कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि यदि किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही (Criminal Proceedings) लंबित है, तो वह पासपोर्ट अधिनियम, 1967 के तहत ‘सामान्य वैधता वाले पासपोर्ट’ (Normal Validity Passport) के जारी होने या नवीनीकरण (Renewal) के लिए पात्र नहीं है। हालांकि, कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसा आवेदक अदालत की अनुमति से ‘शॉर्ट वैलिडिटी पासपोर्ट’ के लिए पासपोर्ट प्राधिकरण से संपर्क कर सकता है।
इसके साथ ही, हाईकोर्ट ने पुलिस द्वारा जब्त किए गए मोबाइल फोन को वापस करने का निर्देश देते हुए दोहराया कि इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को अनिश्चित काल तक पुलिस हिरासत में रखने का कोई औचित्य नहीं है।
न्यायमूर्ति एम. नागप्रसन्ना की पीठ ने याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए निचली अदालत द्वारा मोबाइल फोन न लौटाने के आदेश को रद्द कर दिया, जबकि पासपोर्ट के संबंध में याचिकाकर्ता को वैधानिक प्रक्रिया का पालन करने का निर्देश दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता, श्रीमती सुरमी शिजी, क्राइम नंबर 33/2024 में आरोपी हैं, जिसे सिटी सेंट्रल क्राइम ब्रांच (वेस्ट), बेंगलुरु द्वारा दर्ज किया गया था। उन पर भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 120बी (आपराधिक साजिश), 420 (धोखाधड़ी) और 468 (धोखाधड़ी के उद्देश्य से जालसाजी) के तहत आरोप लगाए गए हैं। पुलिस ने इस मामले में सी.सी. संख्या 23988/2025 में आरोप पत्र (Charge Sheet) भी दाखिल कर दिया है।
जांच के दौरान, पुलिस ने याचिकाकर्ता का पासपोर्ट और एक सैमसंग गैलेक्सी S23 अल्ट्रा मोबाइल फोन जब्त कर लिया था। विदेश यात्रा करने के उद्देश्य से इन वस्तुओं को वापस पाने के लिए, याचिकाकर्ता ने दंड प्रक्रिया संहिता (Cr.P.C.) की धारा 451 और 457 के तहत प्रथम अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन दायर किया।
मजिस्ट्रेट ने 10 अक्टूबर, 2025 को आवेदन खारिज कर दिया। इसके बाद, एलआईआई अतिरिक्त सिटी सिविल और सत्र न्यायाधीश, बेंगलुरु के समक्ष दायर पुनरीक्षण याचिका (Revision Petition) को भी 16 दिसंबर, 2025 को खारिज कर दिया गया। निचली अदालतों ने मुख्य रूप से अपराध में याचिकाकर्ता की संलिप्तता के आधार पर राहत देने से इनकार किया था। इन आदेशों को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता की ओर से पेश विद्वान अधिवक्ता श्री आर. शशिधर ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता को विदेश यात्रा करने की आवश्यकता है, इसलिए उनके पासपोर्ट और मोबाइल फोन को रिलीज किया जाना चाहिए। उन्होंने प्रतिवादी (राज्य) को जब्त की गई वस्तुओं को वापस करने का निर्देश देने की मांग की।
दूसरी ओर, क्षेत्रीय पासपोर्ट कार्यालय (प्रतिवादी संख्या 3) की ओर से पेश भारत के विद्वान उप सॉलिसिटर जनरल (DSGI) श्री एच. शांति भूषण ने तर्क दिया कि पासपोर्ट अधिनियम, 1967 की धारा 6(2)(एफ) लंबित आपराधिक कार्यवाही की स्थिति में सामान्य वैधता वाले पासपोर्ट जारी करने में बाधा के रूप में कार्य करती है। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता को संबंधित अधिसूचनाओं के अनुसार ‘शॉर्ट वैलिडिटी पासपोर्ट’ के लिए पासपोर्ट अधिकारियों से संपर्क करना चाहिए।
कोर्ट का विश्लेषण और अवलोकन
पासपोर्ट की रिहाई पर
हाईकोर्ट ने अपने पिछले आदेश (रिट याचिका संख्या 28203/2023) का व्यापक संदर्भ दिया, जिसमें आपराधिक मुकदमों का सामना कर रहे व्यक्तियों को पासपोर्ट जारी करने के कानूनी ढांचे का विश्लेषण किया गया था।
