सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को मौखिक रूप से संकेत दिया कि राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम के तहत हुए ऐसे भूमि अधिग्रहण मामले, जो 2018 से पहले अंतिम रूप से निपट चुके हैं, उन्हें किसानों को मुआवजे पर ब्याज देने के लिए दोबारा नहीं खोला जा सकता। अदालत एनएचएआई की उस पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई शुरू कर रही थी, जिसमें 2019 के तरसेम सिंह फैसले को पूर्वव्यापी रूप से लागू करने का विरोध किया गया है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की विशेष पीठ ने खुली अदालत में सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने एनएचएआई की ओर से दलील दी कि 2019 के फैसले के कारण लगभग ₹32,000 करोड़ का वित्तीय भार पड़ेगा, इसलिए इसे केवल भावी रूप से लागू किया जाना चाहिए।
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि जो दावे 2008 के आसपास लंबित थे, वे जारी रह सकते हैं, लेकिन 2018 से पहले अंतिम रूप ले चुके मामलों को दोबारा नहीं खोला जा सकता। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि बाद में समानता के आधार पर दायर आवेदनों में केवल सोलैटियम पर विचार हो सकता है, ब्याज पर नहीं, जैसा कि भूमि अधिग्रहण मामलों में किया जाता है।
पीठ ने पक्षकारों को लिखित दलीलें दाखिल करने की अनुमति दी और मामले को दो सप्ताह बाद फिर से सूचीबद्ध किया।
सितंबर 2019 के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम की धारा 3J को असंवैधानिक ठहराया था। यह प्रावधान भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 के लाभ — विशेष रूप से सोलैटियम और ब्याज — को लागू होने से रोकता था। अदालत ने कहा था कि इससे समान परिस्थितियों वाले भूमिधारकों के साथ असमान व्यवहार होता है, जो अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है।
इस फैसले के तहत 1997 से 2015 के बीच एनएचएआई द्वारा अधिग्रहित भूमि के मालिकों को सोलैटियम और ब्याज का लाभ देने का निर्देश दिया गया था।
एनएचएआई लगातार यह मांग करती रही है कि 2019 का फैसला केवल भविष्य के मामलों पर लागू हो। उसका कहना है कि पुराने मामलों को फिर से खोलने से भारी वित्तीय बोझ पड़ेगा। सॉलिसिटर जनरल ने बताया कि पहले यह राशि लगभग ₹100 करोड़ बताई गई थी, लेकिन बाद में इसका अनुमान ₹32,000 करोड़ तक पहुंच गया।
फरवरी 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने एनएचएआई की यह मांग खारिज कर दी थी और कहा था कि फैसले को केवल भावी रूप से लागू करने से वही स्थिति वापस आ जाएगी, जिसे तरसेम सिंह निर्णय ने खत्म करने का प्रयास किया था, और यह अनुच्छेद 14 के विपरीत होगा।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया था कि 2019 का फैसला उन मामलों को दोबारा खोलने का निर्देश नहीं देता जो पहले ही अंतिम रूप से निपट चुके हैं। इसका उद्देश्य केवल प्रभावित भूमिधारकों को सोलैटियम और ब्याज का लाभ देना था।
4 नवंबर को मुख्य न्यायाधीश की अगुवाई वाली पीठ ने एनएचएआई की पुनर्विचार याचिका को खुली अदालत में सुनने पर सहमति दी थी। नोटिस जारी कर मामले को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया था।
सोमवार की कार्यवाही में अदालत की मौखिक टिप्पणियों से संकेत मिला कि अंतिम रूप ले चुके मामलों को फिर से खोलने पर सीमा तय की जा सकती है, जबकि लंबित या जीवित दावों पर 2019 के फैसले के प्रभाव का अंतिम निर्णय लिखित दलीलों के बाद लिया जाएगा।

