ग़ैर-आय अर्जित करने वाली पत्नी को ‘निष्क्रिय’ बताकर भरण-पोषण से वंचित नहीं किया जा सकता: दिल्ली हाईकोर्ट ने DV Act के तहत ₹50,000 दिए

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि गृहिणी के घरेलू श्रम के आर्थिक मूल्य को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता और केवल इस आधार पर कि पत्नी आय अर्जित नहीं करती, उसे “निष्क्रिय” या जानबूझकर आश्रित नहीं माना जा सकता। न्यायालय ने घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत अलग रह रही पत्नी को अंतरिम भरण-पोषण के रूप में ₹50,000 प्रदान किए।

न्यायमूर्ति स्वर्णा कांता शर्मा ने कहा कि गैर-आय अर्जित करने वाली पत्नी को निष्क्रिय मानना घरेलू योगदान की प्रकृति को न समझने का परिणाम है और ऐसा दृष्टिकोण भरण-पोषण के निर्धारण में अन्यायपूर्ण होगा।

पक्षकारों का विवाह 2012 में हुआ था और उनका एक नाबालिग पुत्र है। पत्नी का आरोप था कि 2020 में पति ने उसे और बच्चे को छोड़ दिया।

मजिस्ट्रेट अदालत ने यह कहते हुए अंतरिम भरण-पोषण देने से इंकार कर दिया था कि पत्नी शिक्षित और सक्षम है तथा नौकरी कर सकती है। अपीलीय अदालत से भी उसे कोई राहत नहीं मिली।

हाईकोर्ट  में पति ने तर्क दिया कि पत्नी “निष्क्रिय” रहकर भरण-पोषण नहीं मांग सकती और वह पहले से ही बच्चे की शिक्षा का खर्च उठा रहा है।

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न्यायालय ने स्पष्ट किया:

“गैर-आय अर्जित करने वाले जीवनसाथी को ‘निष्क्रिय’ मानना घरेलू योगदान की गलत समझ को दर्शाता है। गैर-रोज़गार को निष्क्रियता कहना आसान है; घर को चलाने में लगे श्रम को पहचानना कहीं अधिक कठिन है।”

न्यायालय ने कहा कि गृहिणी का श्रम कमाने वाले जीवनसाथी को प्रभावी ढंग से कार्य करने में सक्षम बनाता है और भरण-पोषण तय करते समय इस योगदान की अनदेखी करना “अवास्तविक और अन्यायपूर्ण” होगा।

अदालत ने कहा कि केवल कमाने की क्षमता भरण-पोषण से वंचित करने का आधार नहीं हो सकती। स्थापित विधि के अनुसार अर्जन की क्षमता और वास्तविक आय अलग-अलग अवधारणाएँ हैं।

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न्यायालय ने यह भी माना कि कई महिलाएँ विवाह या पारिवारिक दायित्वों के कारण नौकरी छोड़ देती हैं और बाद में उसी स्तर या वेतन पर कार्य में लौटना उनके लिए संभव नहीं होता।

अदालत ने कहा कि भारतीय समाज में विवाह के बाद महिलाओं से नौकरी छोड़ने की अपेक्षा की जाती है, लेकिन वैवाहिक विवादों में पति अक्सर इसी आधार पर भरण-पोषण से बचने के लिए पत्नी को “उच्च शिक्षित” बताकर जानबूझकर बेरोज़गार होने का आरोप लगाते हैं। ऐसा रुख स्वीकार नहीं किया जा सकता क्योंकि इससे परिवार निर्माण में वर्षों का समय देने वाली पत्नी आर्थिक रूप से असुरक्षित हो सकती है।

न्यायालय ने कहा कि घर का प्रबंधन, बच्चों की देखभाल और कमाने वाले जीवनसाथी के स्थानांतरण एवं करियर के अनुरूप जीवन ढालना भी कार्य ही है, भले ही उसका कोई करयोग्य आय या बैंक रिकॉर्ड न हो।

रिकॉर्ड पर पत्नी की किसी पूर्व या वर्तमान आय का कोई प्रमाण न मिलने पर न्यायालय ने घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत उसे ₹50,000 का अंतरिम भरण-पोषण प्रदान किया।

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अदालत ने यह भी कहा कि भरण-पोषण संबंधी कार्यवाही अक्सर “अत्यधिक विवादात्मक” हो जाती है, जिससे पक्षकारों और नाबालिग बच्चों के दीर्घकालिक हित प्रभावित होते हैं। न्यायालय ने सुझाव दिया कि ऐसे मामलों में मध्यस्थता अधिक रचनात्मक मार्ग प्रदान कर सकती है, क्योंकि मुकदमेबाज़ी में प्रायः पत्नी खर्च बढ़ाकर बताती है और पति आय कम दिखाता है, जिससे सार्थक संवाद कठिन हो जाता है।

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