बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद बेंच ने यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (POCSO) अधिनियम के तहत एक आरोपी को बरी किए जाने के खिलाफ दायर महाराष्ट्र राज्य की अपील की अनुमति (Leave to Appeal) याचिका को खारिज कर दिया है। न्यायमूर्ति अभय एस. वाघवासे ने निचली अदालत के फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष के गवाहों के बयानों में महत्वपूर्ण सुधार (material improvements) थे और पैसे के विवाद के कारण झूठे आरोप लगाने का बचाव पक्ष का तर्क संभावित प्रतीत होता है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला औरंगाबाद जिले के शिवूर पुलिस स्टेशन में दर्ज एक रिपोर्ट से शुरू हुआ था। शिकायतकर्ता (PW2) ने आरोप लगाया था कि उसकी 7 वर्षीय बेटी, जो पहली कक्षा में पढ़ती थी, का ट्यूशन टीचर के पति बालन राघवन (प्रतिवादी) द्वारा यौन उत्पीड़न किया गया था।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, 3 मार्च 2013 को पीड़िता ने अपनी मां को बताया कि आरोपी ट्यूशन सेंटर में अनुचित हरकतें करता था और अपना प्राइवेट पार्ट दिखाता था। शिकायत में आगे आरोप लगाया गया कि जब ट्यूशन टीचर का ध्यान नहीं होता था, तो आरोपी पीड़िता को उसे छूने के लिए मजबूर करता था और स्कूल वैन से उतरते समय भी उसे गलत तरीके से छूता था।
इन आरोपों के आधार पर अपराध दर्ज किया गया और आरोपी पर भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 354-A और पॉक्सो एक्ट की धारा 8 और 12 के तहत विशेष मामला संख्या 15/2016 में मुकदमा चलाया गया। 3 जुलाई 2018 को वैजापुर के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने सबूतों के अभाव में आरोपी को बरी कर दिया था। राज्य सरकार ने इस बरी किए जाने के आदेश को चुनौती देने के लिए दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 378(1)(b) के तहत हाईकोर्ट में आवेदन दायर किया था।
पक्षकारों की दलीलें
राज्य की ओर से पेश हुए विद्वान एपीपी श्री एस.जी. सांगले ने तर्क दिया कि निचली अदालत ने पीड़िता (PW5) और उसकी मां (PW2) के सबूतों का सही मूल्यांकन नहीं किया। उन्होंने कहा कि गवाही में “मामूली चूक को अनुचित महत्व दिया गया है” और अपराध की गंभीरता को देखते हुए झूठे आरोप का सिद्धांत कमजोर है।
इसके विपरीत, प्रतिवादी के वकील श्री अमोल एस. गांधी ने बरी किए जाने के फैसले का समर्थन किया। उन्होंने एक महत्वपूर्ण प्रक्रियात्मक त्रुटि की ओर इशारा करते हुए बताया कि पुलिस द्वारा सीआरपीसी की धारा 161 या 164 के तहत पीड़िता का बयान कभी दर्ज नहीं किया गया था, बल्कि सीधे अदालत में उसकी गवाही ली गई। बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि मां और पीड़िता की गवाही में कई विरोधाभास और बाद में जोड़ी गई बातें थीं। इसके अलावा, बचाव पक्ष का मुख्य तर्क यह था कि पीड़िता ने स्कूल बस का सामने का कांच तोड़ दिया था, जिसके हर्जाने को लेकर उसके माता-पिता और टीचर के बीच झगड़ा हुआ था, और इसी रंजिश में यह झूठा मामला दर्ज कराया गया।
कोर्ट का विश्लेषण और निष्कर्ष
न्यायमूर्ति वाघवासे ने अभियोजन पक्ष के पांच गवाहों और बचाव पक्ष के दो गवाहों के सबूतों की जांच की। कोर्ट ने पाया कि शिकायतकर्ता (मां) की गवाही में महत्वपूर्ण विसंगतियां थीं। आरोपी द्वारा प्राइवेट पार्ट दिखाए जाने के विशिष्ट आरोप पर, कोर्ट ने नोट किया कि मां ने जिरह (cross-examination) में स्वीकार किया कि वह यह स्पष्ट नहीं कर सकती कि मूल पुलिस शिकायत में यह बात क्यों नहीं लिखी गई थी। कोर्ट ने इसे एक “महत्वपूर्ण चूक” (material omission) माना।
पीड़िता की गवाही के संबंध में, कोर्ट ने बचाव पक्ष की इस आपत्ति पर गौर किया कि जांच के दौरान उसका बयान दर्ज नहीं किया गया था। कोर्ट ने कहा कि हालांकि यह विफलता अपने आप में अभियोजन के लिए घातक नहीं है, लेकिन पीड़िता के बयानों की जांच जरूरी है। कोर्ट ने पाया कि पीड़िता की गवाही की पुष्टि करने वाला कोई अन्य सबूत नहीं था। न्यायमूर्ति ने कहा:
“हालांकि, यहां, उसकी ऐसी गवाही की कोई पुष्टि (corroboration) नहीं है, भले ही उसने स्वीकार किया है कि कक्षा में अन्य 10-15 छात्र थे। उसने यह भी नहीं बताया कि ऐसी घटनाएं कब हुईं और उसने कहा कि यह दिवाली 2012 से मार्च 2013 के बीच हुआ था।”
इसके अलावा, कोर्ट ने बचाव पक्ष के इस तर्क को विश्वसनीय माना कि शिकायत स्कूल वैन के टूटे कांच के पैसे के विवाद से प्रेरित थी। बचाव पक्ष ने ट्यूशन टीचर (DW1) और स्कूल वैन के ड्राइवर दिगंबर जाधव (DW2) की गवाही दर्ज कराई थी। ड्राइवर ने गवाही दी कि “पीड़िता ने स्कूल बस का सामने का कांच तोड़ दिया था… और इस वजह से विवाद हुआ था।”
न्यायमूर्ति वाघवासे ने कहा:
“गवाह DW2 दिगंबर जाधव की जांच से इस तरह के बचाव (false implication) की संभावना प्रबल हो गई है।”
निर्णय
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि घटना की देरी से रिपोर्टिंग, शिकायतकर्ता की गवाही में बाद में किए गए सुधार और पीड़िता के सबूतों की स्वतंत्र पुष्टि न होने के कारण अभियोजन पक्ष संदेह से परे आरोप साबित करने में विफल रहा। कोर्ट ने कहा कि निचली अदालत ने आरोपी को संदेह का लाभ देकर सही किया है। कोर्ट ने कहा कि जब सबूतों के आधार पर दो विचार संभव हों, तो आरोपी के पक्ष में जाने वाला विचार अपनाया जाना चाहिए।
परिणामस्वरूप, राज्य द्वारा अपील दायर करने की अनुमति मांगने वाला आवेदन खारिज कर दिया गया।
केस विवरण:
- केस टाइटल: महाराष्ट्र राज्य बनाम बालन राघवन
- केस नंबर: एप्लीकेशन फॉर लीव टू अपील बाय स्टेट नंबर 220 ऑफ 2018
- कोरम: न्यायमूर्ति अभय एस. वाघवासे
- आवेदक (राज्य) के वकील: श्री एस.जी. सांगले, एपीपी
- प्रतिवादी के वकील: श्री अमोल एस. गांधी

