सुप्रीम कोर्ट ने आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 (Essential Commodities Act) के तहत दो व्यक्तियों की सजा को रद्द कर दिया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष का मामला “पूरी तरह से भ्रामक” (Wholly Misconceived) था क्योंकि कथित अपराध की तारीख से पहले ही केंद्र सरकार ने सीमेंट की कीमत और वितरण पर से वैधानिक नियंत्रण वापस ले लिया था।
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने बॉम्बे हाईकोर्ट (औरंगाबाद बेंच) के उस फैसले के खिलाफ अपीलकर्ताओं, मनोज और प्रकाश द्वारा दायर अपील को स्वीकार कर लिया, जिसमें उनकी सजा को बरकरार रखा गया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रासंगिक तारीख पर आवश्यक वस्तु अधिनियम की धारा 3 के तहत कोई विद्यमान आदेश (Subsisting Order) न होने की स्थिति में, धारा 7 के तहत सजा “कानूनी रूप से अस्वीकार्य” है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला मार्च 1994 का है। अभियोजन पक्ष का आरोप था कि पीडब्ल्यूडी (PWD) के गोदाम से कन्नड़-बहिरगांव रोड पर ‘खार पैसेज’ के निर्माण के लिए जारी की गई सीमेंट की 400 बोरियों को डायवर्ट (मोड़) दिया गया था।
गुप्त सूचना के आधार पर, 24 मार्च 1994 को पुलिस ने औरंगाबाद में मिस्त्री ट्रेडर्स और महाराष्ट्र एग्रो इंडस्ट्रीज के पास छापा मारा। आरोप था कि अपीलकर्ताओं के पास सरकारी कोटे की 365 बोरी सीमेंट पाई गई। पुलिस का दावा था कि अपीलकर्ताओं ने कालाबाजारी के इरादे से ठेकेदार और उसके सहयोगियों से यह सीमेंट खरीदा था।
अपीलकर्ताओं पर आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 की धारा 3 के साथ पठित धारा 7 के तहत महाराष्ट्र सीमेंट (लाइसेंसिंग और नियंत्रण) आदेश, 1973 के उल्लंघन का आरोप लगाया गया। 3 अप्रैल 2000 को विशेष न्यायाधीश, औरंगाबाद ने उन्हें दोषी ठहराते हुए एक साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई। बाद में, 9 अक्टूबर 2014 को हाईकोर्ट ने भी उनकी अपील खारिज कर दी, जिसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
पक्षकारों की दलीलें
अपीलकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ वकील ने तर्क दिया कि उनकी दोषसिद्धि कानूनी रूप से अस्थिर है क्योंकि घटना से पहले ही सीमेंट पर से सरकारी नियंत्रण हटा लिया गया था।
- यह दलील दी गई कि केंद्र सरकार ने S.O. 168(E) दिनांक 1 मार्च 1989 के जरिए सीमेंट नियंत्रण आदेश, 1967 में संशोधन किया था, जिससे मूल्य और वितरण नियंत्रण हटा दिए गए थे।
- इसके अलावा, S.O. 624(E) दिनांक 7 अगस्त 1990 के द्वारा खुदरा सीमेंट वितरण को विनियमित करने के लिए राज्य सरकारों को दी गई शक्तियों को भी वापस ले लिया गया था।
- परिणामस्वरूप, कथित अपराध की तारीख (24 मार्च 1994) पर आवश्यक वस्तु अधिनियम की धारा 3 के तहत कोई भी ऐसा आदेश प्रभावी नहीं था जिसका उल्लंघन किया गया हो।
इसके विपरीत, महाराष्ट्र राज्य के वकील ने तर्क दिया कि अपीलकर्ताओं के पास सरकारी सीमेंट का कब्जा उचित संदेह से परे साबित हुआ है। चूंकि उनके पास भंडारण के लिए कोई वैध लाइसेंस नहीं था, इसलिए वैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन हुआ है।
कोर्ट का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने वैधानिक ढांचे, विशेष रूप से सीमेंट नियंत्रण (संशोधन) आदेश, 1989 और 1990 की अधिसूचना के प्रभाव की जांच की।
जस्टिस आर. महादेवन ने फैसला लिखते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष प्रासंगिक तारीख पर लागू किसी भी नियंत्रण आदेश या वैधानिक प्रतिबंध को रिकॉर्ड पर लाने में विफल रहा।
पीठ ने अपने फैसले में कहा:
“मौजूदा मामले में, कथित अपराध 24.03.1994 को हुआ बताया गया है। उस तारीख पर, न तो सीमेंट नियंत्रण आदेश, 1967 और न ही 1973 के आदेश के तहत महाराष्ट्र राज्य की लाइसेंसिंग व्यवस्था लागू थी, जिससे आवश्यक वस्तु अधिनियम की धारा 7 के तहत दंडात्मक परिणाम आकर्षित हो सकें।”
कोर्ट ने कोल्हापुर केनशुगर वर्क्स लिमिटेड बनाम भारत संघ (2000) के फैसले का हवाला देते हुए दोहराया कि जब किसी कानून को बिना किसी ‘सेविंग क्लॉज’ (बचत खंड) के बिना शर्त हटा दिया जाता है, तो उस पर आधारित सभी कार्यवाही समाप्त हो जाती है।
अदालत ने कहा:
“उपरोक्त सिद्धांत को लागू करते हुए, कथित घटना की तारीख पर किसी भी विद्यमान वैधानिक नियंत्रण या बचत प्रावधान के अभाव में, आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत अपीलकर्ताओं का अभियोजन कानूनी रूप से अस्थिर है। केवल इसी आधार पर, अपीलकर्ताओं की दोषसिद्धि और सजा रद्द किए जाने योग्य है।”
जांच एजेंसी की विफलता और आईपीसी (IPC) पर टिप्पणी
अपीलकर्ताओं को आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत बरी करते हुए, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सरकारी सीमेंट को डायवर्ट करने जैसे कृत्य अभी भी भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत दंडात्मक हो सकते हैं।
हालांकि, कोर्ट ने जांच एजेंसी की एक बड़ी चूक की ओर इशारा किया कि उन्होंने उचित आईपीसी प्रावधानों को लागू नहीं किया।
कोर्ट ने टिप्पणी की:
“यह ऐसा मामला था जहां जांच एजेंसी को आरोपों की प्रकृति और एकत्र किए गए सबूतों को ध्यान में रखते हुए भारतीय दंड संहिता (IPC) के उचित प्रावधानों को लागू करना चाहिए था… हालांकि, अभियोजन पक्ष ने ऐसा कोई अभ्यास नहीं किया, और न ही हाईकोर्ट एक अलग वैधानिक अपराध के तहत दोषसिद्धि के खिलाफ अपील में पहली बार भारतीय दंड संहिता के प्रावधानों को लागू करके दोषसिद्धि को प्रतिस्थापित कर सकता है।”
निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने आपराधिक अपील संख्या 1630 और 1631 (2015) को स्वीकार कर लिया। निचली अदालत और हाईकोर्ट द्वारा पारित दोषसिद्धि और सजा के फैसले को रद्द कर दिया गया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि अपीलकर्ताओं द्वारा भरे गए जमानत बांड रद्द किए जाएं और यदि कोई जुर्माना राशि जमा की गई है, तो उसे वापस किया जाए।
केस डिटेल्स:
- केस टाइटल: मनोज बनाम महाराष्ट्र राज्य और अन्य (संबद्ध अपील के साथ)
- केस नंबर: क्रिमिनल अपील नंबर 1630 ऑफ 2015
- कोरम: जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन

