दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि रेंट कंट्रोलर (Rent Controller) अपनी पुनर्विचार (Review) शक्तियों का उपयोग करके किसी केस की दोबारा सुनवाई नहीं कर सकता और न ही सबूतों का पुनर्मूल्यांकन कर सकता है, जैसे कि वह किसी अपील पर सुनवाई कर रहा हो। जस्टिस सौरभ बनर्जी ने एक रेंट कंट्रोलर के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसके तहत पूर्व में जारी बेदखली (Eviction) के आदेश को वापस ले लिया गया था।
हाईकोर्ट ने कहा कि दिल्ली रेंट कंट्रोल एक्ट के तहत पुनर्विचार की शक्तियां बेहद सीमित हैं और इसका इस्तेमाल केवल इसलिए किसी फैसले को बदलने के लिए नहीं किया जा सकता क्योंकि उस पर एक अलग दृष्टिकोण भी संभव है। कोर्ट ने किरायेदारों को अपंजीकृत दस्तावेजों (Unregistered Documents) के आधार पर स्वामित्व का दावा करने से रोकते हुए उन्हें छह महीने के भीतर परिसर खाली करने का आदेश दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता (मकान मालिक) ने दिल्ली रेंट कंट्रोल एक्ट, 1958 की धारा 14(1)(e) के तहत दो बेदखली याचिकाएं दायर की थीं। वे दिल्ली के हौज सुई वालान, चांदनी महल स्थित संपत्ति की पहली और दूसरी मंजिल को खाली कराना चाहते थे। मकान मालिकों ने अपने बढ़ते परिवारों के लिए आवासीय आवश्यकता का हवाला दिया था, यह बताते हुए कि वे वर्तमान में टिन-शेड और किराए के एक कमरे में रह रहे हैं जो उनके लिए अपर्याप्त है।
प्रतिवादी (किरायेदारों) ने ‘लीव टू डिफेंड’ (Leave to Defend) के लिए आवेदन किया और मकान मालिकों के मालिकाना हक को चुनौती दी। उन्होंने दावा किया कि उन्होंने 3 जुलाई 1996 को मकान मालिकों के दादा, श्री अब्दुल रशीद से जनरल पावर ऑफ अटॉर्नी (GPA), एग्रीमेंट टू सेल और वसीयत के जरिए यह संपत्ति 2,00,000 रुपये में खरीद ली थी। किरायेदारों का तर्क था कि अब वे किरायेदार नहीं बल्कि मालिक हैं।
26 फरवरी 2019 को, तत्कालीन रेंट कंट्रोलर ने बेदखली याचिकाओं को स्वीकार कर लिया था। उन्होंने माना था कि किरायेदारों द्वारा प्रस्तुत किए गए अपंजीकृत दस्तावेज (Unregistered Documents) अचल संपत्ति में कोई मालिकाना हक नहीं बनाते हैं। इसके विपरीत, मकान मालिकों ने 1958 की सेल डीड और 1999 की विभाजन विलेख (Partition Deed) के आधार पर अपना ‘बेहतर हक’ (Better Title) साबित कर दिया था।
हालाँकि, किरायेदारों ने इस आदेश के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दायर की। 20 सितंबर 2022 को, नए रेंट कंट्रोलर (Successor RC) ने पुनर्विचार याचिका स्वीकार करते हुए 2019 के बेदखली आदेश को रद्द कर दिया और कहा कि किरायेदारों ने विचारणीय मुद्दे उठाए हैं। इससे व्यथित होकर मकान मालिकों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
हाईकोर्ट की टिप्पणी और विश्लेषण
जस्टिस सौरभ बनर्जी ने कहा कि पुनर्विचार का अधिकार क्षेत्र सीमित है और इसका उद्देश्य उन्हीं दलीलों पर नए सिरे से फैसला करना नहीं है।
रिव्यू जूरिस्डिक्शन का दायरा: हाईकोर्ट ने नए रेंट कंट्रोलर की आलोचना करते हुए कहा कि उन्होंने एक अपीलीय अदालत (Appellate Court) की तरह काम किया है। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों (यशवंत सिन्हा बनाम सीबीआई और कमलेश वर्मा बनाम मायावती) का हवाला देते हुए, कोर्ट ने कहा कि पुनर्विचार याचिका ‘छद्म अपील’ (Appeal in Disguise) नहीं हो सकती।
कोर्ट ने टिप्पणी की:
“रेंट कंट्रोलर के लिए यह अनुचित है कि वह पुनर्विचार की आड़ में उन दलीलों पर फिर से फैसला करे जिन पर पहले ही विचार किया जा चुका है… रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री का पुनर्मूल्यांकन करना रिव्यू के दायरे से बाहर है।”
अपंजीकृत दस्तावेज और मालिकाना हक: कोर्ट ने नोट किया कि पूर्व रेंट कंट्रोलर ने 1996 के ‘एग्रीमेंट टू सेल’ पर पहले ही विचार कर लिया था और सही ठहराया था कि चूंकि यह पंजीकृत नहीं है, इसलिए यह अचल संपत्ति में कोई अधिकार नहीं देता। हाईकोर्ट ने कहा कि नए रेंट कंट्रोलर के पास उसी दस्तावेज पर दोबारा विचार करके अलग निष्कर्ष निकालने का कोई कारण नहीं था।
विबंधन (Estoppel) का सिद्धांत: कोर्ट ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 116 के तहत ‘विबंधन’ (Estoppel) के सिद्धांत को दोहराया। चूंकि किरायेदारों ने स्वीकार किया था कि उन्हें 1987 में परिसर में किरायेदार के रूप में रखा गया था, इसलिए वे मकान मालिक के हक को चुनौती नहीं दे सकते। श्रीमती शांति शर्मा बनाम श्रीमती वेद प्रभा (1987) के मामले का हवाला देते हुए, कोर्ट ने कहा कि बेदखली के मुकदमे में मकान मालिक को ‘पूर्ण स्वामित्व’ (Absolute Title) साबित करने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि केवल किरायेदार से बेहतर हक साबित करना होता है।
फैसला
दिल्ली हाईकोर्ट ने मकान मालिकों की याचिकाओं को स्वीकार किया और 20 सितंबर 2022 के पुनर्विचार आदेश को रद्द कर दिया।
नतीजतन, 26 फरवरी 2019 का बेदखली आदेश बहाल कर दिया गया। कोर्ट ने आदेश दिया कि दिल्ली रेंट कंट्रोल एक्ट की धारा 14(7) के मद्देनजर, किरायेदार छह महीने की अवधि के भीतर संबंधित परिसर को खाली करें और उसका शांतिपूर्ण और भौतिक कब्जा मकान मालिकों को सौंप दें।
- केस टाइटल: आमिर खान और अन्य बनाम अजीज उर रहमान और साजिद खान और अन्य बनाम इनाम-उल-हक (मृतक) उनके कानूनी प्रतिनिधियों के माध्यम से
- केस नंबर: RC. REV. 219/2023 और RC. REV. 220/2023

