एआई से तैयार याचिकाओं में फर्जी निर्णयों का हवाला देना “पूर्णतः अस्वीकार्य”: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को वकीलों द्वारा कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) उपकरणों से तैयार याचिकाएँ दाखिल करने की बढ़ती प्रवृत्ति पर गंभीर चिंता जताई और कहा कि ऐसी याचिकाओं में अस्तित्वहीन निर्णयों तथा गलत उद्धरणों का उल्लेख किया जा रहा है, जो “पूर्णतः अस्वीकार्य” है।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना तथा जॉयमाल्या बागची की पीठ ने यह टिप्पणी उस समय की, जब वह राजनीतिक भाषणों के संबंध में दिशानिर्देश की मांग वाली अकादमिक रूप रेखा वर्मा की जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी।

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति नागरत्ना ने बताया कि हाल ही में उनके समक्ष “Mercy vs Mankind” नामक एक ऐसे निर्णय का हवाला दिया गया, जो अस्तित्व में ही नहीं है।

मुख्य न्यायाधीश ने भी एक समान उदाहरण का उल्लेख करते हुए कहा कि न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता की अदालत में “एक नहीं बल्कि कई ऐसे निर्णयों का हवाला दिया गया” जो वास्तविक नहीं थे।

न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि कई बार निर्णय सही होता है, लेकिन उसमें ऐसे कथन जोड़ दिए जाते हैं जो वास्तव में उस फैसले का हिस्सा नहीं होते, जिससे सत्यापन करना कठिन हो जाता है।
उन्होंने कहा, “इससे न्यायाधीशों पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है।”

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पीठ ने कहा कि कुछ वकील याचिकाएँ तैयार करने के लिए एआई का उपयोग कर रहे हैं और बिना सत्यापन के ऐसे दस्तावेज अदालत में दाखिल किए जा रहे हैं।

मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “हम इस बात से चिंतित हैं कि कुछ वकील एआई से याचिकाएँ तैयार कर रहे हैं। यह बिल्कुल अस्वीकार्य है।”

न्यायमूर्ति बागची ने विधिक ड्राफ्टिंग की गुणवत्ता में गिरावट पर भी चिंता जताई।
उन्होंने कहा कि कई विशेष अनुमति याचिकाएँ (SLPs) केवल पूर्व निर्णयों के लंबे उद्धरणों से भरी होती हैं और उनमें स्वतंत्र विधिक आधारों का समुचित प्रतिपादन नहीं होता।

मामला राजनीतिक भाषणों के लिए दिशानिर्देश की मांग से संबंधित है, जिसमें अदालत ने पूर्व में याचिकाकर्ताओं को नई याचिका दाखिल करने को कहा था।

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