सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि पश्चिम बंगाल एस्टेट्स एक्विजिशन एक्ट, 1953 (WBEA Act) के तहत राजस्व अधिकारी (Revenue Officer) के पास ‘वेस्टिंग’ (संपत्ति निहित करने) के अपने पूर्व आदेश की समीक्षा (Review) करने की कोई वैधानिक शक्ति नहीं है। शीर्ष अदालत ने कहा कि स्पष्ट विधायी जनादेश के अभाव में केवल कार्यकारी निर्देशों या सरकारी आदेशों के माध्यम से ऐसा क्षेत्राधिकार प्रदान नहीं किया जा सकता है।
न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति नोंगमेइकापम कोटेश्वर सिंह की खंडपीठ ने पश्चिम बंगाल राज्य द्वारा दायर अपील को स्वीकार करते हुए कलकत्ता हाईकोर्ट के 2012 के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें एक निजी कंपनी को लगभग चार दशक पुराने आदेश की समीक्षा के आधार पर 211 एकड़ से अधिक भूमि अपने पास रखने की अनुमति दी गई थी।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद जय हिंद प्राइवेट लिमिटेड नामक कंपनी से जुड़ा है, जिसकी स्थापना 1946 में हुई थी। कंपनी ने WBEA एक्ट, 1953 की धारा 6(1)(j) के तहत कृषि भूमि को अपने पास बनाए रखने का दावा किया था। यह प्रावधान उन कंपनियों को भूमि रखने की अनुमति देता है जो 1 जनवरी, 1952 तक “विशेष रूप से खेती में लगी हुई” थीं।
वर्ष 1971 में, एक राजस्व अधिकारी ने कार्यवाही शुरू की और 7 अक्टूबर, 1971 को एक आदेश पारित किया। इसमें कहा गया कि कंपनी यह साबित करने के लिए सबूत पेश करने में विफल रही कि वह विशेष रूप से खेती में लगी थी। नतीजतन, भूमि राज्य सरकार में निहित (vest) हो गई। कंपनी ने इस आदेश को चुनौती दी, लेकिन 1975 में उनकी रिट याचिका खारिज हो गई। इसके बाद बहाली (restoration) की अर्जी 1987 में और बाद की अपील 2002 में खारिज होने के साथ ही 1971 का आदेश अंतिम हो गया था।
हालाँकि, 2008 में एक नया मोड़ आया जब कंपनी ने एग्रो-बेस्ड इंडस्ट्री लगाने के लिए राज्य सरकार के समक्ष “सौहार्दपूर्ण समझौते” (amicable settlement) का प्रस्ताव रखा। इसके आधार पर, राज्य सरकार ने 26 फरवरी, 2008 को एक आदेश जारी कर ब्लॉक लैंड एंड लैंड रिफॉर्म्स ऑफिसर (B.L. & L.R.O.) को 1971 की कार्यवाही की समीक्षा करने का निर्देश दिया। इस निर्देश पर कार्रवाई करते हुए, B.L. & L.R.O. ने 7 मई, 2008 को एक समीक्षा आदेश पारित कर 1971 के फैसले को रद्द कर दिया और कंपनी को 211.21 एकड़ भूमि रखने की अनुमति दे दी।
पश्चिम बंगाल भूमि सुधार और किरायेदारी ट्रिब्यूनल ने 2010 में क्षेत्राधिकार की कमी का हवाला देते हुए इस समीक्षा आदेश को रद्द कर दिया था। लेकिन, कलकत्ता हाईकोर्ट ने 17 मई, 2012 के अपने फैसले में ट्रिब्यूनल के निर्णय को पलट दिया और 2008 के समीक्षा आदेश को सही ठहराया। इसके खिलाफ राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
दलीलें
अपीलकर्ता (पश्चिम बंगाल राज्य) ने तर्क दिया कि समीक्षा (Review) की शक्ति वैधानिक रूप से प्रदान की जानी चाहिए और विशिष्ट प्रावधानों के बिना कोई भी अर्ध-न्यायिक प्राधिकरण (quasi-judicial authority) इसका प्रयोग नहीं कर सकता। उन्होंने कहा कि WBEA एक्ट की धारा 57A, जो अधिकारियों को सिविल कोर्ट की शक्तियां देती है, उसमें स्वाभाविक रूप से समीक्षा की शक्ति शामिल नहीं है। इसके अलावा, 1971 का आदेश अंतिम हो चुका था और 2008 की समीक्षा अप्रासंगिक आधारों पर की गई थी।
प्रतिवादी (जय हिंद प्रा. लि.) का तर्क था कि धारा 57A और राज्य की अधिसूचना, जो राजस्व अधिकारियों को सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के तहत शक्तियां देती है, समीक्षा का अधिकार प्रदान करती है। उन्होंने यह भी कहा कि मंत्री द्वारा अनुमोदित “सौहार्दपूर्ण समझौता” 1971 के आदेश की कथित त्रुटियों को सुधारने के लिए समीक्षा को उचित ठहराता है।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण
1. समीक्षा की कोई वैधानिक शक्ति नहीं सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि राजस्व अधिकारियों के पास समीक्षा की कोई अंतर्निहित शक्ति (inherent power) नहीं है। न्यायालय ने पटेल नरशी ठाकरशी और कालाभारती एडवरटाइजिंग जैसे पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए दोहराया कि “समीक्षा की शक्ति अंतर्निहित नहीं है। इसे कानून द्वारा या तो विशेष रूप से या आवश्यक निहितार्थ द्वारा प्रदान किया जाना चाहिए।”
न्यायालय ने WBEA एक्ट की धारा 57A की व्याख्या करते हुए टिप्पणी की:
“हमारी राय में, 9 जनवरी 1958 की राज्य अधिसूचना में इस्तेमाल की गई व्यापक अभिव्यक्ति, जो सभी सेटलमेंट अधिकारियों और राजस्व अधिकारियों को सिविल कोर्ट की सभी शक्तियां प्रदान करती है, इन अधिकारियों को समीक्षा की शक्ति प्रदान नहीं करती है।”
पीठ ने एक्ट की धारा 57B(3) के प्रावधान की ओर भी इशारा किया, जो स्पष्ट रूप से राजस्व अधिकारी को किसी ऐसे मामले को फिर से खोलने से रोकता है जिसे राज्य सरकार या किसी प्राधिकरण द्वारा पहले ही तय किया जा चुका है।
2. शक्तियों का पृथक्करण और न्यायपालिका की स्वतंत्रता कोर्ट ने जोर देकर कहा कि स्पष्ट विधायी समर्थन के बिना कार्यकारी अधिकारियों को अपने स्वयं के अर्ध-न्यायिक आदेशों की समीक्षा करने की अनुमति देना संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन होगा। न्यायालय ने कहा:
“समीक्षा की शक्ति अनिवार्य रूप से एक मुख्य न्यायिक कार्य है, और स्पष्ट विधायी जनादेश के अभाव में कार्यकारी अधिकारियों को ऐसी शक्ति प्रदान करना कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच संवैधानिक रूप से अनिवार्य सीमा को धुंधला कर देगा।”
3. मेरिट और समय सीमा पर समीक्षा सुप्रीम कोर्ट ने यह भी पाया कि यदि CPC के आदेश XLVII नियम 1 के तहत समीक्षा के गुणों पर विचार किया जाए, तब भी 2008 का आदेश अस्थिर है। कोर्ट ने नोट किया कि कंपनी को 1971 में अपनी पात्रता साबित करने का पूरा मौका दिया गया था। 40 साल की देरी के संबंध में कोर्ट ने कहा:
“समीक्षा को नियंत्रित करने वाले कानून के तहत कानूनी रूप से स्थायी आधार के अभाव में, केवल बाद की नीतिगत प्राथमिकताओं या आर्थिक लाभ के आधार पर एक निष्कर्ष को फिर से नहीं खोला जा सकता है।”
न्यायालय ने रोजगार सृजन से संबंधित “सौहार्दपूर्ण समझौते” को समीक्षा के कानूनी क्षेत्राधिकार के लिए पूरी तरह से अप्रासंगिक माना।
4. सहमति से क्षेत्राधिकार नहीं दिया जा सकता हाईकोर्ट द्वारा मंत्री के अनुमोदन पर भरोसा करने के बिंदु पर, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 26 फरवरी 2008 का सरकारी आदेश वहां क्षेत्राधिकार प्रदान नहीं कर सकता जहां कानून ने ऐसा नहीं किया है। न्यायालय ने कहा:
“हाईकोर्ट ने गलत तरीके से इस आधार पर कार्यवाही की कि WBEA एक्ट की धारा 57A के तहत जारी सरकारी आदेश, जिसे प्रभारी मंत्री द्वारा अनुमोदित किया गया था, राजस्व अधिकारी को समीक्षा का क्षेत्राधिकार प्रदान करने के लिए पर्याप्त अधिकार रखता था।”
निष्कर्ष और निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि 2008 में राजस्व अधिकारी द्वारा की गई समीक्षा “पूरी तरह से बिना क्षेत्राधिकार के और शुरू से ही शून्य (void ab initio)” थी।
न्यायालय ने कहा:
“WBEA एक्ट, 1953, राजस्व अधिकारी को समीक्षा की कोई भी मूल शक्ति प्रदान नहीं करता है… 7 अक्टूबर 1971 का वेस्टिंग आदेश कानून के अनुसार लागू रहेगा।”
तदनुसार, अपील स्वीकार कर ली गई, कलकत्ता हाईकोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया गया और 2008 की समीक्षा को खारिज करने वाले ट्रिब्यूनल के आदेश को बहाल कर दिया गया।
मामले का विवरण:
- केस टाइटल: पश्चिम बंगाल राज्य एवं अन्य बनाम जय हिंद प्राइवेट लिमिटेड
- केस नंबर: सिविल अपील संख्या 7407/2012
- कोरम: न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति नोंगमेइकापम कोटेश्वर सिंह

