नशे में प्लेटफॉर्म किनारे खड़ा होना धारा 124A के तहत मुआवज़े से वंचित करेगा: बॉम्बे हाईकोर्ट, शराबी घायल की अपील खारिज

बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक व्यक्ति को रेलवे मुआवज़ा देने से इनकार कर दिया जो शराब के नशे में रेलवे स्टेशन पर घायल हो गया था। न्यायमूर्ति जितेन्द्र जैन की एकल पीठ ने कहा कि यह दुर्घटना व्यक्ति की नशे की स्थिति के कारण हुई और इस पर मुआवज़ा नहीं दिया जा सकता।

कोर्ट ने बुधवार को यह आदेश पारित किया, जिसकी प्रति गुरुवार को सार्वजनिक की गई। इस फैसले में कोर्ट ने अमेरिकी उपन्यासकार एफ. स्कॉट फिट्ज़गेराल्ड के प्रसिद्ध कथन का उल्लेख किया—
“पहले आप शराब पीते हैं, फिर शराब शराब पीती है, फिर शराब आपको पी जाती है।”

याचिकाकर्ता, जो बॉम्बे अस्पताल में लैब असिस्टेंट थे, ने दावा किया कि 10 मार्च 2001 की रात को वह मरीन लाइन्स रेलवे स्टेशन पर ट्रेन का इंतज़ार कर रहे थे जब उन्हें एक आती हुई ट्रेन ने टक्कर मार दी। उन्हें पहले जी.टी. अस्पताल ले जाया गया और बाद में बॉम्बे अस्पताल में भर्ती किया गया, जहां रिकॉर्ड में उल्लेख था कि उन्होंने भारी मात्रा में शराब का सेवन किया था।

रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल ने 2014 में मुआवज़ा देने से इनकार कर दिया था, यह कहते हुए कि यह “दुर्घटना” रेलवे अधिनियम की परिभाषा में नहीं आती क्योंकि याचिकाकर्ता शराब के नशे में था।

न्यायमूर्ति जितेन्द्र जैन ने ट्रिब्यूनल के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा:

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“शराब सब कुछ बर्बाद कर देती है — शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य, रिश्ते, पारिवारिक जीवन, सामाजिक संतुलन, करियर और जीवनशैली पर इसके दीर्घकालिक दुष्परिणाम होते हैं।”

कोर्ट ने कहा कि जब कोई व्यक्ति अत्यधिक नशे में हो और प्लेटफॉर्म की सीमा के पास खड़ा हो, तो यह व्यवहार रेलवे अधिनियम की धारा 124A के अंतर्गत आता है, जो ऐसी स्थिति में मुआवज़ा देने से रोकता है।

रेलवे अधिनियम, 1989 की धारा 124A के तहत, यदि दुर्घटना आत्मविनाश, आत्म-चोट, नशे की हालत या आपराधिक कृत्य के कारण होती है, तो मुआवज़ा नहीं दिया जा सकता।

कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि शराब के नशे में की गई लापरवाही न केवल व्यक्ति के लिए जोखिमपूर्ण है, बल्कि उसे कानूनी राहत से भी वंचित कर सकती है। न्यायालय ने ट्रिब्यूनल के निर्णय में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए कहा कि इस मामले में मुआवज़े का कोई आधार नहीं बनता।

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