इलाहाबाद हाईकोर्ट बार का बड़ा ऐलान: शनिवार को कोर्ट चलाने का प्रस्ताव ‘कॉरपोरेट स्टाइल’ की तरह, न्याय की गुणवत्ता के लिए खतरा

इलाहाबाद हाईकोर्ट बार एसोसिएशन (HCBA) ने देश भर के बार एसोसिएशनों को पत्र लिखकर एक बड़ी मुहिम छेड़ दी है। मामला हाईकोर्ट्स में महीने में दो शनिवार को कामकाज शुरू करने के प्रस्ताव से जुड़ा है, जिसका इलाहाबाद बार ने पुरजोर विरोध किया है। एसोसिएशन का कहना है कि यह कदम केवल फाइलों की संख्या निपटाने जैसा है, जो अंततः न्याय की गुणवत्ता को प्रभावित करेगा।

27 जनवरी, 2026 को लिखे गए इस सख्त पत्र में, HCBA ने देश भर के अधिवक्ताओं से एकजुट होकर इस प्रस्ताव का विरोध करने का आह्वान किया है। बार का तर्क है कि पेंडेंसी (लंबित मुकदमों) को कम करने के नाम पर लाया जा रहा यह प्रस्ताव वकीलों और जजों की जमीनी हकीकत को नजरअंदाज करता है।

‘पेंडेंसी का भ्रामक तर्क’

हाल ही में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत ने हाईकोर्ट्स में महीने में कम से कम दो शनिवार को कामकाज करने का सुझाव दिया था, जिसके बाद से इस चर्चा ने जोर पकड़ लिया है। हालांकि, इलाहाबाद हाईकोर्ट बार एसोसिएशन ने इस विचार की बुनियाद पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं।

अन्य बार एसोसिएशनों को भेजे गए अपने पत्र में HCBA ने साफ कहा कि यह धारणा पूरी तरह “भ्रामक” है कि केवल कोर्ट के दिन बढ़ाने से लंबित मुकदमों का अंबार खत्म हो जाएगा। एसोसिएशन के अध्यक्ष राकेश पांडेय और सचिव अखिलेश कुमार शर्मा द्वारा हस्ताक्षरित इस पत्र में कहा गया है कि न्यायपालिका को “उत्पादकता के कॉरपोरेट मॉडल” (Corporate-style approach) से नहीं चलाया जा सकता, जहां काम को सिर्फ घंटों में मापा जाता है।

पत्र में चेतावनी दी गई है कि, “महीने में दो शनिवार को अदालतें खोलना सतही तौर पर आकर्षक लग सकता है, लेकिन अंततः यह न्याय की गुणवत्ता और मात्रा दोनों को प्रभावित करेगा।”

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वीकेंड: वकीलों के लिए छुट्टी नहीं, तैयारी का समय

एसोसिएशन ने इस बात पर जोर दिया कि आम धारणा के विपरीत, शनिवार और रविवार वकीलों के लिए छुट्टी के दिन नहीं होते। आधिकारिक अदालती समय (सुबह 10 से शाम 4 बजे) वकीलों के काम का महज एक हिस्सा है।

पत्र में वकीलों की कार्यशैली की वास्तविकता बयां करते हुए कहा गया है, “जटिल मुकदमों, जिनमें गहरे अध्ययन और व्यापक तैयारी की जरूरत होती है, उन्हें आमतौर पर शनिवार और रविवार को ही तैयार किया जाता है। वास्तव में, शनिवार और रविवार वकीलों के लिए सबसे व्यस्त दिन होते हैं।”

बार का मानना है कि अगर यह समय भी अदालती कार्यवाही में चला जाएगा, तो वकीलों के पास केस तैयार करने, ड्राफ्टिंग और कानूनी शोध के लिए वक्त ही नहीं बचेगा, जिसका सीधा असर मुवक्किलों को मिलने वाली कानूनी सहायता पर पड़ेगा।

जजों और स्टाफ पर भी पड़ेगा बोझ

HCBA ने अपने पत्र में जजों और रजिस्ट्री स्टाफ की समस्याओं को भी रेखांकित किया है। उन्होंने बताया कि जज अक्सर वीकेंड का इस्तेमाल अपने सुरक्षित (Reserved) फैसले लिखवाने और प्रशासनिक कार्यों को निपटाने में करते हैं।

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इसके अलावा, कोर्ट स्टाफ पहले से ही मैनपावर की कमी से जूझ रहा है। आदेशों की प्रमाणित प्रतियां (Certified Copies) जारी करने में पहले ही देरी हो रही है। ऐसे में बिना ढांचागत सुधार किए काम के दिन बढ़ाना सिस्टम पर अनावश्यक दबाव डालेगा।

एकजुट होकर विरोध की अपील

इलाहाबाद हाईकोर्ट बार एसोसिएशन ने देश भर के अन्य बार एसोसिएशनों से अपील की है कि वे इस प्रस्ताव के खिलाफ प्रस्ताव पारित करें। साथ ही, उन्होंने सुझाव दिया है कि इस विरोध को सुप्रीम कोर्ट, केंद्रीय कानून मंत्री और संबंधित हाईकोर्ट्स के मुख्य न्यायाधीशों तक पहुंचाया जाए।

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गौरतलब है कि दिल्ली और केरल सहित कई अन्य बार एसोसिएशन पहले ही इस तरह के प्रस्तावों पर अपनी चिंता जता चुके हैं। अब देश के सबसे बड़े हाईकोर्ट्स में से एक, इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस मुहिम में शामिल होने से विरोध के स्वर और मुखर हो गए हैं।

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