पुडुचेरी में जन्मी और शिक्षित महिला को पिता के मूल निवास के आधार पर MBC प्रमाण पत्र से वंचित नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि कोई उम्मीदवार पुडुचेरी में जन्मा है, वहीं से शिक्षित हुआ है और लगातार वहीं निवास कर रहा है, तो उसे ‘अति पिछड़ा वर्ग’ (MBC) प्रमाण पत्र देने से केवल इसलिए इनकार नहीं किया जा सकता कि उसके पिता तमिलनाडु के निवासी थे या जन्म प्रमाण पत्र में पिता का पता तमिलनाडु का दर्ज था।

जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने मद्रास हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें अपीलकर्ता के एमबीसी (MBC) प्रमाण पत्र के दावे को खारिज करने वाले अधिकारियों के निर्णय को सही ठहराया गया था। शीर्ष अदालत ने टिप्पणी की कि “बेहतर अवसरों की तलाश” (Greener pastures) में माता-पिता के प्रवास के कारण आवेदक के वैध अधिकारों को छीना नहीं जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष मुख्य कानूनी प्रश्न यह था कि क्या अपीलकर्ता, ई. अनीता, को सार्वजनिक रोजगार में आरक्षण के लाभ और एमबीसी प्रमाण पत्र से इस आधार पर वंचित किया जा सकता है कि उनका “मूल” (Origin) पुडुचेरी नहीं है, जबकि उनका जन्म और निरंतर निवास केंद्र शासित प्रदेश में ही रहा है।

मद्रास हाईकोर्ट ने अपने 21 मार्च, 2025 के फैसले में राजस्व अधिकारियों के उस निर्णय को बरकरार रखा था जिसमें उनका आवेदन खारिज कर दिया गया था। हाईकोर्ट का कहना था कि असाधारण क्षेत्राधिकार का प्रयोग करते हुए निवास से संबंधित विवादित तथ्यों की जांच नहीं की जा सकती।

सुप्रीम कोर्ट ने इस निर्णय को पलटते हुए कहा कि जहां जन्म और शिक्षा से संबंधित तथ्य निर्विवाद हैं, वहां हाईकोर्ट उम्मीदवार के वैध अधिकारों के प्रति “अपनी आंखें नहीं मूंद सकता”।

READ ALSO  क्या कोर्ट विवादित हस्ताक्षरों की मात्र देखने मात्र से स्वीकृत हस्ताक्षरों से तुलना कर सकती है? जानिए हाईकोर्ट ने क्या कहा

मामले की पृष्ठभूमि

अपीलकर्ता ई. अनीता का जन्म 30 अक्टूबर, 1994 को पुडुचेरी में हुआ था। उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा (कक्षा I से XII) और उसके बाद स्नातक व स्नातकोत्तर की पढ़ाई (2002-2018) पुडुचेरी से ही पूरी की। इसके अलावा, उन्होंने पुडुचेरी स्थित श्री नारायण इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज में काम भी किया।

वर्ष 2024 में, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण सेवा निदेशालय, पुडुचेरी ने स्टाफ नर्स के पद के लिए विज्ञापन जारी किया। अपीलकर्ता ने इस पद के लिए आवेदन किया और असाधारण राजपत्र अधिसूचना संख्या 132/GOM/15/SWS/2019-20 दिनांक 08.08.2019 के तहत आरक्षण का दावा करने के लिए जाति प्रमाण पत्र मांगा।

हालांकि डिप्टी तहसीलदार ने 4 मार्च, 2024 को एक नेटिविटी प्रमाण पत्र जारी कर केंद्र शासित प्रदेश में उनके निवास की पुष्टि की, लेकिन तहसीलदार एवं कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने एमबीसी प्रमाण पत्र के लिए उनका आवेदन खारिज कर दिया। अस्वीकृति का आधार यह था कि उनके पिता तमिलनाडु के विल्लुपुरम जिले के निवासी थे और उनके जन्म प्रमाण पत्र व स्कूल रिकॉर्ड में तमिलनाडु का पता दर्ज था। अधिकारियों ने निष्कर्ष निकाला कि “एमबीसी (ओरिजिन)” का दर्जा पाने के उद्देश्य से वह पुडुचेरी की निवासी नहीं मानी जा सकतीं।

पक्षकारों की दलीलें

अपीलकर्ता का पक्ष: अपीलकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि प्रमाण पत्र देने से इनकार करना मनमाना और अवैध है, क्योंकि अपीलकर्ता “1997 से लगातार, स्थायी रूप से और बिना किसी बाधा के केंद्र शासित प्रदेश में रह रही हैं।”

