इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने जाति आधारित राजनीतिक रैलियों पर प्रतिबंध लगाने और विभाजनकारी राजनीति करने वाले राजनीतिक दलों का पंजीकरण रद्द करने की मांग वाली 2013 की एक जनहित याचिका (PIL) का निस्तारण कर दिया है। न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति अबधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि ऐसे मुद्दों से निपटने के लिए वैधानिक प्रावधान और सरकारी आदेश पहले से ही मौजूद हैं। कोर्ट ने टिप्पणी की कि “अब केवल इन प्रावधानों को प्रभावी ढंग से लागू करने की इच्छाशक्ति की आवश्यकता है।”
हाईकोर्ट ने राजनीतिक दलों का पंजीकरण रद्द करने की मांग को स्वीकार करने से इनकार कर दिया, इसके लिए सर्वोच्च न्यायालय के एक पूर्व निर्णय का हवाला दिया जो इस संबंध में चुनाव आयोग की शक्तियों को सीमित करता है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह जनहित याचिका मोती लाल यादव द्वारा व्यक्तिगत रूप से दायर की गई थी, जिसमें मुख्य रूप से तीन राहतें मांगी गई थीं:
- भारत निर्वाचन आयोग को राजनीतिक दलों द्वारा आयोजित की जाने वाली सभी जाति-आधारित रैलियों और सम्मेलनों (जैसे ब्राह्मण महासभा रैली, यादव रैली, क्षत्रिय रैली आदि) पर प्रतिबंध लगाने का निर्देश देना।
- जाति या धर्म के आधार पर समाज या मतदाताओं को विभाजित करने वाले व्यक्तियों या पार्टियों के चुनाव लड़ने पर रोक लगाना।
- जाति या धर्म आधारित रैलियां आयोजित करने वाले दोषी राजनीतिक दलों का पंजीकरण रद्द करना।
दलीलें और कानूनी ढांचा
चुनाव आयोग का पक्ष चुनाव आयोग की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता ओ.पी. श्रीवास्तव ने दलील दी कि आयोग की भूमिका चुनाव अधिसूचना जारी होने के बाद ही शुरू होती है। चुनावों के दौरान, आदर्श आचार संहिता (Model Code of Conduct) उन गतिविधियों को प्रतिबंधित करती है जो विभिन्न जातियों और समुदायों के बीच मतभेद बढ़ाती हैं या आपसी नफरत पैदा करती हैं।
कोर्ट ने नोट किया कि आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन के लिए चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) आदेश, 1968 के पैरा 16-A के तहत कार्रवाई संभव है, जो आयोग को किसी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल की मान्यता को निलंबित या वापस लेने की अनुमति देता है। इसके अलावा, उल्लंघन होने पर एफआईआर दर्ज कराने और प्रचार पर प्रतिबंध जैसी अन्य कार्रवाइयां भी की जा सकती हैं।
जातिगत रैलियों पर राज्य सरकार का प्रतिबंध गैर- चुनावी अवधि के संबंध में, कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा हाल ही में जारी 21 सितंबर, 2025 के शासनादेश (Government Order) का हवाला दिया। यह शासनादेश हाईकोर्ट द्वारा एक अन्य मामले (प्रवीण छेत्री बनाम उत्तर प्रदेश राज्य) में की गई टिप्पणियों के बाद जारी किया गया था।
उक्त शासनादेश के पैरा 3(8) में स्पष्ट रूप से कहा गया है:
“राजनीतिक उद्देश्यों से आयोजित जाति आधारित रैलियां आदि समाज में जातीय संघर्ष को बढ़ावा देती हैं, जो ‘लोक-व्यवस्था’ और ‘राष्ट्रीय एकता’ के विपरीत है। इन पर उत्तर प्रदेश राज्य में पूर्ण प्रतिबंध रहेगा।”
इस पर कोर्ट ने कहा कि उपरोक्त चर्चा को देखते हुए, जाति आधारित राजनीतिक रैलियों को प्रतिबंधित करने और रोकने का प्रावधान पहले से ही मौजूद है, चाहे वह चुनाव प्रक्रिया के दौरान हो या नहीं।
पंजीकरण रद्द करने और अयोग्यता पर कोर्ट का विश्लेषण
