हिरासत में आत्महत्या: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ₹10 लाख मुआवजे का निर्देश दिया, मोटर वाहन अधिनियम की तर्ज पर गाइडलाइन बनाने को कहा

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने न्यायिक हिरासत में आत्महत्या करने वाले एक नाबालिग की मां को 10 लाख रुपये का मुआवजा देने का उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया है। कोर्ट ने इस अप्राकृतिक मौत के लिए राज्य को पूर्ण रूप से जवाबदेह माना और सरकार को निर्देश दिया कि वह मोटर वाहन अधिनियम, 1988 के ‘मल्टीप्लायर’ (गुणक) फॉर्मूले की तर्ज पर हिरासत में मौत के मामलों में मुआवजा तय करने के लिए दिशा-निर्देश तैयार करे।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता के नाबालिग बेटे, सुखविंदर को 7 फरवरी, 2024 को गिरफ्तार किया गया था। यह गिरफ्तारी 2016 में यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम और भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत दर्ज एक आपराधिक मामले के वारंट के अनुपालन में की गई थी। इसके बाद उसे पीलीभीत जिला जेल में रखा गया था।

20 फरवरी, 2024 को जेल अधिकारियों ने याचिकाकर्ता को सूचना दी कि उनके बेटे की हिरासत में मौत हो गई है। पंचनामा और पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का कारण “फांसी के कारण दम घुटना” (asphyxia due to antimortem hanging) बताया गया, जो शौचालय के रोशनदान से लटककर आत्महत्या करने की ओर इशारा करता था। शरीर पर कोई बाहरी चोट नहीं पाई गई थी। धारा 176 CrPC (वर्तमान में धारा 196 BNSS) के तहत न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा प्रस्तुत जांच रिपोर्ट के बाद, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने निकटतम परिजन को ₹3,00,000 के मुआवजे का निर्देश दिया। राज्य सरकार द्वारा इस मुआवजे को जारी करने में की जा रही देरी और निष्क्रियता से क्षुब्ध होकर, याचिकाकर्ता ने उचित मुआवजे और दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग करते हुए रिट याचिका दायर की।

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता: याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि जेल के पुलिसकर्मियों द्वारा अवैध मांगों को पूरा न करने पर नाबालिग को यातनाएं दी गईं। इसमें प्रताड़ना से बचने के लिए ₹4,500 की मासिक वसूली की मांग शामिल थी, जिसके कारण अंततः उसकी अप्राकृतिक मौत हुई। याचिकाकर्ता ने यह भी आरोप लगाया कि अधिकारियों ने परिवार पर तुरंत अंतिम संस्कार करने का दबाव डाला और वादा किया गया मुआवजा भी नहीं दिया, जो संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत दिए गए मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। मुआवजे के दावे के समर्थन में नीलाबती बेहरा बनाम उड़ीसा राज्य, री-इनह्यूमन कंडीशंस इन 1382 प्रिज़न्स, और मेघालय हाईकोर्ट के स्वत: संज्ञान कस्टोडियल वायलेंस मामलों का हवाला दिया गया।

प्रतिवादी (राज्य): राज्य सरकार ने प्रस्तुत किया कि यह स्पष्ट रूप से आत्महत्या का मामला था और रिकॉर्ड पर ऐसा कोई सबूत नहीं है जो अधिकारियों की ओर से लापरवाही, कदाचार या हिरासत में हिंसा का संकेत देता हो। राज्य ने बताया कि सरकार NHRC द्वारा अनुशंसित ₹3,00,000 के मुआवजे को पहले ही मंजूरी दे चुकी है। भुगतान में देरी का कारण मृतक के वैध निकटतम परिजन के सत्यापन की चल रही प्रक्रिया और बजटीय आवंटन प्राप्त होना बताया गया।

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कोर्ट का विश्लेषण

जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने इस बात पर जोर दिया कि हिरासत में मौत राज्य पर एक सख्त जिम्मेदारी डालती है और इसके लिए कड़ी संवैधानिक जांच की आवश्यकता होती है।

