‘जल्दबाजी में निकाला गया निष्कर्ष’: सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट जज के खिलाफ हाईकोर्ट की ‘बौद्धिक बेईमानी’ वाली टिप्पणी हटाई

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट द्वारा एक विशेष ट्रायल कोर्ट जज के खिलाफ की गई तीखी टिप्पणियों को हटा दिया है। कोर्ट ने कहा कि जज पर “बौद्धिक बेईमानी” (Intellectual Dishonesty) का आरोप लगाने वाला “जल्दबाजी में निकाला गया निष्कर्ष” पूरी तरह से “अनुचित” (Unwarranted) था।

सीजेआई संजीव खन्ना और जस्टिस जोयमलया बागची की पीठ ने हाईकोर्ट की इन प्रतिकूल टिप्पणियों को रद्द करते हुए कहा कि ये निष्कर्ष “अनावश्यक” और “संदर्भ से बाहर” थे।

इस मामले में मुख्य कानूनी सवाल यह था कि क्या मध्य प्रदेश हाईकोर्ट एक यौन अपराध मामले में दोषसिद्धि को उलटते समय विशेष न्यायाधीश और लोक अभियोजक (Public Prosecutor) के खिलाफ व्यक्तिगत और पेशेवर टिप्पणी करने में उचित था। हाईकोर्ट ने जज पर इस आधार पर “बौद्धिक बेईमानी” का आरोप लगाया था कि उन्होंने कथित तौर पर उन सबूतों को नजरअंदाज किया जिनसे पता चलता था कि पीड़िता एक वयस्क थी और उसकी सहमति थी।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (POCSO) अधिनियम के तहत संचालित एक मुकदमे से जुड़ा है। विशेष अदालत के न्यायाधीश ने यौन हमले के एक मामले में एक आरोपी को दोषी ठहराया था, जिसके कारण आरोपी ने तीन साल से अधिक समय जेल में बिताया।

अपील पर सुनवाई करते हुए मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने दोषसिद्धि को पलट दिया। 17 दिसंबर, 2025 के अपने फैसले में हाईकोर्ट ने विशेष न्यायाधीश और लोक अभियोजक की आलोचना करते हुए इसे एक “बड़ी चूक” बताया, जिसके कारण “आरोपी के साथ अन्याय” हुआ। हाईकोर्ट ने पाया कि पीड़िता सहमति देने वाली वयस्क थी और दोषसिद्धि कायम रखने योग्य नहीं थी।

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हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा था:

“यह विशेष न्यायाधीश की ओर से बौद्धिक बेईमानी का संकेत है। रजिस्ट्री को निर्देश दिया जाता है कि संबंधित विशेष न्यायाधीश और लोक अभियोजक को इस बड़ी चूक के लिए कारण बताओ नोटिस जारी कर उनका स्पष्टीकरण मांगा जाए।”

इन टिप्पणियों और कारण बताओ नोटिस से व्यथित होकर, विशेष न्यायाधीश और लोक अभियोजक दोनों ने अलग-अलग अपीलों के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने हाईकोर्ट के तर्क और आयु निर्धारण से संबंधित वैधानिक ढांचे की जांच की। पीठ ने पाया कि हाईकोर्ट के निष्कर्षों ने कानून के प्रक्रियात्मक जनादेशों की अनदेखी की है।

आदेश देते हुए सीजेआई संजीव खन्ना ने कहा:

“हम संतुष्ट हैं कि हाईकोर्ट की टिप्पणियां पूरी तरह से अनावश्यक, संदर्भ से बाहर और जुवेनाइल जस्टिस एक्ट, 2015 की धारा 94 (आयु निर्धारण की विधि) के विपरीत हैं।”

शीर्ष अदालत ने टिप्पणी की कि हाईकोर्ट ने न्यायिक अधिकारी की सत्यनिष्ठा के संबंध में “जल्दबाजी में निष्कर्ष” निकाला। पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि भले ही ऊपरी अदालत के पास गुण-दोष के आधार पर फैसले को पलटने का अधिकार है, लेकिन उसे निचली अदालत के न्यायाधीशों के खिलाफ अपमानजनक व्यक्तिगत टिप्पणी करने से बचना चाहिए, जब तक कि दुर्भावना या भ्रष्टाचार का स्पष्ट सबूत न हो।

फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने अपीलों को स्वीकार कर लिया और रिकॉर्ड से अपमानजनक टिप्पणियों को तुरंत हटाने का निर्देश दिया।

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सीजेआई ने निर्देश दिया:

“आक्षेपित निर्णय, जहां तक ​​यह अपीलकर्ताओं (न्यायाधीश और अभियोजक) से संबंधित है, रद्द किया जाता है।”

इन टिप्पणियों को हटाकर, सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट रजिस्ट्री द्वारा जारी कारण बताओ नोटिस पर प्रभावी रूप से रोक लगा दी, जिससे ट्रायल जज और अभियोजक के न्यायिक और पेशेवर रिकॉर्ड सुरक्षित हो गए।

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