सुप्रीम कोर्ट ने निष्कासित छात्र को 10वीं बोर्ड परीक्षा में बैठने की अनुमति दी; स्कूल पर लगाई फटकार

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को इंदौर के एक स्कूल से निष्कासित 13 वर्षीय छात्र को बड़ी राहत देते हुए काउंसिल फॉर द इंडियन स्कूल सर्टिफिकेट एग्जामिनेशन्स (CISCE) को निर्देश दिया कि वह छात्र को आगामी 10वीं बोर्ड परीक्षा में बैठने की अनुमति दे और उसका एडमिट कार्ड जारी करे। परीक्षा 17 फरवरी से शुरू हो रही है।

न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुयान की पीठ ने कहा कि चूंकि छात्र पहले ही परीक्षा के लिए पंजीकृत है, इसलिए यदि उसे परीक्षा से वंचित किया गया तो उसका एक शैक्षणिक वर्ष बर्बाद हो जाएगा।

“ऐसी स्थिति में, हम CISCE को निर्देश देते हैं कि वह याचिकाकर्ता के पुत्र को परीक्षा देने की अनुमति दे और एडमिट कार्ड जारी करे,” कोर्ट ने कहा।

कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि छात्र को अन्य विद्यार्थियों से अलग कमरे में परीक्षा देने की व्यवस्था की जाए। साथ ही, स्कूल को निर्देशित किया गया कि वह फिजिकल एजुकेशन और SUPW (Socially Useful Productive Work) की आंतरिक मूल्यांकन परीक्षा आयोजित कर उसका परिणाम CISCE को भेजे।

सुनवाई के दौरान पीठ ने मौखिक रूप से स्कूल की भूमिका पर नाराजगी जताई:

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“आपने उसे सुधारने के बजाय निष्कासित कर दिया और उससे खुद को अलग कर लिया। एक स्कूल के रूप में आपकी ज़िम्मेदारी थी कि आप बच्चे को सुधारते, न कि उसे केवल इसलिए निकाल देते कि वह ‘बुरा लड़का’ है।”

मामला उस याचिका से जुड़ा था जिसमें मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के नवंबर 2025 के आदेश को चुनौती दी गई थी। हाईकोर्ट ने छात्र को कक्षा 9 के सत्र के दौरान स्कूल से निकाले जाने के फैसले को बरकरार रखा था।

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याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता निपुण सक्सेना ने कहा कि छात्र को स्कूल से निष्कासित किया जाना एक “अत्यधिक और अनुपातहीन सजा” थी। उन्होंने तर्क दिया कि छात्र निजी तौर पर ट्यूटर्स की मदद से पढ़ाई कर रहा है और यदि उसे परीक्षा नहीं देने दी गई तो उसका एक वर्ष बर्बाद हो जाएगा।

सक्सेना ने यह भी बताया कि इंस्टाग्राम अकाउंट निजी था और उसमें डाले गए ‘मीम्स’ स्कूल प्रशासन या सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं थे।

इसके विपरीत, स्कूल की ओर से पेश वकील ने छात्र को परीक्षा में बैठने की अनुमति देने का कड़ा विरोध किया। उन्होंने कहा कि स्कूल ने गंभीर घटना के चलते छात्र को निकाला और अब यदि उसे अनुमति दी गई तो इससे स्कूल प्रशासन का मनोबल टूटेगा।

याचिकाकर्ता के अनुसार, 10वीं बोर्ड परीक्षा के लिए पंजीकरण आमतौर पर 9वीं कक्षा के दौरान ही किया जाता है, और स्कूल से निष्कासन ने छात्र की शिक्षा की निरंतरता को गंभीर रूप से बाधित किया है।

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“बच्चे द्वारा एक प्राइवेट इंस्टाग्राम अकाउंट बनाना, जिससे जुड़े मीम्स उसके द्वारा पोस्ट भी नहीं किए गए थे, उस पर निष्कासन जैसे कठोर कदम उठाना और ‘निवारणात्मक सिद्धांत’ (deterrence) को लागू करना विधिक सिद्धांतों के विपरीत है,” याचिका में कहा गया।

इससे पहले कोर्ट ने नोटिस जारी करते हुए यह भी कहा था कि नाबालिग आमतौर पर अपने परिवेश से ऐसा व्यवहार सीखते हैं और सांप्रदायिक उपयुक्तता वाले मीम्स को बढ़ावा नहीं दिया जाना चाहिए, लेकिन सुधारात्मक दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए।

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