तलाक के मामले में बिना सहमति के प्राप्त व्हाट्सएप चैट और कॉल रिकॉर्डिंग भी सबूत के रूप में मान्य; निजता के अधिकार से ऊपर है निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि निजता का अधिकार (Right to Privacy), हालांकि एक मौलिक अधिकार है, लेकिन यह पूर्ण (Absolute) नहीं है और वैवाहिक विवादों में निष्पक्ष सुनवाई (Fair Trial) के अधिकार के सामने इसे झुकना होगा। हाईकोर्ट ने एक पत्नी की याचिका को खारिज करते हुए फैमिली कोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें पति को तलाक की कार्यवाही के दौरान सबूत के तौर पर मोबाइल रिकॉर्डिंग और व्हाट्सएप चैट पेश करने की अनुमति दी गई थी। कोर्ट ने कहा कि केवल इसलिए साक्ष्य को खारिज नहीं किया जा सकता क्योंकि उसे बिना सहमति के प्राप्त किया गया था।

मामले की पृष्ठभूमि

विवाद की शुरुआत तब हुई जब प्रतिवादी-पति ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13(1)(ia)(ib) के तहत तलाक की अर्जी दाखिल की। तलाक के आधारों को पुख्ता करने के लिए पति ने सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश VII नियम 14 के तहत एक आवेदन दायर किया। इसमें उसने पत्नी, उसके रिश्तेदारों और अन्य व्यक्तियों के बीच हुई व्हाट्सएप चैट और बातचीत की मोबाइल रिकॉर्डिंग को रिकॉर्ड पर लेने की मांग की।

याचिकाकर्ता-पत्नी ने इस आवेदन का कड़ा विरोध किया। उसका तर्क था कि उसका पति “संदिग्ध मानसिकता” का व्यक्ति है और उसने मोबाइल हैक करके अवैध तरीके से ये इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य जुटाए हैं। पत्नी ने दलील दी कि ऐसे सबूतों को स्वीकार करना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्राप्त उसके जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार, विशेष रूप से निजता के अधिकार का उल्लंघन होगा।

रायपुर फैमिली कोर्ट के प्रथम अतिरिक्त प्रधान न्यायाधीश ने 12 दिसंबर, 2024 को पत्नी की आपत्तियों को खारिज करते हुए पति के आवेदन को स्वीकार कर लिया था। कोर्ट का मानना था कि विवाद के निपटारे के लिए ये दस्तावेज प्रासंगिक हो सकते हैं। इस आदेश से असंतुष्ट होकर पत्नी ने हाईकोर्ट में याचिका (WP227 संख्या 158 वर्ष 2025) दायर की।

पक्षकारों की दलीलें

याचिकाकर्ता (पत्नी) का पक्ष: पत्नी के वकील ने तर्क दिया कि साक्ष्य धोखाधड़ी और बिना सहमति के प्राप्त किए गए हैं, जो निजता पर सीधा हमला है। उन्होंने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के ही एक पुराने फैसले आशा लता सोनी बनाम दुर्गेश सोनी (2023) का हवाला देते हुए कहा कि अवैध तरीकों से प्राप्त दस्तावेजों को साक्ष्य के रूप में स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए।

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प्रतिवादी (पति) का पक्ष: पति के वकील ने आदेश का बचाव करते हुए कहा कि इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के साथ भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65-बी के तहत प्रमाणपत्र भी दिया गया है, जो इसकी सत्यता की पुष्टि करता है। उन्होंने तर्क दिया कि यदि साक्ष्य मामले से संबंधित है, तो उसे प्राप्त करने का तरीका उसे अस्वीकार्य नहीं बनाता। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के एम.सी. वर्गीज बनाम टी.जे. पूनन और हालिया फैसले विभोर गर्ग बनाम नेहा (2025) पर भरोसा जताया।

कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

जस्टिस सचिन सिंह राजपूत ने फैसला सुनाते हुए साक्ष्य अधिनियम के कड़े नियमों और फैमिली कोर्ट अधिनियम, 1984 के विशेष प्रावधानों के बीच संतुलन पर ध्यान केंद्रित किया।

