धारा 204 CrPC के तहत केवल समन जारी होने पर अग्रिम जमानत पोषणीय नहीं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी निजी शिकायत के मामले में मजिस्ट्रेट द्वारा आरोपी को केवल समन जारी किया गया है, तो उसे अग्रिम जमानत लेने की आवश्यकता नहीं है। जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने कहा कि गिरफ्तारी का वारंट जारी हुए बिना सिर्फ समन के आधार पर गिरफ्तारी की आशंका जताना पूरी तरह से निराधार है।

मामले की पृष्ठभूमि

इस कानूनी विवाद की शुरुआत ड्रूल्स पेट फूड प्राइवेट लिमिटेड द्वारा मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) के समक्ष दायर की गई शिकायत (केस संख्या 11328/2023) से हुई। शिकायतकर्ता और दो गवाहों (सिद्धार्थ राज और विनीत कुमार राय) के बयानों की जांच के बाद, मजिस्ट्रेट ने 3 जुलाई 2024 को एक आदेश पारित किया। ट्रायल कोर्ट ने पाया कि आरोपी हिमांशु कुमार वर्मा के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 406 (आपराधिक विश्वासघात) और 420 (धोखाधड़ी) के तहत प्रथम दृष्टया मामला बनता है, और उसे पेश होने के लिए समन जारी कर दिया।

समन मिलने के बाद, आरोपी वर्मा ने सीधे पटना हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और अग्रिम जमानत की गुहार लगाई। हाईकोर्ट ने 3 नवंबर 2025 को उसकी यह याचिका खारिज कर दी। इसके बाद याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर की।

पक्षों की दलीलें

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष याचिकाकर्ता ने दलील दी कि उसे डर है कि यदि वह समन के अनुपालन में न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत के सामने पेश होता है, तो उसे तुरंत हिरासत में ले लिया जाएगा और जेल भेज दिया जाएगा। इसी आशंका के चलते उसने अग्रिम जमानत की मांग की थी।

अदालत का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने मामले के रिकॉर्ड और मजिस्ट्रेट के आदेश का बारीकी से विश्लेषण किया और याचिकाकर्ता की कानूनी समझ पर हैरानी जताई। पीठ ने टिप्पणी की, “हम यह समझने में विफल रहे हैं कि मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में शिकायतकर्ता द्वारा दर्ज की गई एक निजी शिकायत से उत्पन्न मामले में याचिकाकर्ता को हाईकोर्ट के समक्ष जाने और अग्रिम जमानत की प्रार्थना करने की क्या आवश्यकता थी।”

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अदालत ने स्पष्ट किया कि मजिस्ट्रेट ने केवल संज्ञान लिया था और दंड प्रक्रिया संहिता (Cr.P.C.) की धारा 204 के तहत प्रक्रिया (समन) जारी की थी। याचिकाकर्ता के डर को पूरी तरह खारिज करते हुए अदालत ने कहा, “हम इस व्यक्त की गई आशंका के आधार को समझने में विफल रहे हैं कि एक बार जब याचिकाकर्ता न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत के समक्ष पेश होगा, तो उसे हिरासत में लिया जाएगा और सलाखों के पीछे भेज दिया जाएगा।”

कानूनी स्थिति को और अधिक स्पष्ट करने के लिए, सुप्रीम कोर्ट ने Cr.P.C. की धारा 87 का हवाला दिया, जो समन के स्थान पर या उसके अतिरिक्त गिरफ्तारी वारंट जारी करने से संबंधित है। अदालत ने बताया कि धारा 87 के तहत मजिस्ट्रेट गिरफ्तारी वारंट तभी जारी कर सकता है जब उसके पास ऐसा करने के लिखित कारण हों, जैसे कि आरोपी के भागने की आशंका हो या वह जानबूझकर समन का पालन न कर रहा हो।

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पीठ ने गौर किया कि वर्तमान मामले में ट्रायल कोर्ट ने धारा 87 का बिल्कुल भी सहारा नहीं लिया था। अदालत ने अपनी बात रखते हुए कहा: “यदि अदालत ने संज्ञान लेते हुए और प्रक्रिया जारी करते हुए याचिकाकर्ता की गिरफ्तारी के लिए वारंट जारी किया होता, तो ऐसी परिस्थितियों में, शायद याचिकाकर्ता अग्रिम जमानत के लिए प्रार्थना करने में न्यायसंगत होता, क्योंकि वारंट के आधार पर पुलिस उसे गिरफ्तार कर लेती।”

फैसला

इन टिप्पणियों के साथ, सुप्रीम कोर्ट ने विशेष अनुमति याचिका (SLP) का निपटारा कर दिया और कहा कि इस स्तर पर अग्रिम जमानत की कोई आवश्यकता नहीं है। अदालत ने याचिकाकर्ता को आदेश दिया कि वह जारी किए गए समन के अनुपालन में संबंधित मजिस्ट्रेट की अदालत में पेश हो। इसके साथ ही, ट्रायल कोर्ट को यह निर्देश दिया गया कि वह Cr.P.C. के अध्याय XIV (पुलिस रिपोर्ट के अलावा अन्य आधार पर संस्थित मामले) के प्रावधानों के अनुसार मामले में आगे की कार्यवाही करे।

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केस विवरण:

  • केस का नाम: हिमांशु कुमार वर्मा बनाम बिहार राज्य और अन्य
  • केस नंबर: विशेष अनुमति याचिका (आपराधिक) संख्या 1893/2026
  • कोरम: जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन

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