  • यह भी बताया गया कि राजस्व अधिकारियों ने पहले 2010 और 2022 में उनकी आवासीय स्थिति का सावधानीपूर्वक सत्यापन करने के बाद उन्हें सामुदायिक प्रमाण पत्र जारी किए थे।
  • वकील ने जोर देकर कहा कि अपीलकर्ता ‘हिंदू वन्नियार’ समुदाय से आती हैं, जिसे पुडुचेरी में पिछड़ा वर्ग माना जाता है।
  • यह दलील भी दी गई कि अस्वीकृति के आदेश ने इस तथ्य को नजरअंदाज कर दिया कि उन्होंने 2019 में पुडुचेरी के एक स्थायी निवासी से विवाह किया था और वहां अपना निवास स्थापित किया है।
READ ALSO  शिनाख्त परेड (TIP) जल्द से जल्द किया जाना चाहिए ना कि काफ़ी समय बाद: हाईकोर्ट

प्रतिवादी का पक्ष: पुडुचेरी केंद्र शासित प्रदेश के वकील ने हाईकोर्ट के आदेश का समर्थन किया। उन्होंने तर्क दिया कि “पड़ोसी राज्य यानी तमिलनाडु के निवासियों द्वारा सीमा का अनुचित लाभ उठाने और झूठे दावे करने की प्रवृत्ति” को देखते हुए सख्त जांच आवश्यक थी।

  • प्रतिवादियों ने कहा कि तथ्यात्मक जांच पर अपीलकर्ता का दावा “खोखला” पाया गया।
  • उनका तर्क था कि पिता का मूल निवास तमिलनाडु होने के कारण संबंधित अधिसूचना के तहत प्रमाण पत्र देने से इनकार करना उचित था, जो प्रवासियों के लिए ओबीसी स्थिति निर्धारित करने के लिए 9 फरवरी, 2001 की कट-ऑफ तारीख तय करती है।

सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने निर्विवाद तथ्यों पर गौर किया: 1994 में पुडुचेरी में अपीलकर्ता का जन्म और 2002 से 2018 तक केंद्र शासित प्रदेश में उनकी शिक्षा। कोर्ट ने नोट किया कि जिन स्कूलों और कॉलेजों में उन्होंने पढ़ाई की, वे ज्यादातर सरकारी संस्थान थे। कोर्ट ने कहा, “हमें उक्त प्रमाण पत्रों की सामग्री पर अविश्वास करने का कोई उचित कारण नहीं दिखता।”

अस्वीकृति के मुख्य आधार—पिता के निवास—पर टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने कहा:

“महज इसलिए कि पिता ने जन्म प्रमाण पत्र में अपना पता तमिलनाडु का दिया था, जबकि उनका (अपीलकर्ता का) जन्म पुडुचेरी में हुआ था, पुडुचेरी का अधिवासी (domicile) होने की उनकी स्थिति नहीं बदलेगी।”

कोर्ट ने आगे तर्क दिया कि माता-पिता के प्रवास का नुकसान बच्चे को नहीं होना चाहिए:

“भले ही यह मान लिया जाए कि अपीलकर्ता के पिता किसी समय तमिलनाडु के निवासी थे, यदि वे बेहतर अवसरों (Greener pastures) की तलाश में पुडुचेरी चले आए, तो अपीलकर्ता के वैध अधिकारों को कम नहीं किया जा सकता, दूसरे शब्दों में, एमबीसी प्रमाण पत्र जारी करने के उनके दावे को नकारा नहीं जा सकता।”

विवादित तथ्यों के आधार पर हस्तक्षेप करने से हाईकोर्ट के इनकार के संबंध में, सुप्रीम कोर्ट ने कहा:

“इसमें कोई संदेह नहीं है कि रिट क्षेत्राधिकार में, हाईकोर्ट विवादित तथ्यों की जांच नहीं करेगा। हालांकि, जब तथ्य विवादित नहीं हों, तो हाईकोर्ट उसी के प्रति अपनी आंखें नहीं मूंद सकता या अज्ञानता का ढोंग नहीं कर सकता और आवेदक के वैध अधिकार से इनकार नहीं कर सकता।”

निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए मद्रास हाईकोर्ट के 21 मार्च, 2025 के फैसले को रद्द कर दिया।

  1. कोर्ट ने 4 मार्च, 2024 के नेटिविटी प्रमाण पत्र को बहाल कर दिया।
  2. तहसीलदार-सह-कार्यकारी मजिस्ट्रेट, तालुक कार्यालय, विल्लियनूर, पुडुचेरी को निर्देश दिया गया कि वे दो महीने के भीतर अपीलकर्ता को अति पिछड़ा वर्ग प्रमाण पत्र (ओरिजिन) जारी करें।
  3. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह आदेश वर्तमान मामले के विशिष्ट तथ्यों के आधार पर पारित किया गया है।
READ ALSO  समलैंगिक विवाह: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से समलैंगिक व्यक्तियों के लिए लाभों पर विचार करने के लिए सीएस की अध्यक्षता में उच्चाधिकार प्राप्त समिति गठित करने को कहा

केस डीटेल्स:

  • केस का नाम: ई. अनीता बनाम पुडुचेरी केंद्र शासित प्रदेश व अन्य
  • केस नंबर: सिविल अपील संख्या _______ / 2026 (@ विशेष अनुमति याचिका (सिविल) संख्या 38256/2025)
  • पीठ: जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles