सुप्रीम कोर्ट ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के एक अभ्यर्थी को निजी मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस पाठ्यक्रम में प्रवेश दिलाने का निर्देश दिया है। न्यायालय ने पाया कि राज्य सरकार द्वारा EWS आरक्षण लागू करने की प्रक्रिया पूरी न किए जाने के कारण याचिकाकर्ता लगातार दो वर्षों से प्रवेश से वंचित रह गया। न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपने विशेषाधिकारों का उपयोग करते हुए यह राहत प्रदान की।
मामले की पृष्ठभूमि
यह आदेश अथर्व चतुर्वेदी बनाम मध्य प्रदेश राज्य एवं अन्य मामले में पारित किया गया । यह याचिका मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय, जबलपुर द्वारा 16 अक्टूबर 2025 को पारित आदेश के विरुद्ध दायर की गई थी।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया की पीठ ने 10 फरवरी 2026 को इस मामले की सुनवाई की । याचिकाकर्ता ने स्वयं ऑनलाइन उपस्थित होकर पक्ष रखा।
न्यायालय ने कहा कि याचिकाकर्ता ने एक EWS अभ्यर्थी के रूप में अपने साथ हुई कठिन परिस्थिति और स्पष्ट असमानता को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया ।
याचिकाकर्ता आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग से संबंधित है और उसने दो बार NEET परीक्षा उत्तीर्ण की — पहले 2024-25 सत्र के लिए और फिर 2025-26 सत्र के लिए । इसके बावजूद उसे एमबीबीएस पाठ्यक्रम में प्रवेश नहीं मिल सका। न्यायालय ने इसे उसके नियंत्रण से बाहर की “स्पष्ट रूप से अनुचित और हानिकारक परिस्थितियां” बताया ।
साल 2024 में पहली बार प्रवेश न मिलने का कारण यह था कि 2 जुलाई 2024 की राज्य सरकार की अधिसूचना में निजी मेडिकल कॉलेजों में EWS वर्ग के लिए कोई आरक्षण प्रावधान नहीं किया गया था ।
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने 17 दिसंबर 2024 के अपने निर्णय में याचिकाकर्ता को राहत देने से इनकार किया, लेकिन राज्य सरकार को एक वर्ष का समय दिया ताकि निजी मेडिकल कॉलेजों में EWS आरक्षण के लिए सीटों का विस्तार और निर्धारण किया जा सके ।
हालांकि, 2025-26 सत्र में भी स्थिति जस की तस रही। सीटों के विस्तार और आरक्षण निर्धारण की प्रक्रिया पूरी नहीं होने के कारण याचिकाकर्ता पुनः प्रवेश से वंचित रह गया ।
न्यायालय की टिप्पणियां
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि रिकॉर्ड से यह साफ झलकता है कि राज्य अधिकारियों ने अब तक यह प्रक्रिया पूरी नहीं की है ।
राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) की ओर से प्रस्तुत वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि नीति अंतिम रूप देने की प्रक्रिया में है और उचित समय पर लागू की जाएगी। उन्होंने यह भी कहा कि लागू होने के बाद निजी कॉलेजों में इसके क्रियान्वयन में अतिरिक्त समय लग सकता है ।
लेकिन पीठ ने माना कि यदि इस विलंब को जारी रहने दिया गया तो याचिकाकर्ता के अधिकारों पर गंभीर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा ।
न्यायालय ने यह भी ध्यान में रखा कि याचिकाकर्ता ने लगातार दो वर्षों तक गंभीर प्रयास किए, जबकि प्रतिवादियों की ओर से नीति लागू करने में तत्परता नहीं दिखाई गई ।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश
इन परिस्थितियों को देखते हुए न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपने अधिकारों का प्रयोग किया और निर्देश दिया:
“(A) राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग और मध्य प्रदेश राज्य, चिकित्सा शिक्षा विभाग के माध्यम से यह सुनिश्चित करें कि याचिकाकर्ता को निजी मेडिकल कॉलेजों में से किसी एक में एमबीबीएस पाठ्यक्रम में प्रवेश दिया जाए; और
(B) यह प्रवेश वर्ष 2025-26 सत्र में उसकी EWS रैंक 164 के अनुसार होगा तथा EWS वर्ग के अभ्यर्थियों के लिए निर्धारित शुल्क आदि जमा करने की शर्त पर निर्भर रहेगा।”
न्यायालय ने एक सप्ताह के भीतर आवश्यक कार्रवाई पूरी करने का निर्देश दिया ।
इसके साथ ही विशेष अनुमति याचिका तथा लंबित सभी आवेदन निस्तारित कर दिए गए ।