राजनीतिक दलों का पंजीकरण रद्द करना जातिगत रैलियां करने वाले दलों का पंजीकरण रद्द करने की याचिकाकर्ता की मांग पर, हाईकोर्ट ने इंडियन नेशनल कांग्रेस बनाम इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल वेलफेयर और अन्य (2002) के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भरोसा जताया।
पीठ ने शीर्ष अदालत के उस निर्णय को उद्धृत किया जिसमें कहा गया था कि “संसद ने जानबूझकर चुनाव आयोग को धारा 29-A की उप-धारा (5) के प्रावधानों के उल्लंघन के आधार पर किसी राजनीतिक दल का पंजीकरण रद्द करने की शक्ति प्रदान नहीं की है।”
कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग केवल विशिष्ट अपवादों के तहत ही किसी पार्टी का पंजीकरण रद्द कर सकता है, जैसे कि यदि पंजीकरण धोखाधड़ी या जालसाजी से प्राप्त किया गया हो, या यदि पार्टी संविधान के प्रति अपनी निष्ठा छोड़ दे। नतीजतन, पीठ ने कहा कि इस जनहित याचिका में यह राहत नहीं दी जा सकती।
उम्मीदवारों की अयोग्यता समाज को बांटने वाले उम्मीदवारों पर प्रतिबंध लगाने की मांग के बारे में, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल ऐसे आरोपों के आधार पर चुनाव लड़ने पर “पूर्ण प्रतिबंध” का कोई प्रावधान नहीं है। कोर्ट ने जनप्रतिनिधि अधिनियम, 1951 की धारा 123(3) का उल्लेख किया, जो धर्म, मूलवंश, जाति या समुदाय के आधार पर अपील करने को “भ्रष्ट आचरण” (corrupt practice) मानती है।
कोर्ट ने समझाया कि अधिनियम की धारा 8-A के तहत अयोग्यता तभी होती है जब किसी व्यक्ति को भ्रष्ट आचरण का दोषी पाया जाता है, जो कि चुनाव याचिका (Election Petition) का विषय है।
सामाजिक मूल्यों पर महत्वपूर्ण टिप्पणी
याचिका का निस्तारण करते हुए, कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 51-A(e) का उल्लेख करते हुए जातिवाद को रोकने में शिक्षा और पारिवारिक मूल्यों की भूमिका पर जोर दिया।
कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा:
“वास्तव में, ऐसी समस्याओं का स्थाई समाधान परिवार और स्कूली शिक्षा प्रणाली में उचित संस्कारों का समावेश है, ताकि बच्चा बड़ा होकर सही मूल्यों और मानसिकता वाला बने और केवल जाति या धर्म के आधार पर प्रभावित न हो… सब कुछ इन कानूनों और विधियों द्वारा नियंत्रित और विनियमित नहीं किया जा सकता।”
कोर्ट ने न्याय मित्र (Amicus Curiae) रजत राजन सिंह द्वारा प्रस्तुत सुधारों के सुझावों को भी नोट किया, जिसमें गैर-चुनावी अवधि के दौरान अभद्र भाषा (hate speech) के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए चुनाव आयोग को सशक्त बनाने हेतु जनप्रतिनिधि अधिनियम में संशोधन शामिल था। कोर्ट ने कहा कि विधायिका और सरकार इन सुधारों पर विचार करने के लिए स्वतंत्र हैं।
निर्णय
हाईकोर्ट ने जनहित याचिका का निस्तारण करते हुए निर्देश दिया कि यदि मौजूदा प्रावधानों या 21 सितंबर, 2025 के शासनादेश का कार्यान्वयन नहीं किया जाता है, तो याचिकाकर्ता प्रासंगिक डेटा के साथ कोर्ट का दरवाजा खटखटाने के लिए स्वतंत्र है।
केस का विवरण:
- केस शीर्षक: मोती लाल यादव बनाम मुख्य चुनाव आयुक्त, भारत निर्वाचन आयोग और अन्य
- केस संख्या: जनहित याचिका (PIL) संख्या 5889 वर्ष 2013
- कोरम: न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति अबधेश कुमार चौधरी
- याचिकाकर्ता के लिए वकील: स्वयं (इन पर्सन), रजत राजन सिंह (न्याय मित्र)
- प्रतिवादियों के लिए वकील: सी.एस.सी., ए.एस.जी., अनुप्रिया श्रीवास्तव, कौशलेन्द्र यादव, ओ.पी. श्रीवास्तव

