पुजारी अधिकारों पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: 100 साल पुराने डिक्री पर भारी पड़ा कब्जा और राजस्व रिकॉर्ड; ‘कंडक्ट’ के आधार पर अपील खारिज

सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक के अमोगासिद्ध मंदिर में वंशानुगत पुजारी (पुजारीकी) अधिकारों से जुड़े एक सदी पुराने विवाद का निपटारा कर दिया है। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने स्पष्ट किया कि लंबे समय तक का कब्जा और निरंतर राजस्व रिकॉर्ड (RTC) के सामने 100 साल पुरानी पुरानी डिक्री का कोई महत्व नहीं रह जाता, खासकर तब जब संबंधित पक्ष का आचरण उसके दावों के विपरीत हो।

सिविल अपील संख्या 7181-7182/2016 (ओगेप्पा बनाम साहेबगौड़ा) में मुख्य विवाद कर्नाटक के मामत्ती गुड्डा स्थित मंदिर में ‘वंशानुगत वहिवतदार पुजारी’ के अधिकारों को लेकर था। इसमें पूजा करने, चढ़ावा प्राप्त करने और वार्षिक जात्रा आयोजित करने के अधिकार शामिल हैं। कोर्ट ने निचली अदालतों के उस फैसले पर मुहर लगाई जिसमें प्रतिवादियों (Respondents) को वास्तविक वंशानुगत पुजारी माना गया था।

विवाद की पृष्ठभूमि

इस कानूनी लड़ाई की जड़ें 1944 में हैं, जब अपीलकर्ताओं (Appellants) के पूर्वजों ने कब्जे के लिए मुकदमा (O.S. 88/1944) दायर किया था, जो 1945 में खारिज हो गया। इसके बाद अपील के दौरान उन्होंने 1946 में मुकदमा वापस लेते हुए नया केस दायर करने की अनुमति मांगी, लेकिन अगले 36 वर्षों तक कोई केस नहीं किया।

1982 में, प्रतिवादियों ने पुजारी अधिकारों की घोषणा के लिए नया मुकदमा (O.S. 56/1982) दायर किया। ट्रायल कोर्ट ने अधिकारों को दोनों पक्षों में बांट दिया था, लेकिन फर्स्ट अपीलेट कोर्ट ने इसे पूरी तरह प्रतिवादियों के पक्ष में कर दिया। लंबे समय तक चली अपीलों और 2003 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा रिमांड किए जाने के बाद, अंततः 2012 में हाईकोर्ट ने भी प्रतिवादियों के पक्ष में फैसला सुनाया।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ताओं ने मुख्य रूप से 1901 की एक डिक्री (O.S. 287/1901) का हवाला दिया, जिसके अनुसार उनके पूर्वजों को पुजारी अधिकार मिले थे। उन्होंने तर्क दिया कि केवल राजस्व रिकॉर्ड के आधार पर प्रतिवादियों का दावा सही नहीं माना जा सकता।

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वहीं, प्रतिवादियों ने तर्क दिया कि वे पीढ़ियों से मंदिर में पूजा कर रहे हैं और उनके पास राजस्व रिकॉर्ड (RTC) हैं जो दर्शाते हैं कि ब्रिटिश सरकार ने मंदिर सेवा के बदले उनके पूर्वजों को भूमि प्रदान की थी।

सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण

जस्टिस मिश्रा ने अपने फैसले में अनुच्छेद 136 के तहत हस्तक्षेप की सीमाओं को रेखांकित किया। कोर्ट ने पाया कि अपीलकर्ताओं का 1901 की डिक्री पर भरोसा करना उनके स्वयं के आचरण के कारण व्यर्थ हो गया है। कोर्ट ने कहा:

“एक पक्ष जो पहले से कब्जे में है, वह कब्जे के लिए मुकदमा दायर नहीं करता। 1944 में [अपीलकर्ताओं के पूर्वजों द्वारा] कब्जे का मुकदमा दायर करना ही इस बात का प्रमाण है कि उस समय मंदिर का कब्जा उनके पास नहीं था।”

पीठ ने आगे कहा कि जब एक पक्ष नया मुकदमा दायर करने की छूट लेता है और 36 साल तक चुप रहता है, तो इसका स्पष्ट अर्थ है कि उसने जमीनी हकीकत को स्वीकार कर लिया है। कोर्ट ने अपीलकर्ताओं के पक्ष में निम्नलिखित कमियां पाईं:

  1. राजस्व रिकॉर्ड: रिकॉर्ड ऑफ राइट्स (RTC) में प्रतिवादियों के पूर्वजों का नाम दर्ज है। अपीलकर्ताओं के गवाह (D.W.1) ने भी स्वीकार किया कि उक्त भूमि पर प्रतिवादी ही खेती कर रहे थे।
  2. पीडिंग्स (Pleadings) की कमी: कोर्ट ने कहा कि अपीलकर्ताओं का ‘रिटन स्टेटमेंट’ इस बारे में मौन था कि उन्होंने कब कब्जा खोया या पाया।
  3. मौखिक साक्ष्य: कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि: “मौखिक साक्ष्य प्लीडिंग्स का विकल्प नहीं हो सकते, और जो मामला लिखित दलीलों (Pleadings) में नहीं बनाया गया, उसे केवल साक्ष्यों के आधार पर खड़ा नहीं किया जा सकता।”

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि प्रतिवादियों ने लगातार दस्तावेजी साक्ष्यों, राजस्व रिकॉर्ड और स्वतंत्र गवाहों के माध्यम से अपना दावा साबित किया है।

पीठ ने कहा, “फर्स्ट अपीलेट कोर्ट और हाईकोर्ट के समवर्ती निष्कर्षों में कोई विकृति नहीं है।” इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने सिविल अपीलों को बिना किसी लागत (Cost) के खारिज कर दिया।

  • केस का नाम: ओगेप्पा (मृतक) कानूनी प्रतिनिधियों के माध्यम से और अन्य बनाम साहेबगौड़ा (मृतक) कानूनी प्रतिनिधियों के माध्यम से और अन्य
  • सिविल अपील संख्या: 7181-7182/2016

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