आर्बिट्रल अवार्ड के बाद खरीदी गई संपत्ति को कुर्क किया जा सकता है; मनी डिक्री पर भी लागू होगा ‘लिस पेंडेंस’ का सिद्धांत: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि आर्बिट्रल अवार्ड (मध्यस्थता निर्णय) पारित होने के बाद खरीदी गई संपत्ति को अवार्ड के निष्पादन (Execution) में कुर्क किया जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि ‘लिस पेंडेंस’ (Lis Pendens) का सिद्धांत मनी डिक्री (धन की वसूली के आदेश) पर भी लागू होता है, ताकि देनदार अपनी संपत्ति बेचकर डिक्री को विफल न कर सकें।

जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी की पीठ ने मद्रास हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली अपील को खारिज करते हुए कहा कि सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के तहत तीसरे पक्ष को मिलने वाली सुरक्षा ‘पेंडेंट लाइट’ (वादकालीन) खरीदार को उपलब्ध नहीं है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद 22 जनवरी, 1998 के एक बिक्री समझौते से जुड़ा है, जो ‘द कॉटन कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड’ (CCI/प्रतिवादी संख्या 1) और ‘मेसर्स लक्ष्मी गणेश टेक्सटाइल्स लिमिटेड’ (प्रतिवादी संख्या 2) के बीच हुआ था। भुगतान को लेकर हुए विवाद के बाद मामला मध्यस्थता (Arbitration) में गया। 11 जून, 2001 को मध्यस्थ (Arbitrator) ने लक्ष्मी गणेश टेक्सटाइल्स को ब्याज सहित लगभग 26 लाख रुपये का भुगतान करने का आदेश दिया। कंपनी ने इस अवार्ड को चुनौती दी, लेकिन 21 जनवरी, 2013 को उनकी याचिका खारिज हो गई।

इस बीच, लक्ष्मी गणेश टेक्सटाइल्स ने आईसीआईसीआई बैंक से लिए गए ऋण में भी चूक की। बैंक ने सरफेसी एक्ट (SARFAESI Act) के तहत कार्रवाई शुरू की। इसके परिणामस्वरूप, एक त्रिपक्षीय समझौते के बाद, 23 अप्रैल, 2015 को कंपनी की संपत्ति अपीलकर्ता आर. सावित्री नायडू को बेच दी गई। गौर करने वाली बात यह है कि अपीलकर्ता कंपनी के प्रबंध निदेशक (MD) की मां हैं।

2019 में, CCI ने 2001 के आर्बिट्रल अवार्ड को लागू कराने के लिए निष्पादन याचिका (Execution Petition) दायर की। कोर्ट ने उस संपत्ति को कुर्क करने का आदेश दिया जिसे अपीलकर्ता ने खरीदा था। अपीलकर्ता ने इसके खिलाफ CPC के आदेश XXI नियम 58 के तहत आपत्ति दर्ज कराई, यह दावा करते हुए कि उन्होंने संपत्ति वैध प्रतिफल देकर खरीदी है और उन्हें विवाद की जानकारी नहीं थी। निचली अदालत और हाईकोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी थी।

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पक्षकारों की दलीलें

अपीलकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने तर्क दिया कि वह 2015 की सेल डीड के तहत संपत्ति की पूर्ण स्वामी हैं। उन्होंने कहा कि उन्हें ‘पेंडेंट लाइट’ खरीदार (वाद लंबित रहने के दौरान खरीदार) नहीं माना जा सकता क्योंकि खरीद के समय कोई कानूनी कार्यवाही लंबित नहीं थी (धारा 34 की चुनौती 2013 में समाप्त हो गई थी और निष्पादन याचिका 2019 में दायर हुई)। उनका यह भी तर्क था कि चूंकि आर्बिट्रल अवार्ड पैसे की वसूली के लिए था और सीधे संपत्ति से संबंधित नहीं था, इसलिए कुर्की अवैध है।

वहीं, CCI की ओर से अधिवक्ता सुनीता सिंह ने तर्क दिया कि अपीलकर्ता कंपनी के एमडी की मां हैं, इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि उन्हें देनदारी की जानकारी नहीं थी। उन्होंने कहा कि बिक्री आर्बिट्रल अवार्ड के बाद हुई है, इसलिए CPC के आदेश XXI नियम 102 के तहत अपीलकर्ता को कोई सुरक्षा नहीं मिल सकती।

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कोर्ट का विश्लेषण और निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने अपीलकर्ता के इस दावे को खारिज कर दिया कि उन्हें देनदारी की जानकारी नहीं थी। कोर्ट ने नोट किया कि आईसीआईसीआई बैंक के साथ हुए त्रिपक्षीय समझौते को पेश न करना यह दर्शाता है कि बिक्री कंपनी की मौजूदा देनदारियों की जानकारी के साथ हुई थी।

आदेश XXI नियम 102 का प्रभाव

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि चूंकि संपत्ति का हस्तांतरण कार्यवाही शुरू होने (1999) और अवार्ड पारित होने (2001) के बाद हुआ है, इसलिए अपीलकर्ता एक ‘पेंडेंट लाइट’ खरीदार हैं। नियम 102 ऐसे खरीदारों को निष्पादन का विरोध करने से रोकता है।

जस्टिस भट्टी ने फैसले में लिखा:

“चूंकि हस्तांतरण कार्यवाही शुरू होने और अवार्ड पारित होने के बाद हुआ है, अपीलकर्ता एक ‘पेंडेंट लाइट’ खरीदार है और आदेश XXI नियम 102 द्वारा निष्पादन का विरोध करने से वर्जित है।”

मनी डिक्री पर लिस पेंडेंस

सुप्रीम कोर्ट ने अपने हालिया फैसले दनेश सिंह बनाम हर प्यारी (2025) का हवाला देते हुए कहा कि ‘लिस पेंडेंस’ का सिद्धांत मनी डिक्री पर भी लागू होता है। यदि ऐसा नहीं होता, तो देनदार डिक्री के निष्पादन से बचने के लिए अपनी संपत्ति बेच देंगे और डिक्री का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा।

निष्पादन में देरी पर कोर्ट की चिंता

कोर्ट ने भारत में डिक्री लागू कराने में होने वाली देरी पर गंभीर टिप्पणी की और प्रिवी काउंसिल के पुराने कथन को दोहराया कि “मुकदमेबाज की असली मुश्किलें डिक्री प्राप्त करने के बाद शुरू होती हैं।”

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कोर्ट ने कहा:

“आमतौर पर कहा जाता है कि मुकदमा खत्म होने में 5 साल लगते हैं, लेकिन उसके निष्पादन में 10 साल लग जाते हैं… हमें मानसिकता में बदलाव की जरूरत है: कानूनी प्रणाली का लक्ष्य केवल मामलों का निपटारा करना नहीं होना चाहिए, बल्कि यह सुनिश्चित करना होना चाहिए कि वादी को वास्तविक राहत मिले।”

अंततः, कोर्ट ने अपील को खारिज करते हुए निष्पादन अदालत को दो महीने के भीतर कार्यवाही पूरी करने का निर्देश दिया।

केस विवरण

  • केस टाइटल: आर. सावित्री नायडू बनाम मेसर्स द कॉटन कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड और अन्य
  • केस नंबर: सिविल अपील संख्या 2026 (एसएलपी (सिविल) संख्या 19779/2024 से उत्पन्न)
  • कोरम: जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी

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