इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 156(3) के तहत एफआईआर दर्ज करने या आवेदन को परिवाद (Complaint) के रूप में मानने के संबंध में मजिस्ट्रेट की शक्तियों को नियंत्रित करने वाले सिद्धांत, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 175(3) के तहत कार्यवाही पर भी लागू होते हैं।
न्यायमूर्ति राजीव लोचन शुक्ल की पीठ ने स्पष्ट किया कि यद्यपि BNSS की धारा 175(3) ने मजिस्ट्रेट की शक्तियों के दायरे को विस्तृत किया है, लेकिन यह तय करने के मूल सिद्धांत कि पुलिस विवेचना का आदेश दिया जाए या मामले को परिवाद के रूप में चलाया जाए, अभी भी वही हैं जो धारा 156(3) CrPC के तहत थे।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM), कानपुर देहात के 18 सितंबर, 2024 के आदेश को चुनौती देते हुए धारा 528 BNSS के तहत दायर एक आवेदन से संबंधित है। आवेदक, प्रदीप कुमार ने आरोप लगाया था कि 29 जुलाई, 2024 को पुरानी रंजिश के चलते विपक्षी पक्ष ने उनके भाई संदीप के साथ बर्बरता की।
आरोपों के अनुसार, संदीप का पैर कांटेदार तार से बांधकर मोटरसाइकिल से काफी दूर तक घसीटा गया, जिसके परिणामस्वरूप उसका पैर काटना पड़ा। आवेदक का कहना था कि पुलिस अधीक्षक को शिकायत देने के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं हुई। इसके बाद उन्होंने धारा 175(3) BNSS के तहत आवेदन किया। विद्वान मजिस्ट्रेट ने पुलिस को एफआईआर दर्ज कर विवेचना का आदेश देने के बजाय, आवेदन को धारा 223 BNSS के तहत परिवाद (Complaint) मानते हुए विपक्षियों को नोटिस जारी कर दिया।
पक्षकारों की दलीलें
आवेदक के वकील ने तर्क दिया कि मजिस्ट्रेट ने मनमाने ढंग से आवेदन को परिवाद के रूप में माना है। उन्होंने कहा कि मामले में पुलिस विवेचना आवश्यक थी क्योंकि घटना स्थल का निरीक्षण, हमले में प्रयुक्त हथियार और मोटरसाइकिल की बरामदगी, तथा अभियुक्तों की गिरफ्तारी के लिए पुलिस हिरासत में पूछताछ की आवश्यकता थी। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि मजिस्ट्रेट ने सुखवासी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2007) के फैसले का गलत सहारा लिया क्योंकि वह CrPC से संबंधित था।
दूसरी ओर, विपक्षी पक्ष और राज्य के सरकारी वकील ने मजिस्ट्रेट के आदेश का बचाव किया। उनका तर्क था कि धारा 175(3) BNSS और धारा 156(3) CrPC ‘पारी मटेरिया’ (समान विषय पर) हैं। उन्होंने लालाराम बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2021) के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि मजिस्ट्रेट ने अपने न्यायिक विवेक का सही प्रयोग किया है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
हाईकोर्ट ने धारा 175(3) BNSS और धारा 156(3) CrPC के प्रावधानों का तुलनात्मक विश्लेषण किया। न्यायालय ने पाया कि हालांकि BNSS में मजिस्ट्रेट को प्रारंभिक जांच करने और पुलिस अधिकारी की दलीलों पर विचार करने का अतिरिक्त अधिकार दिया गया है, लेकिन विवेचना और परिवाद के बीच चुनाव करने के मार्गदर्शक सिद्धांत नहीं बदले हैं।
पीठ ने अपने आदेश में कहा:
“मजिस्ट्रेट द्वारा शक्तियों के प्रयोग को नियंत्रित करने वाले सिद्धांत, जब यह तय करने की बात आती है कि विवेचना का आदेश दिया जाए या उस आवेदन को परिवाद माना जाए, अभी भी वही हैं जो धारा 156(3) CrPC के तहत थे।”
कोर्ट ने लालाराम मामले में तय किए गए सिद्धांतों की पुष्टि करते हुए कहा कि यदि शिकायतकर्ता के पास अभियुक्तों और गवाहों का पूरा विवरण है और ऐसी कोई साक्ष्य सामग्री एकत्र करने की आवश्यकता नहीं है जो केवल पुलिस ही कर सकती है (जैसे अपहृत व्यक्ति की बरामदगी), तो परिवाद प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए।
घटना की प्रकृति और समय बीतने पर टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने कहा:
“घटना की तारीख से डेढ़ साल से अधिक समय बीत जाने के बाद, खुले स्थान पर कोई भी भौतिक साक्ष्य उचित रूप से नहीं बचेगा, और इसलिए, इस स्तर पर खून से सनी मिट्टी की बरामदगी संभव नहीं होगी।”
निर्णय
हाईकोर्ट ने यह निष्कर्ष निकाला कि मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने आवेदन को परिवाद मानकर सही विवेक का प्रयोग किया है। न्यायालय ने कहा कि आवेदक को घटना के तथ्यों की पूरी जानकारी है और आवेदन में ऐसा कुछ भी उल्लेखित नहीं है जिसके लिए पुलिस विवेचना अनिवार्य हो।
न्यायालय ने कहा:
“विद्वान मजिस्ट्रेट ने धारा 175(3) BNSS के तहत आवेदन को उन्हीं सिद्धांतों को लागू करते हुए सही ढंग से परिवाद माना है, जो धारा 156(3) CrPC के तहत शक्तियों के प्रयोग पर लागू थे।”
तदनुसार, धारा 528 BNSS के तहत दायर आवेदन को खारिज कर दिया गया।
मामले का विवरण:
- वाद शीर्षक: प्रदीप कुमार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और 2 अन्य
- वाद संख्या: आवेदन यू/एस 528 बीएनएसएस संख्या 18266, वर्ष 2025
- कोरम: न्यायमूर्ति राजीव लोचन शुक्ल

