रिमांड के लिए ठोस कारण होने पर अपीलीय अदालत को मेरिट पर फैसला देना जरूरी नहीं: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने प्रथम अपीलीय अदालत द्वारा एक दीवानी मुकदमे को वापस निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) भेजने (रिमांड) के फैसले को बरकरार रखा है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि अपीलीय अदालत ‘आवश्यक पक्षकारों को न जोड़ने’ जैसे ठोस कारणों के आधार पर रिमांड का मन बनाती है, तो उसे विवाद के गुणों (मेरिट) पर फैसला सुनाने की आवश्यकता नहीं होती है।

न्यायमूर्ति बिभु दत्त गुरु की एकल पीठ ने वादियों की अपील को खारिज करते हुए जिला न्यायाधीश, पाटन के फैसले की पुष्टि की। हाईकोर्ट ने रेखांकित किया कि सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) की धारा 99 का परंतुक (Proviso) स्पष्ट रूप से ‘आवश्यक पक्षकार को न जोड़ने’ (Non-joinder of a necessary party) के मामले को उन नियमों से अलग रखता है जो प्रक्रियात्मक अनियमितताओं के आधार पर डिक्री को पलटने से रोकते हैं।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद ग्राम बोहरडीह में स्थित पैतृक कृषि भूमि के स्वामित्व और बंटवारे से संबंधित है। स्वर्गीय भोलाराम साहू के उत्तराधिकारियों (हेमंत कुमार साहू व अन्य) ने अश्वनी कुमार साहू और अन्य के खिलाफ घोषणा, स्थायी निषेधाज्ञा और बंटवारे के लिए सिविल सूट (08A/2021) दायर किया था।

वादियों का तर्क था कि भोलाराम और अश्वनी कुमार सगे भाई थे और कुल 14.24 हेक्टेयर भूमि संयुक्त परिवार की संपत्ति है। उन्होंने संपत्ति में अपने $1/2$ हिस्से का दावा किया और आरोप लगाया कि प्रतिवादी अश्वनी कुमार ने बिना बंटवारे के कुछ खसरा नंबर तीसरे पक्ष को बेच दिए हैं। ट्रायल कोर्ट ने 14 अगस्त, 2023 को वादियों के पक्ष में फैसला सुनाया था।

प्रथम अपीलीय अदालत का निर्णय

प्रतिवादियों ने इस फैसले को जिला न्यायाधीश, पाटन के समक्ष चुनौती दी। अपील के दौरान, प्रतिवादियों ने CPC के आदेश XLI नियम 27 के तहत अतिरिक्त दस्तावेज पेश करने का आवेदन किया। अपीलीय अदालत ने पाया कि भोलाराम और अश्वनी की बहनें (सुमित्रा बाई और कमला बाई) भी कानूनी उत्तराधिकारी थीं, लेकिन उन्हें मुकदमे में पक्षकार नहीं बनाया गया था। इसके आधार पर, अदालत ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया और निर्देश दिया कि आवश्यक पक्षकारों को जोड़कर मामले की नए सिरे से सुनवाई की जाए।

READ ALSO  सुप्रीम कोर्ट ने लोकसभा चुनाव के दौरान कलकत्ता हाई कोर्ट विज्ञापन के फैसले पर भाजपा की याचिका खारिज कर दी

पक्षकारों की दलीलें

वादियों के वकील श्री प्रवीण धुरंधर ने हाईकोर्ट में तर्क दिया कि रिमांड का आदेश “संक्षिप्त और यांत्रिक” (Summary and Mechanical) है। उन्होंने कहा कि अपीलीय अदालत को खुद साक्ष्यों का मूल्यांकन कर मेरिट पर फैसला करना चाहिए था। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के म्युनिसिपल कॉरपोरेशन, हैदराबाद बनाम सुंदर सिंह (2008) और सिराजुद्दीन बनाम जीनत व अन्य (2024) के मामलों का हवाला दिया।

दूसरी ओर, प्रतिवादियों के वकीलों ने तर्क दिया कि जब आवश्यक पक्षकार ही मुकदमे से गायब थे, तो निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित करने के लिए रिमांड ही एकमात्र कानूनी विकल्प था।

READ ALSO  सुप्रीम कोर्ट ने फिल्म 'Why I Killed Gandhi' पर रोक लगाने से किया इनकार- जानिए विस्तार से

हाईकोर्ट का विश्लेषण और निर्णय

हाईकोर्ट ने बंटवारे के मुकदमों में सभी कानूनी उत्तराधिकारियों की भागीदारी की अनिवार्यता पर जोर दिया। अदालत ने पाया कि प्रतिवादी ने सुमित्रा और कमला की पहचान बहनों के रूप में की थी, जिन्हें पक्षकार नहीं बनाया गया था।

CPC की धारा 99 का हवाला देते हुए अदालत ने कहा:

“बशर्ते कि इस धारा की कोई भी बात आवश्यक पक्षकार को न जोड़ने (non-joinder) पर लागू नहीं होगी।”

अतिरिक्त साक्ष्य और रिमांड के मुद्दे पर हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के जे. बालाजी सिंह बनाम दिवाकर कोल व अन्य (2017) के फैसले का उदाहरण दिया, जिसमें कहा गया था:

READ ALSO  साक्ष्य अधिनियम की धारा 106 को लागू करने के लिए अभियोजन पक्ष को यह स्थापित करना होगा कि अभियुक्त तथ्य का विशेष ज्ञान रखने की स्थिति में था: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

“एक बार जब प्रथम अपीलीय अदालत ने रिमांड का मन बना लिया, तो उसे रिमांड के कारणों को दर्ज करना आवश्यक था… इसलिए, मेरिट के कई मुद्दों पर निष्कर्ष दर्ज करने की कोई आवश्यकता नहीं थी। यह पूरी तरह से अनावश्यक था।”

न्यायमूर्ति गुरु ने अवलोकित किया कि प्रथम अपीलीय अदालत ने रिमांड के लिए पर्याप्त और ठोस कारण (जैसे पक्षकारों का न जुड़ना और नए दस्तावेजों का आना) दिए थे। हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अपीलीय अदालत के विवेक में कोई स्पष्ट त्रुटि नहीं है। अपील को खारिज कर दिया गया और ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया गया कि वह अपीलीय आदेश के अनुसार कार्यवाही शुरू करे।

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles