, एक सक्रिय रिश्ते के दौरान होने वाली शारीरिक अंतरंगता को केवल इसलिए पूर्वव्यापी रूप से बलात्कार का अपराध नहीं माना जा सकता क्योंकि रिश्ता शादी में तब्दील होने में विफल रहा।”

कोर्ट ने कहा कि बलात्कार का अपराध केवल उन मामलों में लागू होना चाहिए जहां वास्तविक यौन हिंसा, जबरदस्ती या स्वतंत्र सहमति का अभाव हो। कोर्ट ने असफल रिश्तों को आपराधिक रंग देने की बढ़ती प्रवृत्ति के प्रति सचेत करते हुए कहा कि ऐसा करना इस गंभीर अपराध की गरिमा को कम करता है।

अदालत ने 22 जुलाई, 2025 के पीड़िता के पत्र पर ध्यान दिया, जिसमें लिखा था:

“मैं विनीत से प्यार करती हूँ… मेरा रिश्ता उसके साथ तय हो गया है। मैं उसे 6 साल से जानती हूँ, लेकिन अब वह मुझसे शादी करने से मना कर रहा है और अब वह मुझसे दहेज की मांग कर रहा है।”

कोर्ट ने पाया कि यह पत्र मार्च 2025 की अंतिम कथित घटना के बाद लिखा गया था, फिर भी इसमें बलात्कार का कोई आरोप नहीं था। इसके बाद 6 सितंबर, 2025 को दर्ज NCR में भी मारपीट का उल्लेख था लेकिन यौन हमले का नहीं। बलात्कार का आरोप पहली बार 15 सितंबर, 2025 की शिकायत में लगाया गया।

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न्यायमूर्ति जालान ने टिप्पणी की:

“22.07.2025 के पत्र का पहला बयान ही यह है कि पीड़िता याचिकाकर्ता से प्यार करती थी। यह इस संभावना की ओर इशारा करता है कि शारीरिक संबंध बिना किसी शादी के वादे के भी हो सकते हैं… लगभग पांच साल के लंबे रिश्ते के दौरान सगाई जैसी रस्मों का होना याचिकाकर्ता के पक्ष को प्रथम दृष्टया विश्वसनीय बनाता है।”

अदालत का फैसला

कोर्ट ने अग्रिम जमानत आवेदन स्वीकार कर लिया और निर्देश दिया कि गिरफ्तारी की स्थिति में याचिकाकर्ता को 20,000 रुपये के निजी मुचलके और इतनी ही राशि की जमानत पर रिहा किया जाए। जमानत की शर्तों के अनुसार याचिकाकर्ता को जांच में सहयोग करना होगा, अपना मोबाइल नंबर और पता जांच अधिकारी को देना होगा और गवाहों या सबूतों के साथ छेड़छाड़ नहीं करनी होगी।

केस विवरण:

  • केस का शीर्षक: विनीत सोरोत बनाम राज्य (NCT दिल्ली)
  • केस संख्या: बेल आवेदन 4593/2025
  • पीठ: न्यायमूर्ति प्रतीक जालान
  • दिनांक: 03 मार्च, 2026

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