कलकत्ता हाईकोर्ट: ‘लाइसेंसधारी’ के रूप में रहना ‘उचित उपयुक्त आवास’ नहीं; मकान मालिक को किराएदार को बेदखल करने का अधिकार

कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि यदि कोई मकान मालिक किसी अन्य की संपत्ति में केवल एक ‘लाइसेंसधारी’ (Licensee) के तौर पर रह रहा है, तो यह नहीं कहा जा सकता कि उसके पास रहने के लिए ‘उचित और उपयुक्त आवास’ (Reasonable Suitable Accommodation) उपलब्ध है।

न्यायमूर्ति डॉ. अजॉय कुमार मुखर्जी की पीठ ने मकान मालिकों द्वारा दायर दूसरी अपील (Second Appeal) को स्वीकार करते हुए कहा कि लाइसेंसधारी के रूप में कब्जा “अनिश्चित और असुरक्षित” (Precarious and Unsecured) होता है। कोर्ट ने कहा कि किसी भी मकान मालिक को दूसरे की दया पर रहने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है।

इस फैसले के साथ, हाईकोर्ट ने प्रथम अपीलीय अदालत के फैसले को रद्द कर दिया और ट्रायल कोर्ट द्वारा पारित बेदखली (Eviction) की डिक्री को बहाल कर दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह अपील अमित सेन और अन्य बनाम आशीष रॉय और अन्य (S.A. 325 of 2009) मामले से संबंधित थी। विवाद 27बी, चक्रबेरिया रोड स्थित परिसर से जुड़ा था, जिसके लिए वादी (मकान मालिकों) ने प्रतिवादियों (किराएदारों) के खिलाफ बेदखली का मुकदमा दायर किया था।

मकान मालिकों ने 30 जनवरी, 1956 को मूल मालिक मन्मथ नाथ सेन द्वारा निष्पादित एक ट्रस्ट डीड के आधार पर स्वामित्व का दावा किया। ट्रस्टी श्रीमती प्रमिला बाला सेन की मृत्यु के बाद, संपत्ति उनके बेटे विभूति भूषण सेन (अपीलकर्ताओं के पूर्वज) में निहित हो गई थी। मकान मालिकों का तर्क था कि उन्हें अपने और अपने परिवार के उपयोग के लिए उक्त परिसर की आवश्यकता है, क्योंकि वे वर्तमान में 32ई, शरत बोस रोड पर संतोष किशोर सेन और देब किशोर सेन के स्वामित्व वाले मकान में केवल ‘लाइसेंसधारी’ के रूप में रह रहे थे, और वह लाइसेंस भी अब रद्द कर दिया गया है।

दूसरी ओर, किराएदारों ने तर्क दिया कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 14(1) के तहत प्रमिला बाला सेन सभी ट्रस्ट संपत्तियों की पूर्ण स्वामी बन गई थीं। इसलिए, वादी कई संपत्तियों में सह-हि हिस्सेदार (Co-sharers) हैं और उनके पास वैकल्पिक उपयुक्त आवास मौजूद है।

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निचली अदालतों के फैसले

ट्रायल कोर्ट (तृतीय अतिरिक्त सिविल जज, जूनियर डिवीजन, अलीपुर) ने 30 अगस्त, 2006 को मकान मालिकों के पक्ष में फैसला सुनाया था, यह मानते हुए कि उनकी आवश्यकता उचित थी। हालांकि, प्रथम अपीलीय अदालत (सिविल जज, सीनियर डिवीजन, 5वीं कोर्ट, अलीपुर) ने 14 जनवरी, 2009 को इस फैसले को पलट दिया। अपीलीय अदालत का कहना था कि वादी अन्य संपत्तियों में सह-हि हिस्सेदार थे, इसलिए वे वास्तविक आवश्यकता (Bonafide Requirement) साबित करने में विफल रहे।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और निर्णय

हाईकोर्ट के समक्ष मुख्य प्रश्न यह था कि क्या प्रथम अपीलीय अदालत ने यह मानने में गलती की कि मकान मालिकों को परिसर की उचित आवश्यकता नहीं है।

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न्यायमूर्ति मुखर्जी ने किराएदारों की दलीलों को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि चूंकि यह पहले ही तय हो चुका है कि वादी केवल विवादित संपत्ति के मालिक हैं, इसलिए शरत बोस रोड (जहां वे लाइसेंसधारी थे) में आवास की पर्याप्तता का कोई महत्व नहीं रह जाता।

कोर्ट ने वादी के वर्तमान निवास की प्रकृति पर टिप्पणी करते हुए कहा:

“वादी का एक लाइसेंसधारी के रूप में आवास ‘उचित उपयुक्त आवास’ नहीं माना जा सकता। यदि कोई व्यक्ति किसी परिसर में केवल अनुज्ञा और लाइसेंस (Leave and License) के तहत रह रहा है, जो लाइसेंसदाता की इच्छा पर पहले ही रद्द किया जा चुका है, तो यह कभी नहीं कहा जा सकता कि वादी के पास उचित उपयुक्त आवास है। ऐसा इसलिए है क्योंकि उनका वहां रहने का अधिकार पूरी तरह से दूसरे की अनुमति पर निर्भर करता है और उनका कब्जा अत्यधिक अनिश्चित और असुरक्षित है।”

किराएदारों ने स्थानीय निरीक्षण (Local Inspection) की मांग की थी और तर्क दिया था कि वादियों ने 10बी, नफर कुंडू रोड पर संपत्ति में हित प्राप्त किया है। कोर्ट ने इन दलीलों को भी खारिज कर दिया और कहा कि बाद की घटनाओं ने वादी की वास्तविक आवश्यकता को कम नहीं किया है।

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अंततः, हाईकोर्ट ने माना कि वादी पश्चिम बंगाल परिसर किरायेदारी अधिनियम, 1956 की धारा 13(1)(ff) के तहत सभी शर्तों को साबित करने में सफल रहे हैं। तदनुसार, अपील स्वीकार की गई और ट्रायल कोर्ट का बेदखली आदेश बहाल कर दिया गया।

  • केस टाइटल: अमित सेन और अन्य बनाम आशीष रॉय और अन्य
  • केस नंबर: S.A. 325 of 2009 (IA No. CAN 7 of 2022 और CAN 8 of 2022 के साथ)

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