कोर्ट ने पासपोर्ट अधिनियम की धारा 6(2)(एफ) का परीक्षण किया, जो यह अनिवार्य करती है कि यदि किसी कथित अपराध के संबंध में भारत की किसी आपराधिक अदालत में कार्यवाही लंबित है, तो पासपोर्ट प्राधिकरण पासपोर्ट जारी करने से इनकार कर देगा। कोर्ट ने केंद्र सरकार द्वारा जारी जी.एस.आर. 570 (ई) अधिसूचना दिनांक 25 अगस्त, 1993 का भी हवाला दिया। यह अधिसूचना ऐसे नागरिकों को ‘शॉर्ट वैलिडिटी पासपोर्ट’ जारी करने की अनुमति देती है, बशर्ते वे संबंधित अदालत से विदेश जाने की अनुमति का आदेश प्रस्तुत करें।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 6(2)(एफ) की कठोरता को लागू करते समय पासपोर्ट के “जारी करने” (Issuance), “पुनः जारी करने” (Re-issuance) या “नवीनीकरण” (Renewal) के बीच कोई अंतर नहीं है।
पीठ ने अपने आदेश में टिप्पणी की:
“इससे यह स्पष्ट निष्कर्ष निकलता है कि अधिनियम की धारा 6(2) के तहत पासपोर्ट के नवीनीकरण, पुनः जारी करने या पहली बार जारी करने में कोई अंतर नहीं है। प्रत्येक जारी करने, पुनः जारी करने या नवीनीकरण की प्रक्रिया को धारा 6 की आवश्यकताओं और कठोरता से गुजरना होगा।”
कोर्ट ने आगे कहा:
“जब तक धारा 6(2)(एफ) किसी आवेदन के आड़े आती है, चाहे वह नए पासपोर्ट के लिए हो, नवीनीकरण के लिए या पुनः जारी करने के लिए, ऐसे आवेदन को धारा 6(2)(एफ) की कठोरता को कम करके स्वीकृत करने का निर्देश नहीं दिया जा सकता। आवेदक संदेह के घेरे (Cloud) में है, और ‘यदि इस तरह का आवेदक बादलों के ऊपर चलना चाहता है, तो उस पर छाए बादलों को छंटना होगा’।”
परिणामस्वरूप, कोर्ट ने माना कि Cr.P.C. की धारा 451 और 457 के तहत पासपोर्ट की साधारण रिहाई की मांग करने वाला आवेदन वैधानिक रोक को देखते हुए सही कानूनी उपाय नहीं था।
मोबाइल फोन की रिहाई पर
जब्त मोबाइल फोन के संबंध में, हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के सुंदरभाई अंबालाल देसाई बनाम गुजरात राज्य (2002) के फैसले पर भरोसा जताया। शीर्ष अदालत ने उस मामले में कहा था कि धारा 451 Cr.P.C. के तहत शक्तियों का प्रयोग तेजी से किया जाना चाहिए ताकि कीमती वस्तुओं को पुलिस हिरासत में सालों तक न रखा जाए, जहां वे खराब या बेकार हो सकती हैं।
न्यायमूर्ति नागप्रसन्ना ने नोट किया:
“शीर्ष अदालत के उक्त निर्णय के प्रकाश में, याचिकाकर्ता का मोबाइल फोन उचित शर्तें लगाकर अंतरिम अभिरक्षा (Interim Custody) के रूप में उसे वापस किया जाएगा।”
निर्णय
हाईकोर्ट ने मामले में निम्नलिखित आदेश पारित किए:
- पासपोर्ट: कोर्ट ने माना कि पासपोर्ट की रिहाई को खारिज करने वाले निचली अदालतों के आदेशों पर विचार करने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि पासपोर्ट अधिनियम के प्रावधानों के कारण Cr.P.C. के तहत दायर आवेदन ही “कानूनन शून्य” (Nullity in law) था। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को निर्देश दिया कि वह पासपोर्ट अधिनियम की धारा 6(2)(एफ) और जीएसआर 570 अधिसूचना के अनुसार ‘शॉर्ट वैलिडिटी पासपोर्ट’ के लिए क्षेत्रीय पासपोर्ट कार्यालय के अधिकृत अधिकारी से संपर्क करें।
- मोबाइल फोन: मोबाइल फोन के संबंध में याचिका स्वीकार की गई। 10.10.2025 और 16.12.2025 के आक्षेपित आदेशों को उस हद तक रद्द कर दिया गया जहां तक वे मोबाइल डिवाइस से संबंधित थे। संबंधित कोर्ट को निर्देश दिया गया कि वह सुंदरभाई अंबालाल देसाई मामले में निर्धारित सिद्धांतों के अनुसार उचित शर्तें लगाकर याचिकाकर्ता को मोबाइल फोन वापस करें।
केस का विवरण
- केस टाइटल: श्रीमती सुरमी शिजी बनाम कर्नाटक राज्य व अन्य
- केस नंबर: क्रिमिनल पिटीशन नंबर 180 ऑफ 2026
- कोरम: न्यायमूर्ति एम. नागप्रसन्ना
- याचिकाकर्ता के वकील: श्री आर. शशिधर
- प्रतिवादियों के वकील: श्री के. नागेश्वरप्पा (HCGP), श्री एच. शांति भूषण (DSGI)

