निजी व्यक्ति द्वारा किए गए अतिक्रमण को हटाने के लिए ‘परमादेश’ जारी नहीं किया जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया है कि किसी निजी व्यक्ति (Private Individual) द्वारा किए गए अतिक्रमण को हटाने के लिए संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत परमादेश (Mandamus) की रिट जारी नहीं की जा सकती। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में पीड़ित पक्ष को सामान्य कानून (Common Law) के तहत उपलब्ध विकल्पों का सहारा लेना चाहिए।

न्यायमूर्ति प्रकाश पाडिया की पीठ ने यह टिप्पणी करते हुए चंदा देवी द्वारा दायर याचिका को खारिज कर दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

याची चंदा देवी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में रिट-सी संख्या 1800 वर्ष 2026 दाखिल की थी। याचिका में राज्य के अधिकारियों (प्रतिवादी संख्या 2, 3 और 4) को निर्देश देने की मांग की गई थी कि वे जौनपुर जिले की सदर तहसील के परगना जाफराबाद स्थित ग्राम कल्याणपुर में स्थित विवादित भूमि का सीमांकन करें और वहां से अतिक्रमण हटाएं।

विवादित भूमि की पहचान आराजी संख्या 640 (क्षेत्रफल 0.025 हेक्टेयर) के रूप में की गई है। याची का आरोप था कि प्रतिवादी संख्या 5, जो कि एक निजी व्यक्ति है, ने इस भूमि पर अवैध कब्जा कर रखा है।

कोर्ट में दलीलें

सुनवाई के दौरान, राज्य सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे विद्वान स्थायी अधिवक्ता (Standing Counsel) और गांव सभा के वकील ने याचिका की पोषणीयता (Maintainability) पर सवाल उठाए।

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उन्होंने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता की शिकायत मुख्य रूप से एक निजी व्यक्ति (प्रतिवादी संख्या 5) के खिलाफ है। सरकारी वकीलों का कहना था कि यदि याचिकाकर्ता किसी निजी व्यक्ति के कृत्य से व्यथित है, तो उसके लिए उचित रास्ता यह है कि वह रिट याचिका के बजाय सामान्य कानून (Common Law) के तहत उपलब्ध कानूनी उपचार प्राप्त करे।

हाईकोर्ट का निर्णय और टिप्पणी

पत्रावली और रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद, न्यायमूर्ति प्रकाश पाडिया ने पाया कि याचिकाकर्ता वास्तव में निजी व्यक्तियों के खिलाफ राहत मांग रही है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि रिट अधिकार क्षेत्र (Writ Jurisdiction) के तहत ऐसी राहत प्रदान नहीं की जा सकती।

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कानूनी स्थिति को स्पष्ट करते हुए कोर्ट ने अपने आदेश में कहा:

“इस संबंध में कानून पूरी तरह से स्पष्ट है कि निजी व्यक्तियों के खिलाफ परमादेश (Mandamus) जारी नहीं किया जा सकता है और उचित उपाय सामान्य कानून (Common Law) के तहत निहित है।”

इस आधार पर, हाईकोर्ट ने वर्तमान याचिका को खारिज कर दिया। हालांकि, कोर्ट ने याचिकाकर्ता को यह स्वतंत्रता दी है कि यदि वह चाहे, तो वह अपनी शिकायत के निवारण के लिए सामान्य कानून के तहत उपलब्ध उचित मंच का दरवाजा खटखटा सकती है।

केस विवरण:

  • वाद शीर्षक: चंदा देवी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और 4 अन्य
  • केस संख्या: WRIT-C No. 1800 of 2026
  • कोरम: न्यायमूर्ति प्रकाश पाडिया
  • याची के वकील: बृजेश कुमार प्रजापति, महेश कुमार, माहेश्वरी प्रसाद श्रीवास्तव, सुरेंद्र कुमार सिंह
  • प्रतिवादी के वकील: सी.एस.सी. (मुख्य स्थायी अधिवक्ता)

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