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1. फैमिली कोर्ट अधिनियम की धारा 14: कोर्ट ने जोर दिया कि धारा 14 एक विशेष कानून है जो साक्ष्य अधिनियम के कड़े सिद्धांतों को शिथिल करता है। यह फैमिली कोर्ट को किसी भी ऐसे दस्तावेज या जानकारी को स्वीकार करने की शक्ति देता है जो विवाद को प्रभावी ढंग से सुलझाने में मदद कर सके, चाहे वह साक्ष्य अधिनियम के तहत प्रासंगिक या स्वीकार्य हो या न हो।

कोर्ट ने टिप्पणी की:

“फैमिली कोर्ट के लिए एकमात्र मार्गदर्शक कारक यह है कि उसकी राय में क्या ऐसा साक्ष्य वैवाहिक विवाद को प्रभावी ढंग से निपटाने में सहायक होगा।”

2. अवैध रूप से प्राप्त साक्ष्यों की स्वीकार्यता: अवैध तरीके से साक्ष्य जुटाने की दलील पर कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के आर.एम. मलकानी बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले का उल्लेख किया। कोर्ट ने कानूनी स्थिति दोहराई कि यदि साक्ष्य प्रासंगिक और वास्तविक है, तो वह स्वीकार्य बना रहता है, भले ही उसे प्राप्त करने का तरीका उचित न रहा हो।

3. निजता बनाम निष्पक्ष सुनवाई: कोर्ट ने पत्नी के निजता के अधिकार और पति के निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार के बीच संतुलन बनाया। पुट्टस्वामी फैसले का जिक्र करते हुए कोर्ट ने माना कि निजता एक मौलिक अधिकार है, लेकिन यह उचित प्रतिबंधों के अधीन है।

जस्टिस राजपूत ने स्पष्ट किया:

“मुकदमा लड़ने वाले पक्षकार के पास निश्चित रूप से निजता का अधिकार है, लेकिन उस अधिकार को दूसरे पक्ष के उस अधिकार के सामने झुकना होगा जिसमें वह अपना मामला साबित करने के लिए अदालत में प्रासंगिक साक्ष्य लाना चाहता है। यह निष्पक्ष सुनवाई की एक स्थापित अवधारणा है कि मुकदमा लड़ने वाले पक्ष को अदालत के सामने प्रासंगिक साक्ष्य लाने का उचित अवसर मिलना चाहिए।”

कोर्ट ने तर्क दिया कि फैमिली कोर्ट व्यक्तिगत रिश्तों और अंतरंगता से जुड़े संवेदनशील विवादों का फैसला करते हैं। यदि निजता के नाम पर साक्ष्यों को रोका गया, तो फैमिली कोर्ट अधिनियम का उद्देश्य ही विफल हो जाएगा।

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4. साक्ष्य अधिनियम की धारा 122: सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले विभोर गर्ग बनाम नेहा (2025 INSC 829) का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि साक्ष्य अधिनियम की धारा 122 (वैवाहिक विशेषाधिकार) “विवाह की पवित्रता” की रक्षा के लिए है, न कि व्यक्तिगत निजता के लिए। इसलिए, पति-पत्नी के बीच मुकदमों में निजता का तर्क देकर साक्ष्य को नहीं रोका जा सकता।

फैसला

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि फैमिली कोर्ट का पति को इलेक्ट्रॉनिक दस्तावेज रिकॉर्ड पर लाने की अनुमति देने वाला आदेश पूरी तरह से न्यायसंगत था। कोर्ट ने कहा कि ऐसी कार्यवाहियों में स्वीकार्यता की कसौटी केवल “प्रासंगिकता” है। निष्पक्ष सुनवाई और सार्वजनिक न्याय के आधारभूत विचार यह मांग करते हैं कि साक्ष्य को स्वीकार किया जाए, चाहे वह किसी भी तरह एकत्र किया गया हो।

हाईकोर्ट ने पत्नी की याचिका को सारहीन मानकर खारिज कर दिया और फैमिली कोर्ट के आदेश की पुष्टि की।

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