पीएम मोदी की डिग्री मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने DU को जवाब के लिए 3 हफ्ते का समय दिया

दिल्ली हाईकोर्ट ने मंगलवार को दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की स्नातक डिग्री से संबंधित जानकारी के खुलासे को लेकर दायर अपीलों में देरी पर आपत्ति दर्ज कराने के लिए तीन हफ्ते का समय दिया।

मुख्य न्यायाधीश डी. के. उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कार्या की खंडपीठ ने यह आदेश उस अपील की सुनवाई के दौरान दिया, जिसमें आरटीआई कार्यकर्ता नीरज, आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह और अधिवक्ता मोहम्मद इरशाद ने एकल न्यायाधीश के उस आदेश को चुनौती दी है, जिसमें केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) के प्रधानमंत्री की डिग्री से जुड़ी जानकारी देने के आदेश को रद्द कर दिया गया था।

दिल्ली विश्वविद्यालय की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत से अपीलों में देरी और उनके गुण-दोषों पर जवाब दाखिल करने के लिए समय मांगा। उन्होंने दलील दी,

“इस मामले में कुछ भी नहीं है, यह सिर्फ सनसनी फैलाने के लिए किया जा रहा है।”

इस पर अदालत ने कहा,

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“जैसा अनुरोध किया गया, देरी पर आपत्ति दाखिल करने के लिए तीन हफ्ते का समय दिया जाता है।”

अब अगली सुनवाई 27 अप्रैल को होगी।

अपीलकर्ताओं के वकील ने बताया कि विश्वविद्यालय को आपत्ति दाखिल करने की अनुमति दिए ढाई महीने हो चुके हैं, फिर भी अब तक कोई जवाब दाखिल नहीं किया गया है। उन्होंने कहा कि देरी बहुत मामूली है—15 से 45 दिनों की—जिसे न्यायालय सरलता से माफ कर सकता है।

जब अपीलकर्ताओं ने मुख्य अपीलों पर DU से जवाब पाने के लिए औपचारिक नोटिस जारी करने की मांग की, तब SG मेहता ने इसका विरोध करते हुए कहा,

“नोटिस सिर्फ चीजों को सनसनीखेज बनाने के लिए ही जारी की जाती है।”

यह अपीलें 25 अगस्त 2025 को आए एकल न्यायाधीश के फैसले के खिलाफ दायर की गई हैं, जिसमें 1978 की बीए परीक्षा पास करने वाले छात्रों की जानकारी दिखाने का CIC का आदेश रद्द कर दिया गया था। 1978 में ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी यह परीक्षा पास की थी।

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आरटीआई कार्यकर्ता नीरज की अर्जी पर CIC ने 21 दिसंबर 2016 को आदेश दिया था कि 1978 में बीए परीक्षा पास करने वाले छात्रों के रिकॉर्ड की जांच की अनुमति दी जाए। इस आदेश को दिल्ली विश्वविद्यालय ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

विश्वविद्यालय ने कहा था कि वह रिकॉर्ड अदालत को दिखाने को तैयार है, लेकिन सार्वजनिक रूप से साझा नहीं करना चाहता।

एकल न्यायाधीश ने DU की याचिका को स्वीकार करते हुए कहा था कि सिर्फ इसलिए कि व्यक्ति सार्वजनिक पद पर है, उसकी निजी जानकारी स्वतः सार्वजनिक हित में नहीं आ जाती।

न्यायालय ने यह भी कहा था कि आरटीआई एक्ट का उद्देश्य सरकारी कार्यों में पारदर्शिता लाना है, न कि सनसनी फैलाना।

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इस आदेश में पूर्व केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी के कक्षा 10वीं और 12वीं के रिकॉर्ड को साझा करने के CIC के आदेश को भी रद्द कर दिया गया था।

अब हाईकोर्ट 27 अप्रैल को यह तय करेगा कि अपीलों में देरी को माफ किया जा सकता है या नहीं, और यदि हां, तो क्या मुख्य अपीलों पर सुनवाई जारी रखी जाएगी।

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