कोर्ट ने टिप्पणी की, “हिरासत में यातना मानवीय गरिमा पर एक सुनियोजित हमला है और जब भी मानवीय गरिमा को ठेस पहुँचती है, तो सभ्यता एक कदम पीछे चली जाती है।” पीठ ने माना कि कैदियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना राज्य का पूर्ण और अहस्तांतरणीय (non-delegable) कर्तव्य है।

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इंटरनेशनल कमेटी ऑफ द रेड क्रॉस (ICRC) के दिशा-निर्देशों और री-इनह्यूमन कंडीशंस इन 1382 प्रिज़न्स मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भरोसा करते हुए, कोर्ट ने प्राकृतिक और अप्राकृतिक मौतों के बीच अंतर स्पष्ट किया। कोर्ट ने माना कि आत्महत्या एक जानबूझकर की गई बाहरी चोट (intentional external injury) है और इसलिए इसे एक अप्राकृतिक मौत के रूप में वर्गीकृत किया जाएगा, जिसके लिए राज्य पूर्ण रूप से उत्तरदायी है।

कोर्ट ने इस बात पर गौर किया कि बाहरी चोटों की अनुपस्थिति के बावजूद, राज्य सबूत का भार (burden of proof) उठाने में विफल रहा। कोर्ट ने कहा, “प्रतिवादियों द्वारा दिए गए स्पष्टीकरण न तो ठोस हैं और न ही उस धारणा को खारिज करने के लिए पर्याप्त हैं कि याचिकाकर्ता के बेटे की मृत्यु जेल में हुई।”

राहत प्रदान करने के अपने अधिकार को तय करने के लिए, पीठ ने रुदुल साह बनाम बिहार राज्य और नीलाबती बेहरा बनाम उड़ीसा राज्य में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का संदर्भ दिया, जिसमें मौलिक अधिकार के उल्लंघन के लिए मौद्रिक मुआवजे को सार्वजनिक कानून के तहत एक उचित उपाय माना गया था। डी.के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य का हवाला देते हुए कोर्ट ने दोहराया कि ऐसे मुआवजे का उद्देश्य “घावों पर मरहम लगाना है न कि उल्लंघनकर्ता को दंडित करना।”

मुआवजे की राशि पर चर्चा करते हुए, कोर्ट ने मेघालय हाईकोर्ट के एक फैसले पर विचार किया जिसमें उम्र के आधार पर मुआवजे की श्रेणियां बनाई गई थीं। हालांकि, यह नोट करते हुए कि सुप्रीम कोर्ट ने उस विशिष्ट वर्गीकरण पर रोक लगा दी है, पीठ ने हाल के उच्च न्यायालयों के उन फैसलों पर भरोसा किया जिनमें हिरासत में मौत के लिए लगातार ₹10 लाख का मुआवजा दिया गया है।

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इसके अलावा, कोर्ट ने हिरासत में मौत के सभी मामलों में उठाए जाने वाले अनिवार्य प्रारंभिक कदमों को रेखांकित किया, जिसमें परिवार को तत्काल सूचना देना, त्वरित पंचनामा तैयार करना, पोस्टमार्टम की अनिवार्य वीडियो रिकॉर्डिंग, तत्काल न्यायिक जांच (inquest) और NHRC द्वारा तय किए गए प्रारंभिक मुआवजे का त्वरित भुगतान शामिल है।

फैसला

रिट याचिका को स्वीकार करते हुए, हाईकोर्ट ने प्रतिवादियों को निर्देश दिया कि वे तीन सप्ताह की अवधि के भीतर मृतक के कानूनी वारिसों को ₹10,00,000 (दस लाख रुपये) का मुआवजा अदा करें।

एक महत्वपूर्ण निर्देश में, कोर्ट ने राज्य सरकार को आदेश दिया कि वह “मोटर वाहन अधिनियम, 1988 के तहत उपलब्ध उम्र, आय और आश्रितों पर आधारित गुणक (multiplier) पद्धति के समान कस्टोडियल डेथ के मामलों में मुआवजा देने के लिए प्रासंगिक और ठोस मापदंडों को अपनाते हुए दिशा-निर्देश तैयार करे।”

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यह मुआवजा याचिकाकर्ता को संबंधित अधिकारियों के खिलाफ उचित नागरिक (civil) या आपराधिक (criminal) कार्यवाही शुरू करने के अधिकार से वंचित नहीं करेगा।

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